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Raza Foundation in Mandla - Posts of 8 Nov 2022

रज़ा के बैनर में अपने एमपी के आदिवासी जिले में मण्डला में "युवा" हो रहा है जिसमे 80 % चुके हुए प्रौढ़ और बूढ़े आ रहे है , कुछ "बंधुआ युवा" नही जा रहें - हो सकता हो रिटायर्ड मेन्ट की तारीख नजदीक हो या शुगर बढ़ी हो - पेशाब पानी मे दिक्कत होती ही है लम्बे सफर में, अपुन को अनुभव है ना
मराठी, पंजाबी, मलयाली कवियों पर बोलना है इन तथाकथित युवाओं को, परन्तु मजेदार यह कि बोलने वालों में एक भी मूल भाषा के लोग नही है, खेल सिर्फ़ उपकृत करने और कराने का है जैसे मराठी भाषी नही है तो ये क्या बोलेंगे अरुण कोल्हाटकर पर , जो मूल भाषा का गोड़वा है मराठी में अरुण कोल्हाटकर को समझ कर व्यक्त करने का वो किसी पराई भाषा मे कैसे होगा
अयप्पा पाणिक्कर मलयाली है पर बोलने वाला कोई मलयाली नही, ले देके एक पंजाबी कवि पर बोलने में ही कोई पंजाबी लड़का है शायद - बाकी तो सब "सौजन्य से सभी ख़ुश रहते है" - वाला फार्मूला है
पिछली बार का याद है अलग - अलग कलाकारों पर किसी - किसी को बोलना था, कुछ मदद मैंने की, और बाकी लिंक्स से कॉपी पेस्ट, गूगल देव का सहारा लिया गया था और इस तरह से पूर्णाहुति हुई थी, ख़ैर
सवाल ये है कि क्या इन भाषाओं में युवा नही है , युवा कवि नही है या अशोक जी की चरण वंदना करने वाले लोग इन भाषाओं में नही है, या रज़ा की पकड़ महाराष्ट्र, केरल में नही इसलिये दिल्ली, बिहार, यूपी और एमपी के दो चार पर ही टिकी रहती है, ऐसे आयोजन भले ही आप कहें कि निजी है, उनकी मर्जी ही चलेगी पर आखिर रज़ा ट्रस्ट भारतीय एक्ट अधिनियम में पंजीकृत रज़ा जनता का ही रूपया है सारा रुपया दान का है और ये रज़ा ट्रस्ट अपने चंद चहेतों को हर बार परोस कर महान बना रहा - वह बेहद आपत्तिजनक है
मूल सवाल और भी बड़ा है क्या मराठी या मलयाली में युवा कवि नही या अशोक जी की पहुंच नही या सिर्फ उपकृत करने का जोखिम लेना नही चाहते
आखिर क्यों 140 करोड़ लोगों में वही चेहरे है हर बार, वही एलीट और वही दलित भी अब एलीट बनकर शेखी बघारने का गुण सीख गए है - विश्व रंग हो, रविन्द्र भवन, भारत भवन हो या रज़ा - इनसे हजार गुना लिखने - पढ़ने - कहने और समझने वाले देश की हर जुबाँ में है, पर आपको तो छर्रे पालने का शौक है और पसन्द है - पूरा बिहार भारत भवन का दामाद बन जाता है जब कोई बिहारी आय ए एस मप्र में संस्कृति विभाग का प्रमुख सचिव हो जाता है, सारे कामरेड़ी लाल दुम दबाकर म्याऊँ म्याऊँ करते है उसकी, और फिर गौर से देखिये यह सूची और पिछले 5 वर्षों के आयोजन देखिये - ये सब वही है जैसे कोई रोटरी क्लब या तितलियों के किटी क्लब के स्थाई मेम्बरान, अशोक जी ने स्थानीय मण्डला में कितने युवाओं को तैयार किया या शिरकत में भी बुलाया कोई बताएगा भला या आदिवासियों को जोड़ा या उनके लिए दान में मिलें रुपयों से कुछ किया - यह भी प्रश्न तो है - अवागर्द होना अच्छा है, पर पब्लिक लाईफ के सवाल तो रहेंगे, हिंदी के प्राध्यापक, दब्बू और कायर प्रजाति के लोग क्यों भला कुछ बोलेंगे या पूछेंगे - उन्हें चरण रज पीकर अमर होना है - किसी पीठ पर या अपना सँग्रह लाना है फेलोशिप से
बाकी कान्हा में शेर देखने का उपक्रम होगा ही - दिखेगा निश्चित ही नही, काश कि यह बात कोई समझ पायें
[ नोट- अपुन 56 के है और लेखक - कवि कुछ भी नही, इसलिये उधर जाने का सपना भी नही देखतें - पर सच जरूर बोलते है - मराठी माणूस - खायेगा नई पर बोलेगा जरूर ]
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