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1947 के विभाजन के बाद का सबसे काला दिन 2 April 2018


1947 के विभाजन के बाद का सबसे काला दिन

कल की सारी पोस्ट्स फिर से पढ़ी , समझी भी और विश्लेषण भी किया - अपनी भी और जिम्मेदार मित्रों की भी.

कुल मिलाकर समझ आया कि

* हर जगह आन्दोलनकारियों के हाथों में वैसी ही लाठियां थी जो प्रचलित है समाज में.

* भगवा गमछा हरेक के काँधे पर था

* नीले झंडे हाथो में थे

* आप लोगों ने बच्चों, मरीजों और महिलाओं का भी उपयोग कर उन्हें हैरास किया और "मर्दानगी" दिखाई - बधाई तो बनती है.

* सभी के पास बाईक थी और दो से तीन चार लोग सवार थे पेट्रोल का खर्च ?

*आन्दोलन में खर्च कहाँ कितना हुआ और कहाँ से आया विचारणीय है.

* जो पैदल थे वे सब सफ़ेद गमछे से मुंह ढांक कर रखे थे

* सबसे ज्यादा दादागिरी दिहाड़ी करने वाले सब्जी वालों से लेकर छोटे दुकानदारों पर उतारी गई

* पुलिस प्रशासन की ज्यादती भी दिखी स्पष्ट रूप से

* नारों और हल्ले में सब कुछ गोलमाल था

* आर्थिक नुकसान किसका हुआ

*बहुत शातिरी से सरकार आरक्षण हटा रही है का गलत सन्देश परोसा गया जिससे युवा ज्यादा भड़के जो खुद अशिक्षित और भटके हुए है.

* जी भरकर आप लोगों ने कल मुझे भी कोसा और बाकी साथियों को भी जैसा मेरा चेहरा दिखा - वैसी आपकी कमजोर राजनैतिक समझ, वर्षों का साथ, मदद और वो सब याद आया और अफसोस भी हुआ.

* बहुत सारे लोगों की प्र्तिबद्धताएं उजागर हुई है सबक है, सीखना चाहिए

* हिंदी के लेखक कल सेफ गेम खेलते रहें और कविता कहानी की दुनिया में जुगाली करते रहें जैसे देश जल रहा था और हिंदी का लेखक रुद्राक्ष बेच रहा था. इनका दलित विमर्श और दलित चेहरा भी नजर आया - मानसिक दलितपन

* मीडिया के लोग कल सांप गिरगिट का खेल चलाते रहें और खूब एन्जॉय करते रहें.

* मैंने तय किया है कि अब किसी पर भरोसा नहीं करना है .

* युवा पत्रकार जो किसी तरह से पत्रिकाओं में चिपक गए है वे कल देश दुनिया के सबसे बड़े ज्ञानी बन गए थे जिन्हें हिंदी के हिज्जे लिखना नहीं आता अभी वे कल बकर में उस्तादी करके पदमश्री लेने के चक्कर में रहें

* कल का दिन 1947 के विभाजन के बाद का सबसे काला दिन था भारतीय इतिहास में और इसे बार बार याद रखा जाना चाहिए. बल्कि इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए कक्षा पहली से मास्टर डिग्री तक ताकि हमारे नौनिहाल इसे समझे और अपने आप से पूछे कि समझ तेरी जात और औकात क्या है इस देश में.

अब मेरा सिर्फ यही कहना है कि इसका फ़ायदा किसे मिलेगा बताइयेगा और मेरा अनुमान है कि भाजपा इसका फ़ायदा उठायेगी और फिर से श्री नरेंद्र मोदी और इनकी पार्टी केंद्र से लेकर राज्यों तक आ रही है, आप गलियाते रहें सवर्ण व्यवस्था और जूझते रहिये हर स्तर पर. उन्हें जो करना था कर लिया कल और मारना था मार भी दिया, जान भी ले ली और सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा प्लान किया था.

इसमें किसकी मिलीभगत थी एक बार पता कर लेना और किसका विशुद्ध फायदा हुआ यह भी सोच लेना और अगर नहीं तो थोड़े दिन इंतज़ार कीजिये कि ऊँट किस करवट बैठता है. कितने दलित नेता और कितने उदारवादी नेताओं ने इसमें अपनी रोटी सेंकी है यह भी थोड़े दिनों में स्पष्ट सामने आयेगा जब ये चुनावों में भाजपा के टिकिट से चुनाव लड़ेंगे और प्रवक्ता बनेंगे.

मुझे ना भाजपा से दिक्कत है ना बसपा से बस अवसरवादियों और गिरगिटों को देखकर ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है.

इति 2 अप्रेल 18 कथा समाप्त

#खरी_खरी

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