मालवा में संतों का सच्चा समागम ____________________________ मुझे याद पड़ता है एकलव्य में किया अपना कार्यकाल सन 1990 - 91 का - जब हम जिले में कई प्रकार की प्रक्रियायें आरम्भ का रहे थे, शिक्षा के साथ जन मद्दों पर व्यापक समुदायों को जोड़ना क्योकि देश का माहौल विचित्र था लगभग आज की तरह और इस सबमे ६ दिसंबर की दुर्घटना हो गई थी. कई कामों के साथ कबीर भजन एवं विचार मंच का काम शुरू किया था, क्योकि पक्का कबीर गाने वाले तो महफ़िलों और अपनी आत्म मुग्धता में व्यस्त थे. मालवा में कबीर की वाचिक परम्परा के अध्येत्ता बहुतेरे मिल जायेंगे पर जमीनी स्तर पर काम करके कबीर को गाने वाले और कबीर को अपने जीवन में साक्षात उतारने वाले सिर्फ और सिर्फ मालवा में ही मिलेंगे. नारायणजी, टिपान्याजी, कालूराम जी, मांगीलाल जी, ताराचंद जी, देवनारायण जी हो या कोई और हर गाँव में कबीर को जिन्दा रखने वाले ये परिश्रमी साथी मालवा की ताकत भी है और ऊर्जा भी. ये किसी भी ऊँची, महंगी और कमाई वाली महफ़िलों से दूर रहकर काम करते आ रहे है और वाचिक परम्परा को जीवित रखकर इतिहास बना रहे है. डा सुरेश पटेल, पनागार, जबलपुर के रहव...
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