Skip to main content

Posts of 11 and 12 Oct 2022

सर अंदर आ जाऊँ क्या
अबै डेढ़ मिनिट लगेगा, धोती तो बदल लेने दे , तू साले ये भी कैमरे पर दिखायेगा क्या , इतनी तो प्राइवेसी रहने दो यार
***
भक्त बैठता है उपास्य देव के सन्मुख हो कर, और ये बैठा कैमरोन्मुख होकर
और उज्जैन जाते हुए 56 साल हो गए तो मुझे, कोई गलत मत कहना और चितपावन मराठी बामण हूँ तो कायदा भी जानता ही हूँ, असल में यह बहुत बीमार है और कमज़ोर - कैमरा देखे बिना सांस नही ले सकता

***
अपुन का भी भोत ई कम हो गया, दो दर्जन सल्फास खा ली, दस खम्बे लिए नीट, महाँकाल का 6 गोली वाले पैक का घोटा लगाया कल उज्जैन जाकर, मोदी जी से सिकायत भी करके आया जुकेरवा की, गाँजा फूँका सुभाष चौक में देर रात तक, केकड़ा - गिरगिट सेंक कर खाया कि नशा चढ़े और दुख कम हो कुछ - पर हाय्य री किस्मत
टेंसन कम नई हो रियाँ
उफ़्फ़र से मुहल्ले में पचास किलो मिठाई भी बाँट दी आज सुबू - सुबू कि सबके फॉलोवर्स 10000 से नीचे निपट गए , बहुत ई अकड़ते थे - मुलायम क्या गए समाजवाद फेसबुक पर आ गया - जे भी कोई बात है अब बोलों
या अल्लाह - ये दुख काहे कम नही होता
***
Book on the Table
•••


देवेश हिंदी के प्रतिभाशाली युवा कवि, बेहतरीन समीक्षक और बेहद संवेदनशील व्यक्तित्व है, अपनी पढ़ाई और बाद में काम के लिए लम्बे समय से ताईवान में है, वर्तमान में शिनचू ताईवान में रहते है और पोस्ट डॉक्टरेट कर रहें हैं, खगोल विज्ञान के शोधार्थी होकर हिंदी में चुपचाप जरूरी और महत्वपूर्ण काम कर रहें है और पिछले कई वर्षों से देव की प्रतिभा और विनम्रता का मुरीद हूँ, वे किसी साहित्यिक गुटबाजी के अपना रचनात्मक काम करके श्रेष्ठ देने का काम लगातार कर रहें है, लगभग सभी पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ देखी पढ़ी जा सकती है
मूल रूप से राजस्थान के है, उनकी कविताएँ, गद्य और ताईवानी कविताओं का अनुवाद इधर चर्चा में रहा है, हाल ही में उनकी कथेतर गद्य की किताब "छोटी आँखों की पुतलियों में" सेतु प्रकाशन से आई है, अनुज देवेश ने बहुत प्यार से यह किताब मशक्कत करके मुझ तक भेजी है जो मेरे लिए अनमोल उपहार है दीवाली का - दिल से आभारी हूँ देव, जल्दी ही पढ़कर लिखूँगा यह वादा है
बहुत शुभकामनाएँ और दुआएँ तुम्हारे उज्ज्वल रचनात्मक जीवन के लिए - खूब रचों और यश कमाओ

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...