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हमारे साथ हमारे भीतर- घर





और फिर याद आया कि इसी घर में सब कुछ शुरू हुआ, माँ-बाप ने मेहनत से हमें पालते हुए घर सन 1982 में बनाया, इसे संजोया और संवारा, हर कोने में हम अपना बचपन जवानी और अब ढलता हुआ जीवन देख रहे है, सबसे जुड़े- एक बड़ी वृहद् दुनिया से, भाषा और तमीज सीखी. जब परेशान हुए तो घर ही वह शरण स्थली बना जहां हमने अपने आपको हर बार फिर से ढाल लिया कि एक नई लड़ाई लड़ेंगे और जीतकर लौटेंगे. इस दौरान माँ, पिता को खोया, बहुत सारे दोस्तों रिश्तेदारों को खोया जो इसमे से गुजर कर गए थे........ कितनी यादें जुडी है.

इतनी सारी मौतों को देखने और बहुत कुछ खोने के बाद किसी ने कहा मकान बेच दो अपशकुनी है, पर ऐसा होता है क्या? समय का पहिया तो घूमता है और चीजें और हम क्षणे क्षणे ख़त्म होते रहते है, और एक बार फिर सब कुछ धीरे धीरे ख़त्म हो रहा है.............पर घर घर ही होता है............घर दीवार, फर्श या खिड़की दरवाजें नहीं होता वो हमारे भीतर बसता है साँसों की तरह से धड़कता और जीता जगता एक सम्पूर्ण घर.

हर उस बालू के कण पर, उस ईंट पर, हर उस हिस्से पर लिखा है कि यह सब तो तय था, होना ही था, पर घर अभी भी अपने पुरे स्वरुप में मुकम्मल रूप से हमारे साथ हमारे भीतर भी मौजूद है, कुछ हिस्से है जो कह रहे है कहाँ गए वो लोग पर अब जवाब मेरे पास नहीं है. अंधेरों में जूझते घर को हम सिर्फ रोशन कर सकते है सिर्फ अपने प्रयासों से और कुछ नहीं.........







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