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एनजीओ पुराण भाग अठारह

आज वडगाँव में गए थे एक आदमी से मिले जिसका नाम रावण था पुछने पर उसने बताया की बचपन में उसका नाम श्रावण था पर लोगो ने रावण कर दिया , तब से आज ५५ वर्षो से वो इसी नाम के साथ ज़िंदा है. दस्तावेजो में भी वो रावण ही है, कितना मुश्किल है गलत नाम के साथ जीना और वो भी ऐसे नाम के साथ जो समाज में निंदनीय हो . शर्मनाक है यह सब और धन्य है श्रावण जो सबके बाद भी खुश है (इतिश्री एनजीओ पुराण भाग अठारह समाप्त )

एनजीओ पुराण भाग सत्रह

ये देश का बड़ा नामी गिरामी संस्थान था जहां खूब समाज सेवा का काम भी होता था और देश के भावी रेडिकल चेंज एजेंट तैयार होते थे, सिगरेट, दारू और धूए के बीच में नयी पीढ़ी देश के लिए प्लान बनाती थी, और दिनभर अपने इशक में डूबी रहती थी हाँ इस सबमे हदे पार हो जाना कोइ नई बात नहीं थी, इसे देश में बदलाव की बयार के रूप में देखा जाता था, हाँ इससे बेचारे छोटे शहरों से आये लोगो को बड़ा अजीब लगता था पर उनकी सुनता कौन था(इतिश्री एनजीओ पुराण भाग सत्रह समाप्त)

एनजीओ पुराण भाग सोलह

वो देश के पिछड़े इलाके में उस संस्था में काम के लिए चयनित हुई थी उससे स्पष्ट रूप से पूछा गया था कि क्या वो इन पिछड़े आदिवासियों कि बोली जानती है? उसके हाँ कहने पर ही उसे इस गरीब इलाके में भेजा गया था, पर जब रपट लिखने की बारी आई तो उससे बेहतरीन अंगरेजी में रपट लिखने को कहा गया क्योकि संस्था के लोग और रूपया देने वाले इन गंवारो की भाषा नहीं समझते थे(इतिश्री एनजीओ पुराण भाग सोलह समाप्त)

एनजीओ पुराण भाग पन्द्रह

वो देश के पिछड़े इलाके में काम करता था लंबी लंबी यात्राये निकालना उसका पेशा था, और साल के छह माह वो विदेश में रहता था क्योकि यहाँ की गर्मी उसे सहन नहीं होती थी,राज्य के कमोबेश हर जिले में उसके ऑफिस थे जहा वो हर विदेश यात्रा से लाई नई उम्र की कमसिन लड़कियों के साथ रहता था और उन्हें अपनी नई पत्नी बताता था. में चकित हूँ उसकी मेधा पर, आज भी यह खेल जारी है, उसका में कायल हूँ (इतिश्री एनजीओ पुराण भाग पन्द्रह समाप्त)

एनजीओ पुराण भाग चौदह

यदि कोई आपको बिना मांगे सलाह दे, ऐसी जानकारी दे जिसके बारे में आप जानते हो और जिसको जानने से कोइ फ़ायदा नहीं हो और कुछ नुकसान भी ना हो तो यकीन मानिए वो व्यक्ति एनजीओ वाला ही होगा (इतिश्री एनजीओ पुराण भाग चौदह समाप्त)

एनजीओ पुराण भाग तेरह

संस्था को गांव में शौचालय बनाने का ठेका मिला था, सारे गांव में यदि शौचालय बन जायेंगे तो संस्था के फायदे के साथ लोगो को भी फ़ायदा होगा, इस हेतु सब घूम रहे थे . एक घर के आगे बहुत झिक झिक के बाद एक गरीब सी दुबली पतली महिला ने कहा कि बाई जी, खाने को ही कुच्छ नहीं तो संडास बनवाकर क्या करेंगे पेट में कुछ जाए तो संडास में जाए ना?(इतिश्री एनजीओ पुराण भाग तेरह समाप्त)

अंबर रंजना पाण्डेय की कविताएं

अंबर रंजना पाण्डेय की कविताएं पहली ही नजर में अपने गठन और कथ्य के कारण चौंकाती हैं। लेकिन इन कविताओं के भीतर प्रवेश करने पर हमें कविता का एक अजस्त्र स्त्रोत दिखायी पड़ता है जिसमें हम खोते चले जाते हैं। अंबर लय और तुक में कई तरह के प्रयोग करते दिखते हैं। उनके कहन में एक अलहदा किस्म की सुगंध है। इन कई कारणों से अंबर कवि और कविताओं की भीड़ में अलग से पहचाने जा सकते हैं। एक दाड़ो दोई हाथ नयन मिलाये पर फोड़ दिए काम न आये जी तोड़ दिए तात-मात रोग में छोड़ दिए निज भ्राता लूट, ठोंका माथ दुखी-दीन पलटकर न देखे लुन्ठना, लीलना ही लेखे नख से शिख मेखें ही मेखें किया कुकर्म धोबन के साथ. दो सुनो मेरी कथा जीवन गया बृथा बाहर सारे वैभव भीतर भरी व्यथा सुनो मेरी कथा इस तरह जीने को मैं बार बार मरा हूँ गटागट जहर पिया कुछ यों मुझ लोलुप तुकबंद ने जीवन जिया भर घाम एक पाँव ठाढ़ा रहा हाट बीच सब बेचा-खरीदा भू, भवन, भूषण, वसन, अवसन देह, नेह, तिया शेष बूढ़ा पिंड फूटी आँख, टूटे हाथ, पछताता हिया लगा गया काल माथे के नीचे पाथर का तकिया तीन संगी मिलना बहुत दुहेला घाम की घुमरी में हैं बस बेला की धूल दोपहर ठाढ़ी लिल...