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शव एक उठेगा मेरी देह में कलपेगा

रात को अन्धेरा भोग रहा है.शव एक उठेगा मेरी देह में कलपेगा...ओह मेरे प्राण कब से तुम मुझे सिगड़ी पर सेक रहे हो. तरस मत खाना .एक एक पसली की तरह तोड़ना.मुझे चूमना जैसे दीमक पुरानी किताब को चूमे.खाना जैसे सपने भक्षण करते है. मेरे मित्र....जालिम मेरे नाखून जरा बेरहमी से उखाड़ना .लो मुझे निर्वसन कर स्नान करो मेरे साथ.मेरी अर्थी को कंधा नही चुम्बन करो.काली नागिन सी सड़क पर मेरी केंचुल से संवाद करना .जागना कि मेरे परखच्चे तुम्हारे गर्भ पर न पड़ जाए.जागना कि तुम्हे भोगता मै अशुभ देख न लूं.जागना कि मै जाग न जाऊं , देखो हम निर्वसन निश्चल बर्फ पर पड़े दो मृत शब्द है, आओ कि अंधरे में कोई हमारा गुल्लक खाली कर रहा है .जागो कि तिड़कती अस्थियों में हमारा विलाप तुम से आलिंगनबद्ध हो रहा. देखो निर्वसन मुझ में स्वप्न वसन धारण कर रहे. देखो अंतिम साँसों में एक राग किस तरह उतप्त दहला रहा.देखो तुम किस तरह मुझे विलगाती अलगाती संयुक्त हो रही.आओ कि मै जा सकूं.तुम्हारी देह में बेघर हो सकूं.देह मै तुम मुझे खोना ताकि प्राप्त कर अपनी उफनती साँसों में तुम पिघल सको.लो...मेरे शव को . दो अपनी राख.चन्दन सा बहकता मै तुम्हे महकती खो सकूं.प्राण मेरी पुरुष देह में विकसती स्त्री को तुम निचोड़ दो.मेरा यही श्राद्ध है.

Anirudh Umat की लेखनी

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