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कब तक रहेगी देश में आरक्षण की बैसाखी और दलितों को पिछड़ा रखने की साजिश ?





मै सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि सदियों से जारी जाति प्रथा को ख़त्म किये बिना और समतामूलक समाज बनाए बिना अब कुछ नहीं होगा. हजार सालों में किसके साथ क्या हुआ और किसने किया इसके लिए आप आज की पीढी को दोषी नहीं मान सकते और सजा नहीं दे सकते, आज सब सामान है और जिनके साथ भेदभाव हो रहा है या किया जा रहा है चाहे वो दूर दराज के गाँवों के दलित हो या सुकमा के आदिवासी या अत्यंत पिछड़े दलित उसके लिए अधिकांशतः उनके ही नेतृत्व जिम्मेदार है, हमने ऐसे निकम्मे नालायकों को अपना नेता चुना है और संसद में भेजा है जो सिर्फ इस दुर्भाग्य को और यथास्थितिवाद के बनाए रखना चाहते है इसलिए मै इस बात का कोई अब समर्थन नहीं करता कि मैंने या मेरे पुरखों ने किसी को हजार साल सताया है इसलिए अब इन्हें सत्तर साल तक बैसाखी देने का सिलसिला पीढी दर पीढी बनाए रखा जाए और एक मनुष्य को प्राकृतिक न्याय से महरूम रखा जाए. और फिर नौकरी, प्रमोशन, प्रवेश जैसे मसलों पर आरक्षण बिलकुल नहीं होना चाहिए. एक बार जाकर देखिये अयोग्य लोगों के सत्तर साल में तंत्र में होने से (और इसमे सब शामिल है यानी सभी जाति समुदाय) दश का कितना नुकसान हो गया और क्या हालत हो गयी है. अगर शीर्ष नेत्रित्व में दम है तो अजीम प्रेम, नारायण मूर्ती, रतन टाटा या अम्बानी - अडानी को मजबूर करें कि अपने यहाँ 55 प्रतिशत नौकरियां दलित आदिवासियों को दें. और सिर्फ अब बात दलित आदिवासी की नहीं है बल्कि अब मामला आरक्षण के नाम छदम लोगों के लिए भी है. 

आरक्षण देकर और उपयोग करके आप अपना और आने वाले समाज का नुकसान कर रहे है. सत्ता को, सत्ता के चरित्र को और सत्ता की चाल को समझिये जनाब और बचाईये अगर आप सच में अपनी इंसानी कौम को बचाना चाहते है, अब हमें नए आंबेडकर और ज्योतिबा फूले की आवश्यकता है. नहीं चाहिए तर्क, विश्वास, आख्यान और अकादमिक उबाऊ व्यर्थ के उदाहरण जो हजारों सालों से फ़ालतू के जाल में लोगों को मूर्ख सांसदों को आपने गुमराह अक्रके आरक्षण जैसी व्यवस्था को बनाए रखा है. बस बहुत हो गया.

आरक्षण रहने से या हटा देने से कोई फर्क नहीं पडेगा आपको सिर्फ सुविधा , नोकरी , उच्च संस्थाओं में प्रवेश और प्रमोशन लेने से आप अपने को विकसित मान लेंगे या ब्राह्मण बनकर मंदिरों में पूजा का अधिकार बनाये रखेंगे तो यह सिर्फ घटियापन और मूर्खता के अलावा कुछ नही है। दक्षिण पंथी ताकतें जाति व्यवस्था बनाये रखना चाहती है और पहले कांग्रेस ने छला और अब मात खाते रहिये इनसे, ये कुल मिलाकर आपको ख़त्म करना चाहते है। बाजार और भू मंडलीकरण के दौर में रोते रहिये और सरकार ख़त्म कर रही है धीरे से सारी नोकरियां और फिर आप मक्कार, अयोग्य और पूर्णतः निकम्मे होकर सम्पूर्ण रूप से धकेल दिए जाएंगे बाजार और दुनिया से। समझिये इस चाल को और ठुकराईए इस बैसाखी को। अगर आरक्षण इतना ही महत्वपूर्ण है और आपमें अगर सच में योग्यताएं आ गयी है तो जाइए बड़ी निजी कंपनियों में जैसाकि मेरे बहुत से परिचित दलित बच्चे आज सिर्फ योग्यता के बल पर काम कर रहे है वे भी उन्ही गलीज माहौल से निकलकर आये है पर आरक्षण को उन्होंने ठुकराया है।

अब बंद कीजिये आरक्षण के आंकड़े और बकवास। बाजार है योग्यता, अंग्रेजी कंप्यूटर ज्ञान और वाकपटुता का ज़माना है। आप जो लोग आरक्षण जैसे बैसाखी लेकर तंत्र में बैठे है और अगर हिम्मत है तो मंडला बालाघाट डिंडोरी झाबुआ के आदिवासियों को तंत्र में आने दें। जे इन यु या जिले में मलाईदार पद पर बैठकर या विदेशों में पढ़ रहे या डी पी एस में पढ़ रहे बच्चों के लिए भीख ना मांगे वरना छोड़ दे चोंचले। बंद करो दलितो की घटिया राजनीती। 
योग्यता की नीलामी हो रही है और आरक्षण द्वारा उसे खरीदा जा रहा है करोड़ों में आमदनी वाले भी अपने आप को दलित बताकर नाजायज लाभ की आकांक्षा से योग्यता को दरकिनार करने में लगे हुए हैं आरक्षण का लाभ जरूरतमंदों को नहीं मिलता बल्कि उसका गलत फायदा लिया जा रहा है हाँ आरक्षण देकर पिछड़ों या गरीबों को कुछ करने के योग्य बनाना बेहतर है न कि अयोग्य व्यक्तियों को आरक्षण का लाभ देकर योग्यता को नकारना. 

आरक्षण हर तरह का और हर जगह से और अब तर्क कुतर्क और बहस की गूंजाईश मेरे लिए नहीं है। जे इन यु में डेढ़ लाख का वेतन लेकर और आय ए एस बनकर या वाशिंगटन में पढ़कर आपको आरक्षण चाहिए नोकरी और एडमिशन और प्रमोशन में तो बात ख़त्म। नही सुनने आख्यान और लोकसभा में जानवरों की घटिया बहसें नहीं पढ़ना इतिहास और बहस, बस अब बंद , सब इंसान है और कुछ नहीं। नोकरी के बाद प्रमोशन में भी आरक्षण वे निर्लज्ज लेते है जो रीढ़ विहीन है । इन लोगों की वजह से ही सत्यानाश हुआ जो कुछ संस्थाओं में पढ़े और आरक्षण में बैसाखी लेकर कुत्सित मानसिकता लिए आज तक बैठे है जो काम धाम नहीं करते सिवाय बोझ बढ़ाने के। ये अभिजात्य दलित है। आरक्षण हर तरह का और हर जगह से और अब तर्क कुतर्क और बहस की गूंजाईश मेरे लिए नहीं है। जे इन यु में डेढ़ लाख का वेतन लेकर और आय ए एस बनकर या वाशिंगटन में पढ़कर आपको आरक्षण चाहिए नोकरी और एडमिशन और प्रमोशन में तो बात ख़त्म। नही सुनने आख्यान और लोकसभा में जानवरों की घटिया बहसें नहीं पढ़ना इतिहास और बहस, बस अब बंद , सब इंसान है और कुछ नहीं।

ख़त्म आज से आरक्षण शब्द कम से कम मेरे शब्द कोष से तो हट गया, ना ही सहानुभूति है कोई इस विषय पर. माफ़ कीजिये पुरे होशो हवास में बगैर किसी पूर्वाग्रह के मै यह कह रहा हूँ. मैं बहुत कंविंसड हूँ अब कि आरक्षण किसी भी स्तर पर और कही भी सही नहीं है।

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