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"कभी-कभी मुझे अपने आप से बड़ा डर लगता है, जब वे मुझमें झाँकते हैं और अपने जीवन का मतलब मुझसे पूछते हैं। हालांकि उन्होंने ही मेरा आकार तय किया है , मेरी क़ीमत तय की है। मुझ पर मोहर लगायी है और उस पर एक वादा अंकित किया है, और उसे एक सलीब की तरह समाज के गले में टाँग दिया है। और गोकि मेरा रंग-रूप, चेहरा-मोहरा, नाक-नक़्श , क़द-क़ीमत सब तय हैं, फिर भी वे मुझे देखते ही सबकुछ भूल जाते हैं। वे भूल जाते हैं तमाम नियम जो पुरानी बाइबिल के कड़े आदेशों की तरह उन्होंने ख़ुद ही मेरे माथे पर लिख दिए हैं और फिर भी तलाश करते हैं अपने जीवन के तमाम सपनों को काग़ज़ की छोटी-सी सीमा में, अपनी छोटी-बड़ी अभिलाषाओं के अनुसार वे कभी मेरी क़ीमत को घटाते हैं, कभी बढ़ाते हैं और एक मजहबी किताब की तरह मुझ में से अपने मतलब के मानी निकालने की हर कोशिश करते रहते हैं। शायद मैं काग़ज़ का एक पुर्जा नहीं हूँ। मैं इस युग का सबसे महान ग्रन्थ हूँ।"

-काग़ज़ की नाव , कृश्न चंदर

साभार - Dheeraj Kumar

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