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नदी किनारे से अनन्तिम कथा ना बेचैनी की ना जीवन की..... फरवरी 26, 2013

                                               

ज़िंदगी में निर्णय लेना जरूरी हो जाता है कई बार खासकरके तब जब आपको कोई छल, प्रपंचना से बरगलाते हुए अपने स्वार्थ को पूरा करना चाहता हो बुरी तरह से तनाव देते हुए और जिद पर आकर आपको मजबूर करने की कोशिश करें, बेहतर है ठोस निर्णय ले और जवाब दें ना कि घिघियाते हुए कुछ क्षणिक तनावों की वजह से हर कुछ स्वीकार ले.
इस सुबह में हल्की-हल्की हवा चल रही है- इसमे कही फाग की आगत है, कही एक चुलबुलाहट और दिलों-दिमाग को मदहोश कर देने वाली खुश्बू.........
और अब समय आ गया है कि पुनः घर लौटा जाये......पन्द्रह साल की आवारगी के बाद एक अनुशासन में फ़िर लौटा जाये.........इन पन्द्रह सालों में बहुत कुछ देख लिया, कर लिया, जी लिया और सारी यारी दोस्ती देख,कर और भुगत ली. याद आ रहा है चल खुसरो घर आपने रैन भई चहूँ देस
जाना तो कही से कभी भी नहीं चाहा, परन्तु ना जाने क्यों अपने ही जाये दुःख आड़े आये हमेशा से, और बदलता रहा शहर दर शहर, सामान का बोझ ढोते हुए घूमता रहा दुनिया में और फ़िर एक दिन याद आया कि अब बहुत हो गया अपना साम्राज्य और अपनी शर्तों पर जीने की तमन्ना, अपनी दुनिया, अपने दोस्त, अपनेपन को खोजते हुए बार-बार अपने से ही टकराना और हर बार सिसकते हुए दर्प में अवसादों के साथ जीते हुए.....और अंत में कुल जमा शून्य बस लौट रहा हूँ . यह लौटना भी अजीब लौटना है यह अपने अंदर से अपने अंतरतम की एक अथक यात्रा है और बहुत बेबसी से भरी हुई एक विचित्र सी यात्रा जिसमे कोई शुरुआत नहीं कोई अंत नहीं कोई मंजिल नहीं कोई सार्थकता नहीं और कोई उद्देश्य नहीं बस लौटना है जहां से शुरू हुआ था एक दिग्विजयी स्वप्न लेकर, कुल मिलाकर लगा कि संसार में ऐसा कुछ नया नहीं कर रहा है कोई, यही मार्ग बुद्ध ने, महावीर ने और कईयों ने अपनाया था बस फर्क इतना था कि उस समय जंगल थे निर्वाण था और संन्यास था और आज घर है, कमरे है, एकाकीपन है, बेरुखी है, संताप, अवसाद और तनाव है और यह वर्चुअल वर्ल्ड है. जब आज सब बाँध रहा था तो लगा कि अब सब बाँध ही लिया है तो पोटली भी बाँध लें सफर शायद आसान हो जाये................यह नदी किनारे से बेचैनी की अंतिम कथा है और इसका कोई अंत भी नहीं है ना ही इसका कोई ओर-छोर बस............नदी को बहना है -यही शाश्वत सत्य ,है यही सत्य है, यही निर्वाण है, यही प्रारब्ध और यही अंत जो कहाँ है कब है किसी को नहीं पता.
और क्या कहू इतना तो कुछ कभी महसूसा भी नहीं था एक नदी से दूर होने के मायने तब समझ आते है जब आप सच में नदी के किनारों से दूर चले जाते है...............उन किनारों से दूर जिनका होना मायने रखता था, जिनके होने से जीवन में साँसों को लेते हुए हर क्षण भाप उड़ जाती थी, जिनके होने से गुनगुने से पछतावें भी कभी कभी साकार हो उठते थे...........बस

अब ना नदी है, ना किनारे, ना बेचैनी, ना कथ्य, ना भाषा, ना स्वरुप, ना विधा, ना शिल्प- बस है तो सिर्फ और सिर्फ........... दूर होने की व्यथा !!!

(नदी किनारे से अनन्तिम कथा ना बेचैनी की ना जीवन की..... फरवरी 26, 2013)

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