Skip to main content

Khari Khari via the World Book Fair, Delhi

हे बेशर्म हो चुके बुद्धूजीवी
• प्रचार प्रसार ठीक है
• बेचना, बिकवाने का काम भी ठीक
• आत्ममुग्धता भी ठीक
दोस्तो से मिलना मिलाना भी ठीक
• फोटो खिंचवाने का काम भी ठीक ही है
◆ पर दस बीस साल से लेकर दो - चार साल पुरानी किताबों का एक चौथाई के भाव पर बेचना और जबरन थोपना किस चाणक्य ने कहा है बै
◆ और सब समझदार है, सब पत्र - पत्रिकाएँ पढ़ते है, इंटरनेट के साक्षर है और सब गूगल करके बेहतरीन सामग्री खोजने में सक्षम भी है, अपनी समझ, शौक, रुचि और ज़रूरत भी जानते है हम
◆ इतना बेवकूफ मत समझो कि तुम्हारी ठेली हुई लिंक और दिए हुए पते पर ढूँढते हुए किताब लेने पहुंच जायेंगे पाठक
◆ अब इतने तो कुढ़ मगज नही कि तुम्हारे यार - दोस्तो और रंगीन और रंगहीन बूढ़ी हो चुकी तितलियों की घटिया और बकवास किताबों को तुम रिकमेंड करो और हम ऑर्डर कर दें या खरीद लें - मुआफ़ करिए अगर यह मुग़ालता है तो तुरंत दूर कर लें
◆ परेशान हो गया हूँ एक ही दिन में इनबॉक्स में मिली लिंक, स्टॉल के पते और चिकने - चुपड़े, काले - पीले और टेढ़े-मेढ़े चेहरों को भयानक गोरा बनाकर डेढ़ किलो की फर्जी मुस्कुराहट चैंपकर भेजे हुए फोटोज़ से
◆बन्द करिए यह अश्लील प्रदर्शन - तीस से लेकर सत्तर हजार देकर कूड़ा छपवाने का काम कर आपने कोई महान काम नही किया, जाकर पूछिये प्रकाशक से कि आपको जानता है या नही, उसके स्टॉल पर आपकी क़िताब है या नही, आपके जाने पर चाय तो दूर पानी की बोतल छुपा देगा कम्बख़्त, दोपहर को खाना कही छुपकर खा लेगा जबकि आपके घर या शहर आकर दारू मुर्गा तक डकार चुका होगा आपके रूपयों से, वह बेवकूफ 30 से 100 किताबों का लोकार्पण एक दिन में कर रहा है, पूरे 8 दिन में हजार किताबे खपा देगा और लोकार्पण के समय बांटने वाली नुक्ती और पेड़े का पैसा भी आप से ही वसूलेगा, आपको किताबों का हिसाब देना तो दूर, बाद में आपको पहचानेगा भी नहीं - इतना शातिर है इस समय हिंदी का प्रकाशक, आप कहे तो मैं नाम गिना दूं इन फर्जी लोगों के
◆ बन्द कीजिये पुस्तक प्रेम का नाटक और प्रदर्शन, घर में रखी किताबें पढ़ लीजिये, शहर या मुहल्ले की लाइब्रेरी खंगाल लीजिये, फिर नया ढोंग करिए
■ मूर्खता की हद होती है

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...