Skip to main content

अन्ना आंदोलन की असफलता के दंश

अन्ना साहब को निश्चित रूप से एक राजनीतिक दल बनाना चाहिए. व्यवस्था परिवर्तन वह चाहते नहीं और व्यवस्था के भीतर रहकर कुछ करने के लिए संसद में होना ज़रूरी है. ऐसा करने पर एक फायदा यह होगा कि हम जैसे
लोग लोकपाल के अलावा भी दुसरे मुद्दों (जैसे आर्थिक नीति, आरक्षण, रोजगार,सेज, श्रम-सुरक्षा आदि) पर उनके विचारों से अवगत हो सकेंगे. मैं, एक आम नागरिक, उन्हें इसके लिए शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ. संवेदनहीनता तो खैर हमारे समय का जैसे आइना बन गया हो. लेकिन क्या वह सरकार की ही तरफ से है? अन्ना और उनके लोग क्या कम संवेदनहीन हैं? जिस तरह से उनके तेवर और उनका अब तक का व्यवहार रहा है, क्या उन्होंने बातचीत के लिए कहीं एक इंच ज़मीन छोडी है? जो बिल वह बनवाना चाहते हैं वह केवल एक तानाशाह सरकार ही बना सकती है. इसके पहले कौन सा आन्दोलन ऐसा रहा है जिसमें समझौते के लिए कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा गया? पहले दौर में आई भीड़ और मीडिया के सहारे बनी अन्ना की इमेज का नशा ऐसा चढ़ा है कि उन्होंने खुद को सारी दुनिया से ऊपर मान लिया है. अब राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा की गई है तो वह भी कुछ इस अंदाज में कि जैसे कोई तारणहार उतर रहा हो. इस हवाई आन्दोलन में जनता से संवाद जैसी कोई स्थिति नहीं है. दूसरी राजनीतिक पार्टियों की तरह ही एक हाईकमान है जो मनमाने फैसले करता है. फिर भी, मैं चाहूंगा कि यह पार्टी अपना विस्तृत घोषनापत्र पेश करे. कम से कम, नई आर्थिक नीति और श्रम कानूनों तथा विदेशी निवेश जैसे मुद्दों पर उनका स्पष्ट दृष्टिकोण सामने आये. मैं जानना चाहूंगा कि आज इस मनुष्य विरोधी व्यवस्था में ही इमानदारी (वैसी जैसी मारुती के मजदूर नेताओं को गिरफ्तार कर उसके मालिक को फोन करके आश्वस्त करने में हरियाणा के ड़ी जी पी ने दिखाई या जैसी पास्को के खिलाफ आन्दोलनरत आदिवासियों के खिलाफ उडीसा सरकार या उसके कर्मचारी दिखा रहे हैं) लागू कर के वह रह जाना चाहते हैं या मनुष्यता के प्रति ईमानदार होकर आम जनता के पक्ष में खड़ा होना चाहते हैं. मुझे उम्मीद तो नहीं, लेकिन अगर वह ऐसा कर पाते हैं तो मुझे भी उनके साथ जाने में क्या संकोच होगा?

बिलकुल सहमत हूँ ........अब आया ना ऊंट पहाड़ के नीचे अब समझ आएगा कि शराबी को कैसे पीटेंगे खम्बे से बांधकर और बाकी भी मुंगेरीलाल के हसीन सपने......

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

अदम गोंडवी की ग़ज़लें

अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन......... काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में 000 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की? इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया सेक्स की रंगीनियाँ या ...

Rest in Peace Dr BK Pasi, You will be Remembered Always

नमन डा बी के पासी सन 1991-92 का साल था , एम ए अंग्रेज़ी में करने के बाद कुछ और पढ़ा जाए इस बात की इच्छा थी लिहाजा सोचा कि पीएच डी करने में तो समय लगेगा क्यों ना एम फिल कर लिया जाए, इंदौर के देवी अहिल्या विवि में थोड़ा परिचय था, स्याग भाई ( डा रामनारायण स्याग ) ने ताजा ताजा शोध पूरा किया था और शिक्षा विभाग में अक्सर आना जाना होता था, देवास की मीना बुद्धिसागर उन दिनों वहा शोध के लिए पंजीकृत हुई ही थी, डा उमेश वशिष्ठ, डा सुशील त्यागी, डा छाया गोयल और डा देवराज गोयल से परिचय था ही, सो सोचा कि क्यों ना यहाँ कुछ पढाई की संभावनाएं टटोली जाएँ. सीधा जाकर डा बी के पासी से मिला तो उन्होंने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा क्या करेगा अब पढ़कर और इतना अच्छा काम कर रहा है तो अब क्या करना है फिर मैंने जिद की तो उन्होंने कहा कि थोड़ा ठहर जा मै एक नया पाठ्यक्रम शुरू कर रहा हूँ भविष्य अध्ययन मान्यता के लिए प्रकरण यु जी सी गया है आते ही सूचना करूंगा. बात आई गयी हो गयी, एक दिन बैतूल में गया हुआ था एक शिक्षक प्रशिक्षण में था तो डा पासी का फोन घर पहुंचा और कहा कि तुरंत मिलने को बुलाया है. मै आते ही ...