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थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे -अशोक वाजपेयी

"विदा" तुम चले जाओगे पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे जैसे रह जाती है पहली बारिश के बाद  हवा में धरती की सोंधी-सी गंध  भोर के उजास में  थोड़ा-सा चंद्रमा खंडहर हो रहे मंदिर में अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार तुम चले जाओगे पर थोड़ी-सी हँसी आँखों की थोड़ी-सी चमक हाथ की बनी थोड़ी-सी कॉफी यहीं रह जाएँगे प्रेम के इस सुनसान में तुम चले जाओगे पर मेरे पास रह जाएगी प्रार्थना की तरह पवित्र और अदम्य तुम्हारी उपस्थिति, छंद की तरह गूँजता तुम्हारे पास होने का अहसास तुम चले जाओगे और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे -अशोक वाजपेयी

An Epitaph

एक नया जीवन चाहिए होगा, नए लोग, नई प्रेरणाएँ, नए स्वप्न, और नई जमीन - जहाँ जाकर सुप्तावस्था से जागकर पोषित - पल्लवित होना होगा तभी बात बनेगी............आज 'ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा' पांचवी बार देखकर लगा कि हम नए अध्याय तभी लिख सकते है जब अपने अंदर के डर निकाल दें और फ़िर दूर कही गहरे पानी पैठें या ऊँचे आसमान में निर्द्वंद उड़े !!! अपने कच्चे पक्के सपनों को ऊँची उड़ान देना जरूरी है. बस सपने साफ हो, कही से मटमैलापन उनके आसपास ना छलकता हो, उन सभी लोगों से दूर रहना होगा जो कही से अपने होने का दम भरते है, उस माहौल से दूर जाना होगा जो आपको एक फेंटेसी की दुनिया में वास्तविकता का बोध कराये चाहे वो टमाटर उत्सव जैसा गल्प या बैलो की दौड़ हो या अपने अतीत की काली परछाईयों से मुक्ति की कामना. Epitaph  28th May 2013 कौन ठगवा नगरिया लूटल हो चंदन काठ के बनल खटोलाता पर दुलहिन सूतल हो उठो सखी री माँग संवारो दुलहा मो से रूठल हो आये जम राजा पलंग चढ़ि बैठा नैनन अंसुवा टूटल हो चार जाने मिल खाट उठाइन चहुँ दिसि धूं धूं उठल हो कहत कबीर सुनो भाई साधो जग से नाता छूटल...  

प्यार तभी हो सकता है जब आप गहरी घृणा को अपनाने के लिए तैयार हो……

हम    सब अंदर से कितने खोखले है और दिखावा ऐसा करते है मानो सृष्टि के रचयिता हम स्वयं हो .......... भूलना    चाहते हो सब कुछ तो पहले उस सबको याद करो जिसमे तुम हताहत हुए थे, तार-तार हो गई थी इज्जत तुम्हारी, छलनी कर दिए गये थे तुम्हारे स्वप्न उनींदे से, रौंद दिया गया था सारे दिवास्वप्नों को भर दोपहरी में और फ़िर लादकर अपना वजूद तुम पर कहा गया था कि लो तुम्हें अब आजाद किया जाओ.... विचरों संसार में और मत भूलना कि सब नश्वर है, माया है और यही चुकाना पडता है लिए-दिए का.........बस याद रखो...... यह सब चुकता करो एक-एक हिसाब और निकल पडो.... उस अंतहीन यात्रा पर जो हर पल खत्म हो रही है तुम्हारे भीतर बगैर किसी का संज्ञान लिए......... बचना    चाहते हो तो इन्हें मारना होगा पहले जो बचाने का स्वांग धरकर तुम्हारे भीतर पैठ करके बैठे है जीवन    की सार्थकता अपनी मौत के आईने में ही देखी जा सकती है जब तक मौत को आप अपने समक्ष नहीं देखते तब तक जीवन को ढोते और खींचते चले जाने का कोई और अर्थ तो नहीं है प्यार    त...

स्वास्थय की दुर्गति और माधुरी बहन की नाजायज गिरफ्तारी.

माधुरी बहन को मप्र शासन के नुमाइंदों ने गिरफ्तार किया. बडवानी मे मनरेगा का बदला लेने के लिए बेताब जिलाधीश और शासन को आखिरकार एक ऐसा मौका मिल ही गया कि वे माधुरी बहन को गिरफ्तार कर लें. एक झूठे मामले मे उन्हें गिरफ्तार करके डरा हुआ प्रशासन क्या साबित करना चाहता है. जननी सुरक्षा के इतने बुरे हाल है कि सडकों पर प्रसुतियाँ रोज हो रही है और सरकारी अस्पताल कुछ नहीं कर रहें. हाल ही मै मैंने एक अध्ययन समाप्त किया तो पाया कि नगद राशि के प्रलोभनों की स्थिति बहुत खराब है खासकरके स्वास्थय विभाग मे. मेरे अध्ययन के दौरान ही सागर के जच्चा वार्ड मे दो नवजातों की मृत्यु हो गई थी, दोनों सद्य प्रसूताओं ने बताया था कि अस्पताल मे डाक्टर ड्यूटी पर होते हुए भी नहीं पहुंचे थे वार्ड मे, जब मैंने सम्बंधित अधिकारी और ड्यूटी डाक्टर से कहा और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थय मिशन के नियमों का हवाला देते हुए "डेथ आडिट" का पूछा तो बताया गया कि जब वो नवजात बीमार था तो सम्बंधित महिला डाक्टर आपरेशन वार्ड मे तीन महिलाओं के आपरेशन कर रही थी और शिशु रोग विशेषग्य अपनी सीट पर नहीं थे. बाकि जच्चा वार्डों की हालत बह...

बदलना ही होगा वह सब जो सिर्फ और सिर्फ बदलने से ही बदलेगा.........

उसने कहा तो था कि कि वो जंग जीत लेगा - पर धीरे धीरे शाम ढलने लगी, सूरज मद्धम होता गया........कही दूर सडकों पर परछाईयाँ लंबी होती गई और फ़िर वो थक हार कर एक जगह बैठ गया, बहुत सोचा बिचारा, अपने दोस्तों को याद किया, सारे पाप-पुण्यों को याद करता हुआ चुपचाप बैठा रहा और फ़िर उसने अपने चारों ओर एक बार घूम कर देखा, बहुत बारीकी से आने वाली हर आवाज को सुना- महसूसा और फ़िर पाया कि यही समय है एक निर्णय लेने का....अचानक उसे याद आया कि कई कागजात है उसके पास यहाँ-वहाँ और फ़िर त्वरित गति से भागता हुआ अपने दडबे मे गया और खोल दी उसने पोटली और बिखेर दिए वो सब कागज़ जो उसके होने को परिभाषित करते थे और उसकी अस्मिता को इतने सालों से सहेजकर रख रहे थे............बस अब मोह खत्म हो गया था.......हाथों मे एक खाली झोला रखा और चल दिया अपने लक्ष्य की ओर.... और आज उसे किसी की पर्वाह नहीं है, आज उसे किसी का डर नहीं है, आज उसे किसी की नहीं सुननी है, आज उसे किसी माकूल फैसलें पर पहुँचना ही है, ताकि आने वाले समय मे फ़िर कोई इस तरह से हैरान ना हो............ इस तरह से ज़िंदा रहने का कोई मतलब नहीं है कब तक ढोया जाये........बस अब...

The Harsh reality.......

The Harsh reality.......