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तुम्हारे लिए ............सुन रहे हो...........कहा हो तुम........

और फ़िर एक बार अपने रण और रणक्षेत्र में अकेले दुदुम्भी उठाये..............जहां जीवन के ४५ से ज्यादा बरस बिता दिए, दोस्तों दुश्मनों का शहर, मददगारों का शहर, गुरूर वालों का शहर, राजनिती और गहमा गहमी का शहर, वो शहर जहां से जीवन की खुशियाँ उठाई थी और आज एकदम अकेलापन भुगतने की पीड़ा का दंश.............बस तसल्ली यह है कि आज भी किसी भी गली या कोने में निकल जाऊं तो चेहरे परिचित निकल आते है, डर नहीं लगता कि कही कुछ हो गया तो लोग जेबें टटोलेंगे और खोजते फिरेंगे या मोबाईल में आख़िरी कॉल देखेंगे, इसलिए मैंने तुम्हारे सारे नंबर ही मिटा दिए क्योकि अब तुम कहा और मै कहा ??? जब हम पास रहकर इतने दूर है तो दूर रहकर कहा पास आ पायेंगे.......................यहाँ तो यह आलम है कि लोग चेहरा देखकर घर छोड़ जायेंगे............आशीष मंडलोई कहता है अभी भी दादा आपकी लाश एक चौराहे पर रख दे सिर्फ दो दिन देवास में तो एकाध लाख तो इकठ्ठे हो ही जायेंगे, और मेरे एनजीओ में काम आयेंगे, पर आपकी लाश के कई दावेदार है मेरा कहा नंबर आएगा..................ऐसा शहर है यह मेरा................देवास...........बस अब उम्मीद है तो सिर्फ एक ही जाने के पहले वो जो असंख्य सुबहों के सूरज की कल्पना है- फलीभूत हो जाए...............रूह में कांपते से, डोर से हिलते वो सारे लोग सामने आ रहे है...........आँखे मिचमिचा रही है और एक बार फ़िर आयोवा की तरह से, एक बार वेरा और एक बार शहर की कहानियां याद आती है.............
(लिखी जा रही कहानी का एक अंश........)

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आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

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भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...