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बुद्धिजीवियों के उद्धार का ठेका

सत्यनारायण के साथ मुझे बांदा जाना था सुनील और बहादुर जा रहे है और मुझे भी शबरी पुरस्कार वितरण समारोह में जाना था पर हमने सिस्टम बनाए है जो आदमी को मारने के लिए ईजाद किये गए है आदमी को किस तरह से इतना हैरान परेशान किया जाए कि वो त्रस्त होकर गुलाम बन् जाए और फ़िर बिलकुल गुलामो की तरह से व्यवहार करने लगे.......एक गंदे नाले में पड़ा हुआ सिस्टम और बेहद धूर्त दर्जे के घटिया लोग, सिवाय मक्कारी और रूपया कमाने के जिन्हें कुछ ना आता हो और ऊपर से सरकारी मुलम्मा पहनकर ओढकर बिछाकर ये लोग किस लोकतंत्र की बात करते है .....शर्मनाक है यह सब, राज्य और कल्याणकारी राज्य का सपना संजोये हुए हमने १९५० को गणतंत्र बनाया था और कल उसकी बरसी है दुर्भाग्य की ऐसे लीचड लोग जिन्हें लोकतंत्र के "ल" में यकीन नहीं, ना आस्था- वो इस देश के बुद्धिजीवियों के उद्धार का ठेका लिए बैठे है.....खून खोल रहा है आज देश के नाम , नेताओं के नाम, भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट्स के नाम, दो कौड़ी के बाबूओ के नाम.... दिल करता है कि बगावत करके सबको ठीक कर दू और तंत्र उखाड फेंकू..................रास्ता किधर है.........????

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हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

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