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चटोरे नहीं हैं हमारे दादा

Sonu Upadhyay has written a beautiful Poem for me today Morning संग अपने ढेर मिठाई लाए दादा लेकिन, बडे सयाने बच्‍चों को हर बार चिढाते मिठाई बांटने सबको बुलाते लेकिन पहले खुद ही खाते खाली हो गए सभी कटोरे, दादा हमारे बहुत चटोरे घंटो तक है फुल्‍लो रोई दिन भर रही खोई-खोई खेल, खिलौने, मिठाई भूली दादा की मूंछों से डरकर सोई दादा से है फुल्‍लो रूठी आंख छुपाए, मोटी मोटी दादा पर है चुप्‍पी साधी मिठाई चट कर गए हैं सारी अब तो फुल्‍लो आंख तरेरे, दादा हमारे बहुत चटोरे फुल्‍लो की प्‍यारी है पलटन आंख मिचौली खेले हर दम रानी, गोलू, बंटी सारे धूम मचाए, गली में सारे फूल्‍लो लेकिन चुप बैठी है दादा से अब भी रूठी है खेल खिलौने, मिठाई पटाखे कुछ नहीं लाए दादा हमारे उदास है आंगन के मोगरे , दादा हमारे बहुत चटोरे... देखो दीवाली की सांझ है आई पलटन ने दादा की परेड लगाई बोले दादा कुछ नहीं लाए खाली हाथ कैसे घर आए मिठाई लाए पर खुद निपटाए हमने कितनी बाट है जोही फुल्‍लो देखो आंख दिखाए आंगन-आंगन लोट लगाए शोर मचाए पलटन के छोरे.. दादा हमारे बहुत चटोरे... पलटन से घिरे हैं दादा जमा चौकडी शोर मचाए दादा डांटे, थोडा...

कहीं पीआर एजेंसी वाले भी जेएनयू को ठिकाना न बना लें!- ♦ विनीत कुमार

जेएनयू में मनोज वाजपेयी से जुड़े आयोजन पर वरिष्‍ठ पत्रकार दिलीप मंडल की व्‍याख्‍या के मद्देनजर युवा मीडिया क्रिटिक विनीत कुमार ने भी अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की है : मॉडरेटर म नोज वाजपेयी के जेएनयू जाने और वहां के छात्रों के लहालोट हो जाने पर दिलीप मंडल ने जो सवाल उठाये हैं और उसके बाद बहस की जो गर्माहट पैदा हुई है, वो दरअसल अकादमिक संस्थानों को सिनेमा प्रोमोशन के लिए कम लागत के अड्डे के तौर पर विकसित होने की आशंका और जेएनयू जैसे शिक्षण संस्थानों में पढ़ रहे छात्रों के व्यवहार को लेकर है। मुझे नहीं लगता है कि आनन-फानन में इसे स्कूल-कॉलेजों की वाद-विवाद प्रतियोगिता की तरह एक शीर्षक बनाकर पक्ष-विपक्ष में कतारें खड़ी कर देनी चाहिए। दिलीप मंडल की बात पर जैसे बाकी लोगों ने असहमति दर्ज की है, उसी क्रम में आगे बढ़ने के बजाय इस सिरे से बात करना ज्यादा सही होगा कि वो दरअसल कहना क्या चाह रहे हैं और किस स्थिति को लेकर बात कर रहे हैं? सीधा सवाल है , आज मनोज वाजपेयी तो कल शाहरुख खान क्यों नहीं, परसों कैटरीना कैफ और परसों राखी सावंत क्यों नहीं? संभव है कल शाहरुख खान आना चाहें और उ...
'वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफत भी अता करे तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो।" -बशीर बद्र

आज तक हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समंदर मेरा किससे पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ बरसों से हर जगह ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे मेरी आँखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा मुद्दतें बीत गईं ख़्वाब सुहाना देखे जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा आईना देखके निकला था मैं घर से बाहर आज तक हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा -निदा फ़ाज़ली

मन की गाँठे

इतनी देर हो गयी है आसमान कैसे मटमैला सा हो रहा है और सूरज का अभी तक कोई अता -पता नहीं है लगता है जैसे शाम की गोधूली बेला अभी तक खत्म नहीं हुई है पूरी रात अपना आँचल पसारकर चली गयी है, पशु रंभाते हुए जंगल चले गए है, मानुस जात अपने काम धंधे में लग गयी है, पर रोशनी का पता नहीं है- ना धूप है ना हवा, गली मोहल्लो में कबाडा इकठ्ठे करने वाले चिल्ला रहे है और घर की सफाई से निकली बेहद काम की चीजें कबाड़े में जा रही है!!! कैसा समय है ये जो सालो से सहेजी चीजों को एक ही झटके में सड़क पर खड़े गंदे से ठेले पर ला रहा है, जैसे ढो रहा था अभी तक रिश्तों के मानिंद संबंधो को??? अचानक याद आया कि सूरज अभी तक गायब है और एक धुंआ सा, अन्धेरा सा, हांफता सा उजाला पूरा दम लगाकर इसे सुबह बनाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है तो तब लगा कि प्रयास तो करने ही पड़ते है अँधेरे से लडने के या रिश्तों को बनाए रखने के, बोलना तो पडता ही है चाहे कोई कितना भी शुष्क हो जाए भावनाओं की जमीन पर, अपने जीने के लिए तो मरना ही पडता है बार-बार ताकि एक दिन सुकून से पूरी तडफ और बेचैनी के साथ चिरनिद्रा में सोया जा सके....और इस कलरव से दूर, कही बह...

मन की गाँठे

बड़ी दुविधा में हूँ कहा तो यह था कि आ जाना, कहा तो यह भी था कि यही रुक जाना, कहा तो यह भी था कि अब मेरा कोई भरोसा नहीं है फ़िर आनेवाले दस पन्द्रह बरस किसने देखे है, बाहर जानेपर कोई लौटता नहीं है, और वो इसीलिए तो मेरे साथ आने को तत्पर है कि लौटना तो होगा नहीं फ़िर तुम, ये, वो, सब कुछ यही छूट जाएगा, होता है और कोई ये नई बात तो है नहीं, इंसानी सभ्यता में में कोई अकेला तो रहूंगा नहीं जो जाकर ना लौटूं या आना भी होगा तो बहुत से बहुत दो तीन साल में एकाध बार, और फ़िर वो दस पन्द्रह दिन तो मेरे लिए होंगे ना-- ना कि तुम्हारे लिए, इतना बड़ा कुनबा हो जाएगा दोस्तों यारों और रिश्तेदारों का कि मुझे नहीं लगता कि तुम्हारे लिए समय निकाल भी पाउँगा, बेहतर है यही सही समय है जब कोई होगा नहीं तुम्हारी भी तमन्ना पूरी हो जायेगी, थोड़ा सा साथ रह लेंगे, घूम लेंगे और कुछ छोटी मोटी खरीददारी भी कर लेंगे, हालांकि पैसे तो है नहीं, फ़िर भी देखेंगे-वैसे भी तुम ही करोगे खर्च मुझे पता है....खैर बोलो ना आ रहे हो क्या, दरअसल में फ़िर मुझे प्लान करना पडेगा शायद हवाई जहाज से एक राउंड में वहाँ हो आऊ, तुम आ जाते तो एक झंझट खत्म हो जात...