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Bhiga man , Drisht kavi, Khari Khari and other Posts 22 to 30 June 2020

मध्यम वर्गीय - दो कौड़ी की औकात है तेरी ◆◆◆ मध्यम वर्ग झुनझुना बजाओ - तुम इसी लायक हो कमीनो, मेहनत करो, टैक्स भरो और घण्टा बजाओ इस धन्यवाद और नमन की माला बनाकर गले में पहन लो और जुलूस निकालो अपना याद आते है अपनी लॉ की कक्षा के वे छात्र जो डेढ़ दो लाख की बाइक पर आते है, एक्टिवा चलाते है, रोज पार्टियां करते है - हजार डेढ़ हजार यूँही उड़ा देते है और स्कॉलरशिप लेते है - अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़े होने के नाते, मुफ्त की किताबें, रजिस्टर - पेन लेते है और बेच देते है सबकुछ और हम मध्यम वर्गीय जेब से रुपया लगाकर किताबें खरीदे, फीस भरें और चुपचाप भी रहें - क्योकि मध्यम वर्गीय है इस देश मे सिवाय जूते खाने के कुछ और है ही नही बोलों मत - सब सहो और समर्पण करते रहो, जिन लोगों को सड़कों पर पैदल चलते देख सहानुभूति जन्मी थी वे लोग एक माह भी नही हुआ और ट्रेन और वॉल्वो में बैठकर पुनः मजदूरी पर जाने लगे हैं - सही है कि सरकार कुछ नही कर पा रही तो मजदूरी करना पड़ेगी, गांव में नही मिलेगी पर इस मध्यमवर्ग को तो आप चूतिया समझकर लॉक डाउन के नाम पर मार डाला और जिनकी नौकरियां सुरक्षित रही उनकी तनख्वाह...

Posts from 4 to 23 June 2020 Drisht kavi, khari khari

पूरा मुहल्ला रात को दो बजे इकठ्ठा हो गया जब कविराज की पत्नी की भयानक कराहने, चिल्लाने की और दहाड़े मारकर रोने की आवाज सुनी सबने तो वर्मा जी ने धीरे से हिम्मत की भीड़ में - कविराज की श्रीमती से पूछने कि - " भाभीजी हुआ क्या , कोई चोर आया क्या " जमा भीड़ को अपने पक्ष में देखकर भाभीजी पहले तो दहाड़े मारकर फिर से पाँच मिनिट रोई, फिर चिल्लाकर बोली डेढ़ बजे से ये पूछ रहें है - " आवाज आ रही है, आवाज आ रही है, पता नही क्या हो गया, बार - बार चश्मा ठीक करते हैं, बाल सँवारते है ...आठ दिन हो गए अब " भीड़ खिसकने लगी थी और कविराज बड़बड़ाये जा रहें थे - बरामदे में खड़े, "आवाज़ आ रही है ........." # दृष्ट_कवि *** यादों की पोटली को सहेजकर रखिये - एक मुस्कान, एक संवाद या एक मुलाकात की पोटली जीवन को जीना सीखा सकती है - यह सूख गई या भीग गई तो सब बह जाएगा # भीगा_मन *** ग्रहण का शीदा दे दो सफाई वाली जोर जोर से आवाज लगा रही है - झाँककर देखा तो उसके दोनो बच्चे भी थे साथ मे , दोनो के हाथ मे दो - दो बड़ी बोरियां भरी हुई , कचरे की गाड़ी पर आज अलग बड़ी बोरी थी भर...