"तो अब तक कितने स्टॉल, कितनी किताबों का केशलोचन किया और कितने लोगों से मिल चुके है" - मैंने पूछा जब वे दिख गए पत्नी का हाथ पकड़कर हॉल नम्बर तीन में जा रहे थे
"बस तीन स्टॉल घूमा, दो लोगों से मिला और किताबें तो झोले में भरी है, समझ नहीं आ रहा घर जाते समय किसको देकर जाऊं, बहुत बोझ हो गया, पत्नी को अलग साथ लेकर जाना है और हम दोनों के वाकर भी है साथ, ट्रेन का कन्फर्म हुआ नहीं अभी" - वे चिंता में थे
"पर आपके तो रोज पचास - साठ फोटो शाया हुए है फेसबुक पर, इतनी कम संख्या क्यों बता रहे हैं" - मैंने पूछा
"अरे जिन प्रकाशकों ने काजू कतली खिलाई - उन्हें याद रखता हूँ, जिन लेखकों ने चाय - कॉफी पिलाई या छोला भटूरा खिलाया वो ही याद है, और किताबें तो सब रद्दी है, घर ले जाऊंगा तो बेटा - बहु उठाकर फेंक देंगे और किचकिच अलग करेंगे कि- 'हर बार यह कूड़ा उठा लाते हो, जगह है नहीं घर में, बाहर आंगन भरा पड़ा है कबाड़ से आपके ', बस यही सत्य है, बेटा जरा अपने मोबाइल में देखो हमारे टिकिट कन्फर्म हुए है क्या, और तीन बजे पहाड़गंज के लिए वो मोबाइल में ही एक ट्रैक्सी बुक कर देना, भगवान भला करें तुम्हारा" वे बहुत परेशान थे, बहुत बड़े और महान लेखक थे - पर इस समय निसहाय थे और निरापद
#पुस्तक_मैला - 5
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पुस्तक मैले में जो लोग आपको फेसबुक से लेकर जीवन में घास नहीं डालते , वहां आपको देखते ही चहक उठते है, पास आयेंगे और मोदी के समान लपककर गले से चिपकेंगे, प्यार जताएंगे और घर - परिवार का हालचाल पूछेंगे, पर अपनी पानी की बोतल छुपा लेंगे, अपनी बीबी से मिलवाएंगे, बच्चों से पांव पडवाएंगे आपके और फिर चारा डालेंगे कि अबकी बार मेरी किताब आई है, चलो प्रकाशक के ठिए पर, चारों तरफ से पूरा परिवार घेरकर आपको ले जाता है प्रकाशक तक
बस इसके बाद भूकंप शुरू
घेरकर ले जाते है प्रकाशक के अड्डे तक और उसे आंख मारेंगे, आपका यूं परिचय देंगे जैसे नोबल मिला हो आपको, और खरीदवा देते है अपनी घटिया सी किताब और फिर कहेंगे, आप देखिए और किताबें - मै आया, उसके बीबी बच्चे भी गायब, आपको अब प्रकाशक काटेगा
प्रकाशक इनका बाप है, ससुरा समझ जाता है कि मुर्गा आया है, पूरे दिन से बैठा था फुर्सत में, वह भी नाथों का नाथ है, गौरी, लक्ष्मी, दुर्गा, काली, चांडालिका यानी घर परिवार के साथ दो-चार और काली-पीली चम्पाओं को सजाकर बैठा है दुकान पर, वह इन सबके साथ मिलकर आपको गोभी के साथ आलू, टमाटर और लहसुन प्याज भी थोप देता है और गायत्री परिवार या अपने ही प्रकाशन का भयानक प्रूफ की गलतियों वाला कैलेंडर दे देता है - जैसे धनिया फ्री, और आपने एक थैली एक्स्ट्रा मांग ली तो वह आपको यूं देखता है जैसे शादी में ससुर ने कार के बदले बाईक दे दी हो या अमित शाह कह रहा हो कि नक्सलवाद खत्म कर दूंगा , आपकी हिम्मत जवाब दे जाती है और आप गधे समान बोझ यानी कूड़ा कचरा उठाकर बैठ जाते है जमीन पर एक ओर, दूर से देखते है कि वह फिर किसी को फुसलाकर ला रहा है
बेशर्मी यह कि ये फर्जी लेखक अपने रूपयों से खरीदी किताब पर ये बेशर्मी से हस्ताक्षर करते है हीहीही करके, फोटो खिंचवाते है और आठ दिन बाद फोन करते है लिखो, लिखो, लिखो मुझे महान घोषित करो, नहीं लिखा तो आपके चरित्र हनन कर उतर आते है, खासकर के युवा छर्रे और मास्टर प्रजाति के लेखक
मेरी सलाह तो यह है कि जो बोले - उसकी तो बिल्कुल मत खरीदो, दुकान पर जाकर रिजेक्ट कर दो और ठिठोली करते हुए कह दो कि घटिया लेखन है और क्वालिटी तो एकदम ही गुजरात स्टाईल की है
इस सब फसाने में एक सबद भी गलत हो तो दुनिया छोड़ दूं
मेरे को भी घेर-घेरकर ले जा रिए हेंगे, कल पांच-छह लोगों को बुरी तरह से दुकान पर जाकर लताड़ दिया और किताबों को रिजेक्ट कर दिया, एक किताब में ही कविता, ग़ज़ल, नज़्म, दोहे और छंद साला चार सौ रुपया फोकट का हैं क्या ?
एक भी फोटो नहीं डालना मैले का, बिल्कुल भी नहीं, अपना फोटू भी नहीं खिंचने देना किसी को बस घूमो, किताबें देखो पसंद की खरीदो, किसी को बोलना इज़ नाई कि इदर को आया हूँ, किसी से नई मिलने का चुपचाप रहो बस , परिचित की दुकान पर जाओ ही मत वरना मूंड देंगे
#पुस्तक_मैला - 4
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आत्ममुग्ध होना बहुत अच्छी बात है क्योंकि हम है तो जीवन है पर यह अपने आपको मार्केट में बेचने, आपके लिखें काले पीले को सफेद करने का धंधा बन जाए तो इससे शर्मनाक क्या ही होगा
सोचिए कल फेसबुक, इंस्टाग्राम बंद हो जाए तो आपकी सारी अकड़ और लिखा हुआ कूड़ा कचरा धरा का धरा रह जायेगा
हिंदी में कुछ ज्यादा ही आत्म मुग्धता है और पुस्तक मैले में वह किसी बजबजाते हुए नाले सी बह निकलती है जिसके किनारे खड़े होकर लोग कुल्ला करते है
मैले के फोटू देखकर आपको सबकी औकात या ज्ञान का अजीर्ण समझ आता है, सिवाय सेटिंग के कुछ भी नहीं ये मैला
#पुस्तक_मैला - 3
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पुस्तक मैले में चंदा चोर संपादक - प्रकाशकों से बचें
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पत्रिकाओं का चंदा जमा करने में सतर्क रहें - क्योंकि अधिकांश पत्रिकाओं के संपादक साहित्यकार भी है और बेहद लालची और घटिया, वे आपसे पूरा चंदा वसूल लेते है हर बार लच्छेदार भाषा बोलकर और हर अंक जारी करने के पहले फिर कटोरा लेकर आ जाते है, सबूत देने के बाद भी कि भैया दो साल का जमा था तो ज्ञान देने लगते है कि वो तो पिछले जन्म के तीन अंकों का था-अब दीजिए
लगाओ जूते, करो नंगा इनको और भगाओ , दो कौड़ी की पत्रिका और गरीबी दिखाकर अपना घर भरने वाले और अपने बच्चों को डोनेशन से महंगे कॉलेजेस में पढ़ानेवाले और सदैव गरीबी का नाटक करके रोना रोने वाले टुच्चे लोगों को घास डालने की जरूरत नहीं
तद्भव से लेकर वागर्थ, समकालीन हिंदी साहित्य से लेकर कुकुरमुत्तों की तरह गली मोहल्लों में प्रकाशन का धंधा चलाने वालों से और क्या उम्मीद कर सकते है, ये लोग रुपया लेकर किताबें छापते है और एक लाख से कम का मुंह नहीं फाड़ते, इन्हें काम भी दिलाओ तो एहसानफरामोश कुछ मानने के बजाय ज्ञान देने लगते है
लाखों करोड़ों की जमीन के मालिक इनसे बड़ा फर्जी कोई नहीं है, दिल्ली में यदि आप इनके झांसे में आकर इन्हें पत्रिका का चंदा जम कर रहे हो तो हरगिज ना करें और जल्दी ही उन प्रकाशकों का नाम भी लिखूंगा जो सिर्फ धंधा कर रहें है, अपने लेखकों को रॉयल्टी देना दूर, रिश्ते रखना दूर ये तो बनियागिरी में गली-मुहल्ले के किसी दो टके के आदमी से बुरे साबित होते है, इसलिए मणि मोहन, सुनील चतुर्वेदी, अनिल कुमार यादव हो या सत्यनारायण पटेल या कोई और सबने - इन्हें दुलत्ती मारकर वाणी या राजकमल या किसी और प्रकाशक का पल्लू पकड़ लिया है, कम से कम ये लोग थोड़े तो नैतिक, ईमानदार और पारदर्शी है
देश में वोटचोर एक है और चंदाचोर कई
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भयानक लोकार्पण होंगे और लोग अरावली के पहाड़, हसदेव के जंगल को बचने-बचाने की बात कर रहे है, और यह सब करके विशुद्ध मुनाफ़ा किसका
एक-एक लेखक की 21-31-41-51 किताबों का केशलोचन समारोह होगा
सोचो विचारों, कितनी किताबें, कितने कागज, कितना प्लास्टिक और कितनी सामग्री
किस मुंह से काबे को जाओगे ग़ालिब
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