Skip to main content

मल्हारगंज, इंदौर में वर्षा और बाढ़ by Umber Ranjana Pandey

मल्हारगंज, इंदौर में वर्षा 

मल्हारगंज की हाट 
में भयानक झंझा से
भर गयी धर्मशाला,
दुकानें व रिक्शें. छाया
का प्रतिबिम्ब हो ऐसा 
तिमिर; ज्यों कोई लाया
हो चुराकर तमाल 
के वन से. अनाज के
व्यापारियों ने समेट
लिया पसार. पापड़ 
वाले हो गए फरार.
बीच बाजार मेघ ने
आकर खोल दिया था
कुरबक के फूलों से
बंधा ऋतु का खोंपा. थे
फैल गए पीठ पर
भू की; अजानुलंबित  
मंजीष्ठ के रंग वाले
मेघ. डुबकियाँ शत-
सहस्र मारकर, थे
बंगाली खड़ी से आये.

मिनुट दो मिनुट में
बजने लगे टपरे.

खुल तो गया था खोंपा
किन्तु देर तक झोड़ 
मेघ और ऋतु बीच
मची रही. ''तुम सांड
हो पर्जन्य. सभ्यता का
नाममात्र नहीं. कवि
कहते रहे बहुत
तुमपर किन्तु कभी
कविता तुमने पढ़ी
नहीं.' रिसिया गयी थी 
ऋतुजी, यों अचानक 
खुल जाने पर देर
तक यत्न से सजाया
खोंपा. तभी धूमध्वज 
प्रत्यग्रवय धुरवें 
का वज्रनिर्घोष सुन
जाग पड़ी थी प्रौढ़ाएं
जो अपराह्न-निद्रा से;
लौट गयी इन्द्र को दो-
चार गालियाँ दें. लौट
गयी भीतर चढ़ाने 
चाय की पतीली. खड़े
रहे यायावर छज्जे 
की छांह; करते रहे 
प्रतीक्षा विलम्ब तक.

विलम्ब तक मेघों का 
मल्हारगंज में मचा
रहा भीषण उत्पात.  

{कुरबक का फूल वृद्धवसंत अथवा ग्रीष्मांत में खिलना बताया गया हैं. इसे लोक में कटसरैया भी कहते हैं. हालाँकि इसके फूल पीतवरनी होते हैं किन्तु कवियों ने इन्हें श्याम वर्ण का कहा हैं. कुरबक मानसून के आते ही झड़ जाता हैं. }

बाढ़  

साढ़े छः इंच वृष्टि रात्रिमात्र
में हो गयी. शिप्रा खतरे के
निशाँ से सात फुट ऊपर बहती
हैं. दिन में भी अन्धकार हैं.
भयभीत हैं पूरा देवास. मौसम
विभाग ने दी हैं भारी वर्षा की
चेतावनी. स्कूलों में अवकाश हैं,
दफ्तर-कारखाने बंद. दूध
मिलना मुश्किल. भदवारे का आठवां 
दिवस-धूम्र, ज्योति, जल वायु से
गुथीं- दिशा से दिशा तक बंधी हैं
धारावर्षी माला. पूरे दिन बरसते रहे 
धारासार. फूली हुई भैसों की देह 
तैरती हैं जल में. माचिस की तीली की
नोक पर ही बची हैं आग. डोंगियों
पर कठैत युवाओं का दल पानी में
फंसे लोगों को बचा रहा हैं; टार्च
और लालटेन की रौशनी में. जो
कर ले मेघ जो कर ले अन्धकार ,
बचा रहा हैं मनख बच रहे हैं प्राण;
तो क्या जो एक
नमक का पूड़ा मिलना भी हैं मुहाल. 


Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास

शिवानी (प्रसिद्द पत्रकार सुश्री मृणाल पांडेय जी की माताजी)  ने अपने उपन्यास "शमशान चम्पा" में एक जिक्र किया है चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास अवगुण तुझमे एक है भ्रमर ना आवें पास.    बहुत सालों तक वो परेशान होती रही कि आखिर चम्पा के पेड़ पर भंवरा क्यों नहीं आता......( वानस्पतिक रूप से चम्पा के फूलों पर भंवरा नहीं आता और इनमे नैसर्गिक परागण होता है) मै अक्सर अपनी एक मित्र को छेड़ा करता था कमोबेश रोज.......एक दिन उज्जैन के जिला शिक्षा केन्द्र में सुबह की बात होगी मैंने अपनी मित्र को फ़िर यही कहा.चम्पा तुझमे तीन गुण.............. तो एक शिक्षक महाशय से रहा नहीं गया और बोले कि क्या आप जानते है कि ऐसा क्यों है ? मैंने और मेरी मित्र ने कहा कि नहीं तो वे बोले......... चम्पा वरणी राधिका, भ्रमर कृष्ण का दास  यही कारण अवगुण भया,  भ्रमर ना आवें पास.    यह अदभुत उत्तर था दिमाग एकदम से सन्न रह गया मैंने आकर शिवानी जी को एक पत्र लिखा और कहा कि हमारे मालवे में इसका यह उत्तर है. शिवानी जी का पोस्ट कार्ड आया कि "'संदीप, जिस सवाल का मै सालों से उत्तर खोज रही थी व...