Skip to main content

Tanweer Farukhi, Khair Khari, Drisht Kavi, Man Ko Chiththi and other Posts from 9 to 23 Jan 2026

एक युवा साथी से बात हो रही थी अभी - जो सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे हैं और काफी समझदार हैं, समझदार से आशय सिर्फ व्यवहारिक समझदारी से नहीं - परंतु पढ़ाई और अकादमिक समझ से भी है
उस मित्र ने पूछा कि - "सर आप इतना रोज घूमते हो, 60 साल की उम्र होने को आई है तो रोज बदलती हुई दुनिया कैसे नजर आती है"
मैंने जवाब दिया -
"दुनिया में अच्छे लोग ज्यादा हैं, दुनिया गोल है और हम सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और मेरी यह बात रोज पुख्ता होती है - जब तुम जैसे प्यारे लोग मिलते हैं अच्छी बातें होती है और बहुत प्यार - सम्मान मिलता है, कोशिश करता हूँ कि वही लोगों को लौटा सकूं - तभी यह दुनिया हम तुम जैसे अच्छे लोगों को देकर एक दिन विदा हो जाएंगे"
***
तमाम पुस्तक मेलों, चर्चाओं, गोष्ठियों, कार्यशालाओं और वैचारिक मंथनों के बाद, हिंदी विभागों से बंटने वाली पीएचडी की डिग्रियों बाद पढ़ने वाली एक पूरी कौम खत्म हो गई, लिखने वाली नई कौम पैदा हुई है - जो नई हिंदी या फ़ड़तूस किस्म का लेखन करके जबरन का बौद्धिक आतंक पैदा कर रही है और आत्म मुग्ध होकर अपना कूड़ा बेच रही है, इनका ना साहित्य से सरोकार है - ना लेखन से और ना किसी प्रकार की कोई प्रतिबद्धता और अपने कुत्ते-बिल्ली से लेकर बीबियों की आड़ में ये रोज बकर करके ज्ञानी बनते है
इस समय तमाम ऊबे-दुबे, शर्मा, तिवारी, पांडेय, जोशी, श्रीवास्तव से लेकर सिन्हा, ठाकुर और उप्ता, गुप्ता या अलाने-फलाने, हुजूर, कुजूर, वर्मा, सोलंकी, मालवीय या कोई भी पुस्तक छपाने के मोह से बचा नहीं है, पढ़ी चार किताबें भी नहीं है, पुस्तक मेले में जाना एक शौक और शोक बन गया है - क्योंकि वहां पीआर है, तितलियां है जो भंवरे खोज रही है और बकलोली ज्यादा है, बस उठा लाते है दो बोरे और पढ़ता कोई नहीं और सार्थक संवाद की गुंजाइश तो बिल्कुल ही खत्म ही कर दी है लोगों ने और यदि कोई बोलें या बात करना चाहे तो ऐसे झपटते है जैसे सड़क के आवारा वफादार कुत्तों पर देश का अपेक्स कोर्ट
क्या ही कहूँ, बस जो है - सो है
***
दुर्भाग्य यह है कि दुनिया के अधिकांश शासक बनाम तानाशाह इस समय उम्र के सातवें या आठवें दशक में है और जिस अंदाज में वे हिंसक तरीके से सत्ता चला रहे है, हिंसक हो रहे है, और नित्य हमले करके दूसरे देशों के निर्दोष नागरिकों, बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं की हत्या कर रहें है और हिंसक हो चुके है वह बेहद शर्मनाक है, हथियारों से लेकर परमाणु बम तक की धमकी ही नहीं दे रहे बल्कि इस्तेमाल करने पर आमादा है - इससे ज्यादा घटियापन हो ही नहीं सकता
दुनिया की राजनीति और कुटिल रणनीतियां बदल रही है और यह संपूर्ण मानवता के लिए घातक है
***
इंस्टाग्राम पर अभी एक रिक्वेस्ट आई
ढेर सारे फोटो थे और ढेर सारे वीडियो
मैंने पूछा - भाई कौन हो, क्या करते हो और क्यों जुड़ना चाहते हो, कभी मिला नहीं, देखा नहीं, कोई कॉमन फ्रेंड नहीं तो फिर यह रिक्वेस्ट क्यों
जवाब मिला -
कवि हूँ, कविता लिखता हूं और आपको अपनी कविताएं सुनाना चाहता हूँ
मैंने कहा "भाग साले" और ब्लॉक कर दिया
और क्या करता, ससुरे कवियों के बोझ से दुनिया एक दिन डूब जाएगी
***
देश की राजधानी में एक काबिल इंजीनियर पानी में डूबने से दो घंटे तड़फता रहा, कोई बचा नहीं पाया और अब उसे बदनाम करने के लिए कहा जा रहा कि वह शराब पीकर पार्टी से आया था, तो क्या शराब पीने वाले को बचाना राज्य की जिम्मेदारी नहीं, क्या सड़क किनारे के गढ्ढों को भरना या सूचना लगाना राज्य की जिम्मेदारी नहीं, पर देश व्यस्त है हिन्दू-मुस्लिम में, लड़ाई, शर्मा-वर्मा को खत्म कर हिन्दू राष्ट्र बनाने में, संभल में, चुनावों में , SIR में और उन बेमतलब की लड़ाइयों में जिसमें आम आदमी का कोई रोल नहीं और मीडिया तो किसी रण्डी से गया बीता हो गया है, एनजीओ से लेकर तमाम समाजसेवी सरकार की गुड बुक में रहना चाहते है - ताकि वे पुरस्कार बटोर सकें और विदेश यात्राएं कर सकें, पत्रकारों ने अपना इमान ही नही बेचा, बल्कि वे किसी दलाल को भी शर्मसार कर दें और ब्यूरोक्रेसी तो भांग नहीं हेरोइन कशिश के नशे में डूबकर सम्पत्ति बनाने में लगी है
निकम्मे धीरेन्द्र से लेकर शंकराचार्य को बचाने में पुलिस से लेकर अदालतें लगी है जो दिन भर आएँ बाएं बकते रहते है पर देश के पढ़े लिखें और काबिल लोगों को बचाने के लिए किसी के पास समय नहीं है, ये लोग एक विवाद रोज पैदा करते है और लड़ाई शुरू हो जाती है, सुप्रीम कोर्ट नब्बे हजार मुकदमे सुलझाने के बजाय इनके वक्तव्यों पर प्राथमिकता से काम करती है जैसे ये अदालतों के एंप्लॉयर है, क्यों ना हिन्दू, मुस्लिम के सारे धर्म गुरुओं को एक साथ सेल्युलर जेल में रखा जाए पांच साल ताकि ये आपस में बैठकर सुलझा के या लड़ मरे कमबख्त
सत्यानाश कर डाला है , मै तो रोज हर एक नई जगह घूमता हूँ काम के सिलसिले में आज तक एक भी तंत्र ठीक काम करते नहीं मिला सिवाय भ्रष्टाचार और दो नम्बर के इमानदारी वाले काम के
मतलब हद यह है कि सड़कों पर अतिक्रमण से लेकर खस्ता हालत, बिजली, पानी, भोजन की दिक्कत से लेकर खेत की नकल या कुछ और कागज लेने में पूरा तंत्र विफल है, चोरी डकैती से लेकर बलात्कार सामान्य हो गया है, पुलिस और कलेक्टर सिर्फ और सिर्फ या तो धार्मिक गुरुओं को संरक्षित कर रहें या राजनेताओं की सभाओं की व्यवस्था कर रहे और आम आदमी को SIR या आधार में नाम बदलवाने में लगा रखा है या क्रिकेट जैसे खेल में युवाओं को व्यस्त रखकर बर्बाद कर रहें है पीढ़ियां
स्कूल, कालेज, अस्पताल, अदालतें सब बर्बाद हो गए है जहां आम जनता को रोज धक्के खाना पड़ रहे है, एक उदाहरण पर्याप्त होगा यह दर्शाने को कि कैसे बर्बाद हो रहा है देश - "देवास इंदौर यानी नेशनल हाईवे नम्बर तीन" के हाल देखिए कभी, मात्र सैंतीस किलोमीटर के तीन घंटे लग रहे सफर में, अभी चार माह पूर्व छह लोग मर गए, पूरी सड़क गढ्ढों से भरी पड़ी है, लोग रोज गिरते है, बुजुर्ग गाड़ियों से गिरते है पर देश में विकास हो रहा है, आठ लेन चाहिए हमे
बड़े ठेकेदार, कलेक्टर, नगर निगम, पंचायतों के अनपढ़ सरपंच से लेकर ट्रैफिक पुलिस का ठुल्ला भी सिर्फ रूपया कमा रहा है, और कारण है कि इंदौर के सबसे महंगे फीनिक्स माल को जगह देनी है, माल बेचना है ताकि इंदौर की भीड़ एबी रोड क्रॉस करके आसानी से आ सकें और फीनिक्स माल का मालिक कौन है यह देखना है
हरि अनंत और हरि कथा अनंता
क्या-क्या और लिखें और फिर इससे क्या होगा
शर्म मगर किसी को आती नहीं
***
"Life's but a walking shadow; a poor player that struts and frets this hour upon the stage, and then is heard no more; it is a tale told by an idiot, full of sound and fury, Signifying nothing"
• William Shakespeare
(Macbeth, Act V Scene 5)
***

“भय”
____
कहा जाता है कि समुद्र में प्रवेश करने से पहले नदी भय से काँप उठती है
वह पीछे मुड़कर उस पथ को देखती है,
जिसे उसने तय किया है
पर्वतों की चोटियों से उतरकर,
वनों और गाँवों को पार करती हुई
लंबी, घुमावदार यात्रा
और उसके सामने फैला है अथाह समुद्र
इतना विशाल कि उसमें प्रवेश करना
मानो सदा के लिए विलीन हो जाना हो
पर कोई दूसरा मार्ग नहीं है
नदी लौट नहीं सकती
कोई भी लौट नहीं सकता
अस्तित्व में पीछे जाना असंभव है
नदी को समुद्र में उतरने का साहस करना ही होगा,
क्योंकि तभी भय मिटेगा
क्योंकि वहीं वह समझ पाएगी
कि यह समुद्र में खो जाना नहीं,
बल्कि समुद्र बन जाना है
• खलील जिब्रान
[ अनुवाद - संदीप नाईक ]
***
तुम अधिकारी बन रहे हो, और सरकार की उसी अकादमी में ट्रेनिंग होगा ना दो हफ्ते का - जो किसी ईसाई मुख्य सचिव के नाम पर बनी है और जिसने इस पिछड़े प्रदेश के शुरुवाती तीन - तीन मुख्यमंत्रियों के साथ ईमानदारी से काम करने का दम भरा था और मरने के पहले शेक्सपियर के एक नाटक से एक कथन को उद्धत करते किताब लिखी थी - "A Tale Told by An Idiot", यह ट्रेनिंग तो बार - बार होगा, मेरी मानो तो ट्रेनिंग गई भाड़ में, अब अधिकारी बन ही गए हो तो देर-सवेर सीख ही जाओगे सब - चार सौ बीसी और चापलूसी भी
सुबह-शाम ठहर कर उस अकादमी के पास वाले शाहपुरा तालाब को जी भर कर निहार लिया करो, उसके किनारे बने पार्क में मुहब्बत के कई किस्से दफन कर आया हूँ - भोपाल छोड़ते समय
दस साल में जब भी घर रहता था तो उसी पार्क और पानी में किस्से बुने जाते और फिर उधेड़ दिए जाते, शाहपुरा शानदार झील है, मुझे बड़ी झील से ज्यादा अच्छी यही लगती है, बहुत महंगा, पर एक बड़ा सा सुन्दर कमरा मनीषा मार्केट में ही लिया और वही रहा - दस बरस तक एकाकी जीवन में
देर रात तक बैठा रहता था और दूर तक बस मोहब्बत की कहानियां ही कहानियां सुनाई देती, चलती-फिरती कहानियां भी जैसे पानी के भीतर ही भीतर सिंगाड़े की जड़ें फैली हो - जिन्हें सुलझाना मुश्किल हो और इश्क भी या तो कच्चे हरे रंग का या सिंक जाने के बाद बाहर से काला और अंदर एकदम धवल आकर्षक सिंघाड़े सा
वह शहर एक नास्टेल्जिया था, है और हमेशा रहेगा, बस यह है कि तीन-चार मजबूत प्रेम कहानियों के बाद भी एक दिन सारा सामान एक छोटी सी बेग में भरकर ले आया और बाकी बचे हुए को उसी झील के किनारे बैठे जरूरतमंदों में बांट दिया
देखना कोई रुमाल मिलें तो - जिसके कोने पर सुर्ख लाल रंग में A, S, R या ऐसे ही कोई शब्द गाढ़े और अंदर तक टंके हुए मिलें
***
सहज मिला सो दूध बराबर, मांग लिया सो पानी
खींच लिया सो रक्त बराबर, गोरख बोले बाणी
• गोरखनाथ
[ पूरे अद्वैत का सार है बाबा गोरखनाथ की इन दो पंक्तियों में ]
***
ना अपनी भावनाएं सार्वजनिक कीजिए - ना धन, ये दो ही चीजें हैं - जो आपको अपने घर वालों से भी छुपाकर रखनी चाहिए, अन्यथा बड़ी मुसीबत हो जाती है जीवन में
जीवन में दोस्त एक कम और दो ज़्यादा हो जाते है - इस बात को समझिए, बाकी तो सब स्वार्थी, मतलब परस्त और कामकाज के संगी-साथी है - जिनके होने या ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता
किसी से अपेक्षा मत रखिए - अपने आपसे भी नहीं, किसी से चरित्र प्रमाण पत्र क्यों ही चाहिए आपको, और नोबल पुरस्कार की इच्छा तो हरगिज ही नहीं पालिए मन के किसी कोने में
एक ही जीवन है, ना पिछला कुछ था और ना अगला कुछ होगा - बस इसे ही सबसे अच्छा मानकर, बंदिशें और वर्जनाएं तोड़कर पूरे उन्माद में उन्मुक्त होकर जी लीजिए - यही आपके होने की सार्थकता है, सोशल मीडिया पर फोटोज, उपलब्धियां या तमगे डालने से क्या ही होगा आख़िर
आखिरी हिसाब अपने को ही करना है और अपने को ही विदा होना है - सब छोड़कर, तो दूसरों के लिए जीने का या उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने का अर्थ क्या है
***
चलना एक दौड़ है - ठहरना एक जिद, दौड़ना एक स्थिरता है और दौड़ते हुए रुकते जाना एक समझ, हर ठहराव एक गति है, हर गति का एक दुख स्वप्न है जो हर मोड़ पर धराशाई होता है और हर ठोकर पर तेज, हमें बहुत बारीकी से गति, दौड़, ठहराव, स्थिरता और विश्राम में फर्क करते आना चाहिए़ - तभी संभवतः हम अपने आपको नियंत्रित कर सकेंगे और अपने विचारों और बेसब्र सी बढ़ती उद्दंड आशाओं पर विराम लगा सकेंगे
दौड़ना और ठहरना असल में विचारों के सापेक्ष है बाकी तो कोई दोनों में मूल अंतर नहीं है, देख रहा हूँ कि लोग दौड़ रहें है लगातार और सांसें फूलती जा रही है पर अंत में हासिल क्या हो रहा यह नदारद है सिरे से
***
दुनिया उठाते पुल
________
यह एक सुनसान स्टेशन के प्लेटफॉर्म नम्बर नौ का पुल है जो एक नम्बर से यानी शहर को जोड़ता है, इसके एक ओर सारा शहर, भीड़ है, संसार है, दूसरी ओर शहर की गंदगी, बजबजाते तंग बस्तियों में रहने वाले, मजदूरी करने वाले लोग और शराब पीने से लेकर गांजा-भांग एवं देह को भोगने रूपए देकर रात के समय को लेकर आए लोग होते है
पुल पर गहन सन्नाटा है, कोई रेल अभी गुजरी है जिसके इंजिन का धुआं अभी तक फ़िज़ा में है, कोयले से चलने वाली बहुत कम ट्रेन बची है और यह स्टेशन उसी शहर में आता है - जहां अधिकांश घरों के चूल्हे रेलवे के चुराए हुए कोयले से जलते है, देर रात तक लड़के, औरतें, बूढ़े मर्द कोयला चोरी की ताक में घूमते दिख जाते है, रेलवे पुलिस के नाम पर दो-चार सिपाही है जो इनसे बारी-बारी से हफ्ता वसूलते है और अपना घर चलाते है
दुर्भाग्य से स्टेशन घने पेड़ों से आच्छादित है और इस वजह से कोयला चोरी से लेकर तमाम तरह के सही-गलत काम सहसा किसी को नजर नहीं आते, दिन में स्कूली और कालेज की लड़कियां अपने आशिकों के साथ इधर रंगरेलियां मनाने आती है, स्कूल टाईम पर घर लौट जाती है, रेहड़ी वाले इनसे दो पैसा कमाकर अपना घर चलाते है - इसलिए वे इनके राजदार है और चुप रहते है
रोज रात को इस पुल पर बैठकर मैं बहुत दूर देख रहा होता हूँ कि कैसे एक डेढ़ फुट की पटरी ब्रॉडगेज हो गई, अब ट्रेन दूर से नजर आती है और वह सुरंग ना जाने कहां खो गई - जिसके मुहाने पर कभी सूरज उगता था, जिसके होने से हमारा बचपन और किशोरावस्था थी, प्यार था, जीवन में सस्पेंस था, अधो और उर्ध्वगामी विकास था - पर सब खत्म होता गया धीरे-धीरे और आज पटरी नीचे और दुनिया पुल पर आ गई, मतलब ऊपर उठ गई ज़मीन से
अभी यहां बैठा हूँ तो किसी दूर जगह से हारमोनियम की आवाज सुनाई दे रही है, काली तीन से किसी ने बोल उठाए है, ढोलक की मंद थाप के साथ संयोग बन रहा है, कोशिश हो रही कि तीन ताल या दादरा के साथ सुर संयमित हो जाए तो लम्बा आलाप खींचकर कुछ कर्णप्रिय सुनाया या गाया जा सके, पर पेटी में हवा का प्रवाह तेज हो रहा, चाभी ढीली हो गई है, पर्दा फट गया है और काले - सफेद जब एक हो जाते है पेटी के तो सब बर्बाद हो ही जाता है और साथ बज रहे ढोलक की चमड़ी ठीक से कसी नहीं है तो सुर और तालों की दिशा भिन्न हो गई, कुल मिलाकर संगीत तो कही नहीं, किसी बेसुरे को इस समय सुनते हुए जाकर उसका गला घोंटने की तीव्र इच्छा हो रही है
बचपन से बहुत कुछ करना था, बनना था या सीखना था - मसलन पाईलेट, डाक्टर, कलेक्टर, बड़े बाबू, मिठाई की दुकान वाला, बड़े से होटल का मालिक या तैरना सीखना था, गाना बजाना सीखना था - हारमोनियम, तबला, या ढोल पर इनमें से रस हटता गया, थोड़ा बड़ा हुआ तो लगा कि बस हाथ में गिटार हो और एक रंगीन चश्मा, पर थोड़ी समझ बढ़ी तो लगा कि इस मवालीपन से बेहतर है सरोद या तम्बूरा, पर थोड़े समय में इनका भी क्रेज जाता रहा, सारंगी अपने बस की नहीं थी, बांसुरी में दम फूंकने के लिए गला खराब कर चुका था, संतूर से लेकर सैक्सोफोन टीवी पर देखें थे और इनको इलिट मानकर कभी हिम्मत ही नहीं हुई कि कोई सपना बुना जाएं, अब अंत में हाथ में आया एक सस्ता सा माउथ आर्गन - जो बस्ती के सार्वजनिक उत्सवों में बंडू बजाता था, एक बार बंगलौर के एमजी रोड की दुकान पर रूक गया था "जिंगल बेल" नाम था, और यही कमबख्त सबसे सस्ता वाद्य यंत्र था तो जेब में रख लाया शायद तीन सौ रूपये देकर, अपनी आलमारी के लॉकर में उसे रखे-रखे तीस साल हो गए, पर उसकी चमक वैसी ही है जैसे वह मुस्कुराती थी, उसका पतरा उतना ही ठंडा है जैसे आखिरी जवाब देते समय वह ठंडी थी और विदा हो गई चुपचाप इसी स्टेशन पर किसी आशुतोष के साथ
मै अक्सर देर रात उस माउथ आर्गन को ले आता हूँ और जब ट्रेन के कोयलों का धुआं नथुनों में भर जाता है तो पिछली सारी जिंदगी को बहुत शिद्दत से याद करता हूँ और इसे बहुत आहिस्ते से जेब से निकालकर मटमैली शर्ट की बांह से पोछता हूँ - प्यार से मानो कोई इसमें बसता है और इस घुप्प अंधेरे में बातें करने आता है, होठों पर जब लगाता हूँ तो इसकी ठंडाई से इश्क हो जाता है, सुर फिसलने लगते है, गीत के बोल फटने लगते है
एक बेफिक्री के अंदाज में गाने लगता हूँ, अपनी ही कर्कश आवाज सुमधुर लगने लगती है, देर रात इसी लोहे की ठंडी बेंच पर सो जाता हूँ, सुबह वाली मालगाड़ी से कोयला चुराने वालों की भीड़ से नींद टूटती है तो उठकर घर जाता हूँ और फिर काम पर - जहां से जीवन चलाने योग्य कुछ रुपए मिल जाते है, एक अयोग्य आदमी को मालिक कुछ रूपए पुराने एहसान के बदले दे देता है यह आज के जमाने में कम है क्या......
***
हमारी उम्र का सोना पक रहा है
______
स्वभाव से विनम्र, मिलनसार और अपने काम से काम रखने वाला यह शख्स मालवा में हर छोटे-बड़े उत्सव में अपनी उपस्थिति से सबको खुश कर देने वाला शख्स बहुत ज़हीन और प्यारा है, कभी ऊंची आवाज नहीं और कभी गुस्सा या क्षोभ नहीं चेहरे पर या यूं कहूं कि खुदा का बंदा है
तनवीर भाई को देखते हुए मुझे लगभग चालीस साल हो गए इंदौर का जाल सभागृह हो या रविन्द्र नाट्य भवन, गांधी हाल, उज्जैन, शाजापुर, खंडवा या देवास का मल्हार स्मृति मंदिर या कुमार जी का भानुकुल हर जगह अब तो मेरी यह हालत है कि तनवीर भाई को निगाहें खोजती है कार्यक्रम में बजाय कलाकारों या आयोजकों के
तनवीर भाई बहुत सहज और संवेदनशील व्यक्ति है अपने कंधों पर कैमरा टांगें नजर आएंगे और जब भी बात करो बहुत सम्मान और प्यार से बात करते है, एक जमाना था जब नईदुनिया में तमाम बड़े फोटोग्राफर्स के साथ उनकी तस्वीरें भी शाया होती थी, भालू मोंढे हो या दिलीप चिंचालकर, सुबंधु दुबे, श्रेणिक जैन या कैलाश सोनी धीरे धीरे अखबारों में तस्वीरों का महत्व ही खत्म हो गया और सारी जगह इंटरनेट की तस्वीरों ने ले ली, पर बहुत कर्मठ और प्रतिबद्ध कुछ लोगों ने काम नहीं छोड़ा और पूरी शिद्दत से लगें रहें और तनवीर भाई उनमें से एक है, आज मुझे इनके अलावा कोई और छायाकार एकदम से नजर नहीं आता जो बेहतर होने की साथ जनप्रतिबद्धता भी रखता हो
उनके जीवन में जब दीपा जी थी तो इनकी जोड़ी भी अनमोल थी, दीपा जी को भी तब से जानता हूँ जब वे शोधार्थी थी बाद में टी चोइथराम अस्पताल में जन संपर्क अधिकारी थी, अस्पताल में घुसते ही एक कमरा था, जहां तख्ती लगी रहती थी "डाक्टर दीपा बंसोड, जन संपर्क अधिकारी", दीपा जी वहां जाने पर खुद कमरे से बाहर निकलकर कहती "अरे संदीप, आओ घबराओ मत, सब ठीक होगा, और खुद डाक्टरों के कमरे में ले जाती और कहती डाक साब देख लीजिए मेरे परिवार के ही सदस्य है" कितने ही लोगों को मै उनके भरोसे उस अस्पताल में ले गया, डाक्टर आठले के पास जाना हो या ख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ के पास, एक बार डाक्टर गौरी पासी से भी लंबी बात की थी मैने कि वे कितनी मिलनसार और सहयोगी हुआ करती थी, दीपा जी इतनी शानदार और काबिल महिला थी, और सच तो यह भी है कि दीपा जी का तनवीर भाई के होने में बहुत बड़ा हाथ रहा - यह कहने में गुरेज नहीं, उनके असमय जाने के बाद तनवीर भाई लगभग टूट गए थे, चेहरे पर एक अस्थाई अंधेरा छाया रहता था, पर मिलने पर हंसी में कोई कमी ना होती और वे बेहद शालीनता और अपनत्व से मिलते रहे है सबसे
दीपा जी के जाने के बाद वे अकेले रह गए पर समाज उनका परिवार है अब
"कैसी कैसी ख़्वाहिशें मुझ से जुदा होती गईं
किस क़दर आबाद था और कितना तन्हा रह गया"
- मुज़फ़्फ़र वारसी
इंदौर में जाने पर यदि आप किसी संकट में है खासककरके कला, लेखन या तस्वीरों के संदर्भ में तो वे संकट मोचन की तरह अपनी स्कूटर पर बैठाकर ले जायेंगे अपने और आपका काम करवा देते है - यह मेरा अनुभव है, एक संवेदनशील व्यक्ति और नए लोगों को, युवाओं को और इंदौर के बाहर से आए लोगों को इंदौर के कला जगत में स्थापित करने का जो काम उन्होंने किया है - वह अदभुत और अप्रतिम है, लोग शायद ना जानें, पर मै दर्जनों ऐसे युवाओं और लोगों को जानता हूँ - जिन्हें तनवीर भाई और दीपा जी के अलावा कोई मदद कर ही नहीं सकता था, ये नहीं होते तो वे सारे लोग थक-हारकर, संघर्ष को अधूरा छोड़कर अपने गांव-देहात में लौट जाते
कल कुमार जी के घर तनवीर भाई को उसी जोश में देखा और खूब सारे फोटो अलग-अलग एंगल से लेते हुए तो मैंने भी उनके दो-चार फोटो खींचे और जुर्रत कर रहा हूँ कि जो देखा-समझा, इतने वर्षों में उसे कुछ कच्चे-पक्के शब्दों में लिख सकूं
तनवीर भाई हम सबके अज़ीज़ है और समुद्र किनारे के प्रकाश स्तंभ जो बारीकी से समझते है और लोगों को दिशा देने में भी सहायक सिद्ध होते है, वे बने रहें और यूंही हर जगह अपनी सशक्त और दमदार उपस्थिति देते रहे
तस्वीरें कच्ची-पक्की और बगैर किसी फिल्टर की है, आप देख कर खूब हंसना और आप मुस्कुराओगे तो और अच्छे लगोगे, चेहरे पर जो कल हल्की सी थकान देख रहा था -वह दूर हो जाएगी, हम सब परिजन संग-साथ है , आज यादों की गुल्लक खुल गई तो बहुत कुछ आंखों के सामने से गुजरा
जिंदाबाद रहेगा तनवीर भाई
खूब प्यार और दुआएं संग साथ है
स्वस्तिकामनाएं
***
मैंने संसार में लोगों को बहुत धैर्य धरते हुए देखा है, वे जीवन की कीमत पर, अपने सपनों, अपने लोगों की कीमत पर, अपनी भावनाओं और विचारों की कीमत पर भी सिर्फ इसीलिए धैर्य रख लेते है कि एक अबूझ और अनजान सी खुशी उनके जीवन में कभी होगी, कभी वे बेफिक्र होकर कम से कम एक दिन इतने वृहद जीवन में जी भरकर जीयेंगे और वे ताउम्र इसका इंतजार करते रहते है, पर इस सबसे परे हम सब एक दिन सब इस नश्वर देह और अनाम संसार को भी छोड़कर सदा के लिए यूं विदा हो जाते है कि शायद अगले किसी जन्म में फिर जन्मना बनें और खुशी हमारे पग चूमे और आसमान झूम उठें
जीवन की कीमत पर खुशी की यह चाह, उम्मीदों भरी किरणों और एक स्वच्छ निरभ्र उजाले की आस में जीना कितना धैर्य और मांगेगा यह कहना-विचारना और सच में धैर्य के साथ सब सहते हुए जीते चले जाना - कितना मुश्किल है, और सबसे ज्यादा अंदर की उस लौ को जलाए रखना - जो प्राज्जलयमान होकर सदा हृदय के किसी कोने में चौबीसों घंटे धधकती रहती है
मैं उस आस की तलाश में हूँ जो उस स्वर्गिक पथ पर ले जाए
***
अपनी इज्जत - अपने हाथ
________
मनोज रूपडा के साथ घासीदास विवि, बिलासपुर में जो हुआ वह एक तरह से सही हुआ, अन्य लेखकों को नजीर देने के लिए यह भी पर्याप्त नहीं तो बाजार में बैठकर अंडे बेचे या कुछ और कर लें
और इस गधे कुलपति को को चार जूते लगाकर भगाना था, अव्वल दर्जे का मूर्ख कुलपतित कही का
दिक्कत यही है कि इन सबका चयन राजनैतिक होता है और ये लोग इससे भी ज्यादा खराब शब्द डिजर्व करते है, आजकल प्राथमिक विद्यालयों की सूची भी संघ कार्यालयों से आ रही है, पीएससी में पटवारी से लेकर कुलपति तक की और संघ लोकसेवा आयोग में भी जा रही - तो कोई बड़ी बात ना होगी
आश्चर्य है कि इतने लोग चुपचाप बैठे रहे थे कार्यक्रम में, उन्हें छोड़ जाना था और इस मूर्खाधिति को सड़क पर खींचकर लाना था और बढ़िया मरम्मत करनी थी कम्बल डालकर सारी अक्ल ठिकाने आ जाती
लेखकों को विभाग में जाना नहीं चाहिए, लेखक अपने छर्रे और भक्तों को फिट करने जाते है, मक्खन लगाने जाते है भ्रष्ट और मक्कार प्राध्यापकों को, जो पढ़ाने के बजाय साल भर यहां वहां की सेटिंग करते रहते है, सेमिनार और कार्यशालाओं में हवाई यात्राएं करते रहते है, और फिर वहां जाकर जूते खाते है, असल में ये लेखक है - अकादमिक नहीं - यह भी समझना चाहिए, चार कहानी, दस कविता या दो लेख लिखने से महान नहीं हो जाते आप, अखाड़ों में जाने को दम चाहिए जो लेखकों में नहीं और स्वाभिमान तो बिल्कुल भी नहीं रहा, दरअसल में हिंदी के लेखकों को पीएचडी के वायवा से लेकर भाषण देने जाने में बहुत मजा आता है - अखिलेश से लेकर मदन कश्यप और बाकी सब को भी ज्ञान झाड़ने का खासकरके विवि के विवादित अखाड़ों में जाने का बहुत शौक है, दर्जनों प्राध्यापक इन लेखकों के फोटो आए दिन फेसबुक पर चैंपते रहते है और इस बात की तस्दीक की जा सकती है

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...