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दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ

यूँही ही हमेशा जुल्म से उलझती रही है खल्क( जनता) न उनकी रस्म नयी है न अपनी रीत नयी यूँही हमेशा खिलाये है हमने आग में फूल न उनकी हार नयी है न अपनी जीत नयी फैज़ अहमद फैज़

अम्बर की एक और कविता......

दो नदियाँ: लखुंदर और महानदी Share Yesterday at 12:22am लखुंदर नदी में दोलते है सहस्रों सूर्य, स्वच्छ दर्पण झिलमिला रहा हैं. मुख न देख पाओगी तुम स्नान के पश्चात्, छांह ज्यों ही पड़ेगी सूर्य का चपल बिम्ब घंघोल देगा आकृति, पुतलियाँ ही दिखेंगी तैरती मछलियों सी, इस वर्ष वर्षा बहुत हुई है इसलिए अब तक ऊपर ऊपर तक भरी है नदी. पूछता हूँ 'नदी का नाम लखुंदर कैसे पड़ गया?' युवा नाविक बता नहीं पाता 'लखुंदर' का तत्सम रूप क्या होगा... नांव हो जाती है तब तक पार दिखती हैं मंदिर की ध्वजा अगली बार 'नहाऊंगा नदी में' करते हुए संकल्प चढ़ता हूँ सीढियां. पीछे जल बुलाता हैं. महानदी मध्यदेश का सीना ताम्बई, स्थूल व रोमिल. पड़ी है महानदी उस पर, पहनकर वनों की मेखला घिसे रजत की श्याम द्रोण के सूती नीलाम्बर से ढंके देह मेदस्वी, बाट जोह रही सूर्ज की. मछलियाँ पेट में कर रही है निरंतर उत्पात. दिनों से मछुआरों का दल नहीं आया. उदबिलावों का झुण्ड ही उदरस्थ करता हैं शैतान मछलियाँ पर यह तो सहस्र हैं. अब सहन न होती यह चपलता. कब आएँगी यहाँ घनचुम्बी पालों वाली नांवें, डालेंगी ज...

अम्बर पांडे की बेहतरीन कविता

अम्बर पांडे मेरे अच्छे दोस्तों में शरीक है और मेरी साहित्यिक भाषा में कहू तो अम्बर मेरा भावनात्मक संबल है जिसे अंग्रेजी में Emotional Anchor कहते है उसकी मेधा का में कायल हूँ और जो समझ उसकी कविता को लेकर है वो अप्रतिम है में हमेशा अम्बर से कहता हूँ कि मेरा सब कुछ ले लो और अपनी कविताये मेरे नाम कर दो और बस मुस्कुराकर कहता है कि आप भी न...... बस............. कविता दारिद्र और विद्या {हमारे संस्कृत के गुरु बिंदुमाधव मिश्र की बातें , जिसे मैंने कविता मे बांध लिया है.} तम्बाकू निगल लिया हो भैया जैसे अपना जीवन बस ऐसे ही बीत गया. साल दो साल जो और है ऐसे ही निबट जायेंगे वह भी. दो जून का चून लकड़ी-कपडा-तेल-नून बखत पर मिल गए अपने लिए पर्व हो गया. कितना कुछ करने को रह गया जीवन जुटाने मे ही लग गया जीने के उपकरण हजार किये खटकरम कट गयी जैसी कटनी थी तुम बताओ क्या क्या पढ़ रहे हो? उससे भी बढ़कर लिख क्या रहे हो बन्धु आजकल और यह क्या इतने दुबलाते क्यों जा रहे हो काठ जैसे दिख रहे है हाथ जरा दही-दूध पिया करो घी खाओ में तो नहीं हो पाया तुम्हारा चक्रपाणि ब्रह्मचारी मगर तुम्हे मेरा महापंडित जरूर बनना...
खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर/ दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बग़ैर। मैं क्यूँकर कहूँ तुम आओ कि दिल की कशिश से वो आयेँगे दौड़े आप मेरे घर कहे बग़ैर। क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें लब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बग़ैर। बेदर्द तू सुने न सुने लेकिन ये दर्द-ए-दिल रहता नहीं है आशिक़-ए-मुज़तर कहे बग़ैर। तकदीर के सिवा नहीं मिलता कहीं से भी दिलवाता ऐ "ज़फ़र" है मुक़द्दर कहे बग़ैर। - बहादुर शाह ज़फ़र

सारा लोहा उन लोगो का अपनी केवल धार ........

कुछ लोगों ने अपनी धार तेज करना शुरु किया। इतनी धार लगाई कि बस धार ही रह गई, लोहा खत्म हो गया... अब अपनी केवल धार लेकर एक-दूसरे से ही लोहा ले रहे हैं...।’

सतपुड़ा के घने जंगल.....

बचपन में पढ़ी एक खुबसूरत कविता मयूर दुबे के सौजन्य से ......... " सतपुड़ा के घने जंगल। नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। झाड ऊँचे और नीचे , चुप खड़े हैं आँख मीचे , घास चुप है , कास चुप है मूक शाल , पलाश चुप है। बन सके तो धँसो इनमें , धँस न पाती हवा जिनमें , सतपुड़ा के घने जंगल ऊँघते अनमने जंगल। सड़े पत्ते , गले पत्ते , हरे पत्ते , जले पत्ते , वन्य पथ को ढँक रहे - से पंक - दल मे पले पत्ते। चलो इन पर चल सको तो , दलो इनको दल सको तो , ये घिनोने , घने जंगल नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। अटपटी - उलझी लताऐं , डालियों को खींच खाऐं , पैर को पकड़ें अचानक , प्राण को कस लें कपाऐं। सांप सी काली लताऐं बला की पाली लताऐं लताओं के बने जंगल नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। मकड़ियों के जाल मुँह पर , ...

देवास के नर्मदा नायक और देवास में पानी के लिए मरते खलनायक

नईम जी की स्मृति में उस दिन कार्यक्रम था हम दोपहर को नईम जी घर से भोजन कर लौट रहे थे अचानक महेश्वर ने कहा कि वो क्या है ...... मैंने बहादुर को कहा कि भाई गाड़ी रोको फिर महेश्वर और ओम प्रभाकर को भी गाड़ी से उतरने को कहा फिर उन्हें ये अद्भुत दृश्य दिखाया देवास में पानी कि समस्या नई नहीं है ये वही मालवा का शहर है जहाँ "डग डग रोटी -पग पग नीर " की बात खून में डाली जाती है पर पानी तो खत्म हो गया है आज मेरे शहर में हर १२ दिनों में पानी आता है कितने ही नेता जीत गए हम सब को उल्लू बनाकर पर पानी नहीं आया हाँ अब रोज़ झगड़े होने लगे है खून हो जाते है पर हमारे नर्मदा नायको और नायिकाओ को कोई फर्क नहीं पड़ता ॥ महेश्वर ये देखकर विचलित हो गए पर क्या कोई हमारे शहर का बाशिंदा इस पीड़ा को समझेगा??? अब तो इतना भी पानी नहीं की इन्हें कहू कि डूब मरो चुल्लू भर पानी में ...........