Skip to main content

Post of 5 Oct 15


और फिर एक सुबह सूरज उगा नहीं उसकी दुनिया अंधेरी हो गयी, कल सारी रात चाँद भी नहीं था और सितारे किसी हारमोनियम के सुरों में जाकर छुप गए थे, वह एक अंधेरी सुबह को अपने माथे पर उठाये आसमान के पार निकल गया और फिर उसे लगा कि सूरज और चाँद दोनों उसके साथ छल कर रहे है, उसने अपनी आँखों के आगे से उजाले का छद्म हटाया और सोचा कि इस तरह वह फिर एक बार लडेगा और इस बार सूरज और चाँद को मुठ्ठी में कैद करके ले जाएगा और अपनी किताब के उन पृष्ठों पर रख देगा जहां तुमने गुलाब का एक फूल रखा था, और फिर उन सफों को बंद करके किताब को पहाड़ के पीछे फेंक देगा ताकि सूरज और चाँद किसी को ना मिल सके.............बस आँखे मलते हुए उसने सुबह को फिर से देखा अन्धेरा गहरा हो गया था..


बिहार में मोदी की 40 रैलियां । इतना डर गए लालू नितीश से ? यह खर्च हमारे इनकम टेक्स से जा रहा है इसकी भरपाई कौन करेगा।

खुशी की बात है कि दादरी, बनारस और मुज्जफरनगर में नेताजी की सरकार है , वरना हमारी सरकार होती तो ना दंगे होते ना कर्फ्यू लगता - मितरो, इसलिए यु पी में अबकी बार मोदी सरकार ।
और बनारस में आज जो हुआ उसके लिए कांग्रेस दोषी है, अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में बैठकर दंगे भड़का रहा है और साले कामरेड वहाँ सेक्युलर होने के नए शगूफे तलाश रहे है।
ध्यान रहें मितरो " हिंसा परमो धर्म" यही अभी अमेरिका को सिखाकर आया हूँ आप लोग संयम रखे अखिलेश को कहता हूँ कि देश के मध्यमवर्ग की मेहनत और पसीने से कमाए इनकम टेक्स से कुछ पचास साठ लाख का मुआवजा हर मरे खपे हिन्दू भाई बहनों को बाँट दें।
मेरा अभी आना मुश्किल है , किसी मन की बात में जिक्र करके अशांति की अपील दोहरा दूंगा - तब तक एकाध दो देश और घूम आऊँ।
आप लोग कहे तो राजनाथ या अमित जी भाई शाह को दौरा करने भेज दूं , वैसे कौशाम्बी से गया डीएम अपना ही कार्यकर्ता है।
नमो

जो साथी पूछते है अब तक क्या किया जीवन में, नोकरी में या साहित्य में तो जवाब है अन्य की तरह नही रहा रीढ़विहीन, बस यह जवाब उन सबके नाम जो उस पार है और मैं अकेला इस तरफ....
"मेरे लहजे में जी हुजूर न था
इसके अलावा साहब मेरा कोई कसूर न था, 
अगर पल भर को भी मैं बे-जमीर हो जाता

यकीन मानिए कब का वजीर हो जाता".

अचानक वह उस जुलूस के पीछे चल दिया और सारे रास्ते आंसू बहाता रहा. राम धुन बज रही थी, सिक्के उछाले जा रहे थे , भीड़ में लोग गप्प करते जा रहे थे और एक सामान्य प्रक्रिया में लोगों के लिए इस तरह की शवयात्रा में जाना अमूमन रोज की बात थी, कपड़ा बाजार के व्यापारी और आस पास के बाजारों के लोग प्रायः रोज ही इस तरह की शवयात्राओ में जाकर अपना धंधा बढ़ाते , तसल्ली से श्मशान में बैठकर डील करते और लौट आते थे.
आज इस भीड़ में उसे रोता देखकर सब अचंभित थे एक ने साहस करके उससे पूछ लिया कि ये अमृतलाल जो मर गया, क्या तुम्हारे सगे वाला था जो इस तरह से रो रहे हो..? उसने कुछ नही बोला सिर्फ खाली आसमान में ताकता रहा और फिर निरपेक्ष भाव से बोला.. नही मैं किसी को नही जानता, पर जब भी कोई मरता है , देह से मुक्ति पाता है तो मुझे लगता है कि ये मैं हूँ एक समूची देह जो सदियों जन्म ले रही हो, और मर रही है हर पल हर जगह और इसलिए मैं चला आता हूँ हर अर्थी के पीछे और कमबख्त आंसू निकल आते है मानो मैं खुद ही अपने मरने पर दुखी हूँ , संजीदा हूँ बेहद कि इस मरने को इतना देख लूँ कि अपने मरने का कोई रंजो गम ना हो और निष्काम और तटस्थ भाव से मुक्त हो सकूं...

वह जा रहा था और लोग देख रहे थे उसे.... फिर जलती हुई लाश में वहशीपन नजर आया और सबने अपनी मौत को साक्षात नृत्य करते देखा.... सब भयाक्रान्त थे, बेहद डरे हुए और कमजोर से... आँखों से आंसू कब निकल पड़े ... आज किसी को घर जाने की जल्दी नही थी ... आज वे जिंदगी की डील में मौत से हार गए थे...
- एक मौत पर , जिसका सबको बेसब्री से इन्तजार था, को देखते हुए.

ये आतुर कंठ, ये उन्मुक्त साँसे, ये चटके से सपने, ये हाथों में अंजुरी भर के कोलाहल और दीप्त सी आँखों में भयावह अँधेरे - शायद चलाचली की बेला है और थम रहा है सब कुछ, धूरी पर घूमती अवनी के किसी कोने में गोल अब ठोस तिकोन में बदल गया है और यह व्यथा ख़त्म होकर अपने ही बनाए संताप में घूम घूमकर, चक्कर लगाकर थक गयी है........तिमिर है, कही बियाबान, कही फाका और कही नवनीत, यही कही उद्दाम वेग से प्रचंड होती शास्त्रों की ऋचाएं, देखो, देखो........सुनो, सुनो.......इन्हें महसूस करो और फिर कहो... असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय ....
छोड़ा तो कुछ नहीं था पाने के लिए और पाने के बाद सब कुछ छुट गया, ना अपना रहा कुछ, ना कुछ अपना सा भ्रम देने वाला, बस बीत रहा है सब कुछ और अस्ताचल का सूर्य ठीक सामने है और दूर कही एक तारा टिमटिमा रहा है , किसी क्षितिज से चाँद की रोशनी छन कर निकल रही है और ठीक इसी समय एक सांस बेचैन है टूट जाने को और व्योम में मिल जाने को.......

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...

सतरें जीवन के - तटस्थ Satare Jivan ke

सतरें जीवन के   जब प्रवाह में बह जाने का समय आता है, लगता है कि अब सब खत्म हो ही रहा है - अचानक एक तिनका कही से तैरते हुए आ जाता है और शिद्दत से थाम लेता है यह कहकर कि धैर्य रखो, शांत हो जाओ - उजाले की किरणें छटा बिखेरेंगी जल्दी ही शाम ओस से भीगी हुई एक कविता है जिसने संसार में अपनी लय से सबको बाँध रखा है जीवन झूठ का पुलिंदा है और हम सब इसे पसंद करते है, हम सब झूठ के साम्राज्य को बनाये रखना चाहते है और इसी उपक्रम में मरने तक मेहनत करते रहते हैं, अंत में मौत का सच इसकी हवा निकाल देता है अयोग्यता ही असली धन और शांति है, जब तक अयोग्य लोग है तब तक योग्यता की असली और वीभत्स सच्चाई सामने आती रहेगी जो स्वाभाविक ना होकर ना - ना प्रकार के कृत्रिम संसाधनों से अर्जित कर सुख सम्पदा हासिल करने के लिए बेहतरीन स्वांग के साथ ओढ़ी गई है हारना और स्वीकारना हिम्मत का काम है और इसकी जड़ें बहुत गहरी होती है, अपूर्णताएँ, अकुशलताएँ और अधकचरी थोथी सूचनाएँ जीवन के उत्तरार्ध में आपको एहसास दिलाती है कि आपके सारे प्रयास, अभ्यास और चेष्टाएँ व्यर्थ है - इसलिये ख़ारिज करो अपने हर कर्म को, समझ को, देख...