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पुरुषों के लिए भी सेफ्टी स्पॉट रखे जाये. सन्दर्भ सोलह साल में सेक्स के लिए सहमति क़ानून.




सोलह साल वाला क़ानून बन गया है, सारे गुणा-भाग सबके हित में है या अहित में कौन जाने पर इस क़ानून का दुरुपोग ना हो खासकरके पुरुषों के खिलाफ जैसे दहेज क़ानून का या अनुसूचित जाति -जनजाति क़ानून का दुरुपयोग आमतौर पर होता आ रहा है, दूसरा सब कुछ होने के बाद के लिए क़ानून है पर "प्रिवेंटिव मेजर्स" कहाँ है कि ऐसी घटनाएँ ना हो.

मै बहुत जिम्मेदार के साथ यह लिख रहा हूँ कि आजकल कई जगहों पर पुरुषों को बहुत चालाक महिलाए दहेज प्रताडना या ऐसे ही मामलों में फंसा रही है, और इस नए क़ानून में ऐसे कई "लूप होल्स" दिख रहे है जो सीधे सीधे पुरुषों को फंसाने के लिए काफी है.

कई अतिरेक में डूबी हुई एकल, परित्यक्ता, विधवा, और मानसिक रूप से भयानक फ्रस्ट्रेटेड महिलायें इसका दुरुपयोग करेंगी यह मानकर चलिए और इसमे पुरुष को निशाना बनाया जाएगा. इसलिए अभी से बेहतर है कि कार्यस्थल पर, सार्वजनिक स्थलों पर पुरुषों के लिए भी सेफ्टी स्पॉट रखे जाये.

कई संस्थाओं में महिलाओं ने भयानक ड्रामे करके काम करने वाले पुरुषों को हटाने की गंदी और बेहद घटिया राजनीती की है ये वो महिलायें है जो अपने व्यक्तिगत जीवन में कुछ नहीं कर पाई और सिर्फ शराबखोरी और कई पुरुषों के साथ वासना के चक्कर में अपना तो जीवन गंवा बैठी बल्कि साथ काम करने वाले पुरुष सहकर्मियों की जिंदगी भी इन्होने बिगाड़ दी.

मै कतई इस तरह के क़ानून के खिलाफ नहीं पर जो महिलाये या संगठन काम नहीं करते पर साथ में काम करने वाले पुरुषों के खिलाफ अनर्गल प्रचार में व्यस्त रहते है ऐसी महिलाओं पर भी नियंत्रण रखने की जरुरत है. ये कुमार्गी महिलायें बेहद कुंठित और त्रस्त है अपने जीवन से और अपनी काली कमाई का तीन चौथाई हिस्सा भोग विलास पर ही खर्च करती है और इनके कारण कितने ही पुरुष अपने जीवन से हाथ धो बैठे है. ऐसे ही मामले दहेज उत्पीडन के है जहां आधे से ज्यादा मामले झूठे है और लडकियों ने अपने पूर्व प्रेमी से मिलने के लिए सभ्य और भले लोगों पर नाजायज इल्जाम लगाए है.

यह कानून कैसे इन मुद्दों की परख करेगा इस पर भी व्यापक बात करने की जरुरत है.

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