Skip to main content

Posts of 29 to 31 Dec 2020 Drisht kavi, Sandip ki Rasoi

हम सब अपने बनाये हुए जाल में किसी चूहे की भांति फँस जाते है, एक ऐसे जाल में जो किसी भी प्रकार का खतरा दिखने पर अपनी मरम्मत करता है और अंत में जाल के उस छेद को भी बुर देते है जो हमें भागने में मदद कर सकता था और बेहतर जीवन जीने को सक्षम बना सकता था
साल 2020 एक ऐसा ही छेद था पर हम फिर फँस गए है और हमारे अस्तित्व पर संकट गहरा गया है, आईये हम कुछ करें ताकि इस जाल को काटा जा सकें
हिम्मत नही कि कह सकूँ साल 2021 की मंगल कामनाएँ , फिर भी दोस्तियां, यारियां, दुश्वारियाँ, दुश्मनियाँ बनी रहें - संवाद बना रहे
स्नेह, दुलार, सम्मान और दुआएँ
[ तटस्थ ]
[*बुर का यहां अर्थ है 'भरना' - जैसे गढ्ढे को बुरना - मालवा में इस्तेमाल होता है बहुतायत में ]

***

"कितनी कविताएँ छपी पिछले बरस"- मैंने पूछ लिया लाईवा से

" सत्रह हजार थी कुल - जिसमे से मैंने पत्नी को ग्यारह हजार लाइव के माध्यम से सुनाई, बाकि किसी ने घास नहीं डाली, दो हजार नौ सौ बारह संपादकों को भेजी थी - बस तीन छपी , पांच हजार के वीडियो बनाकर यूट्यूब पर डाले - नौ लोगों ने देखें और दो लाईक भी आये...."
" चुप कर बै , मैंने पूछा क्या था और बोल क्या रहा है - साला, फेसबुक पर सब हिसाब दे रहें है बगैर मांगे जैसे कोई सामाजिक अंकेक्षण के तहत सूचना के अधिकार में जानकारी मांग रहा हो या कवि - कहानीकार ना हुए, सुप्रीम कोर्ट हो गए जो 'सू मोटो एक्शन' के तहत अपने छपे कचरे की जानकारी दे रहें हो " - फोन ही काट दिया मैंने
***


भोजन
चलो, मैं ही बता देता हूँ क्या है इसमें
√ ताज़ा मटर खूब सारा
√ ब्रोकोली
√ गाजर
√ लाल टमाटर
√ अदरख
√ प्याज एवं ताज़ा हरा प्याज
√ हरा लहसन
√ शिमला मिर्च
√ चुकंदर
√ हरी मिर्च
√ ख़ीरा
बस सबको काट कर एक पैन में ऑलिव ऑइल में हल्का सा परत लिया - एक से डेढ़ मिनिट बस, एक नींबू और थोड़ा सा चाट मसाला डालकर गड़प लिया
है ना सरल, पौष्टिक, कम समय में बनने वाला 'दी बेस्ट' भोजन , सबसे अच्छी बात इन दिनों मस्त ताज़ा और बेहद सस्ता मिल रहा है सब कुछ जो इसमें डला है



Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...

सतरें जीवन के - तटस्थ Satare Jivan ke

सतरें जीवन के   जब प्रवाह में बह जाने का समय आता है, लगता है कि अब सब खत्म हो ही रहा है - अचानक एक तिनका कही से तैरते हुए आ जाता है और शिद्दत से थाम लेता है यह कहकर कि धैर्य रखो, शांत हो जाओ - उजाले की किरणें छटा बिखेरेंगी जल्दी ही शाम ओस से भीगी हुई एक कविता है जिसने संसार में अपनी लय से सबको बाँध रखा है जीवन झूठ का पुलिंदा है और हम सब इसे पसंद करते है, हम सब झूठ के साम्राज्य को बनाये रखना चाहते है और इसी उपक्रम में मरने तक मेहनत करते रहते हैं, अंत में मौत का सच इसकी हवा निकाल देता है अयोग्यता ही असली धन और शांति है, जब तक अयोग्य लोग है तब तक योग्यता की असली और वीभत्स सच्चाई सामने आती रहेगी जो स्वाभाविक ना होकर ना - ना प्रकार के कृत्रिम संसाधनों से अर्जित कर सुख सम्पदा हासिल करने के लिए बेहतरीन स्वांग के साथ ओढ़ी गई है हारना और स्वीकारना हिम्मत का काम है और इसकी जड़ें बहुत गहरी होती है, अपूर्णताएँ, अकुशलताएँ और अधकचरी थोथी सूचनाएँ जीवन के उत्तरार्ध में आपको एहसास दिलाती है कि आपके सारे प्रयास, अभ्यास और चेष्टाएँ व्यर्थ है - इसलिये ख़ारिज करो अपने हर कर्म को, समझ को, देख...