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दिसम्बर का आखरी हफ्ता,उस रोज़ रात और भोर में फर्क करना मुश्किल हो रहा था,सड़क पर कुछ लोग,अँधेरे में खम्बों पर लगी लाइट्स,और कोहरे को चीर कर आती गाड़ियों की रौशनी से मुझे उस सुनसान सी सड़क पर चलने का हौसला मिल रहा था,शायद बर्फ पड़ने की बात सुबह ही अखबारों में पढ़ी थी,कुछ ने लिखा था पेड़ों की पत्तियों और पानी पर बर्फ की एक पतली वरक जम जायगी ,पर इन सब से बेखबर आधी रात को तुम्हारे बुलाने पर आया था,काफी देर इंतज़ार के बाद, उस पेड़ के पत्तों की ओर निगाह गयी, जिसके नीचे मै खड़ा हो कर तुम्हारे घर की ओर बड़ी हसरत भरी निगाहों से देख रहा था,उसमे किसी भी तरह की हरक़त नही हो रही थी,हाथों से छुआ, तो बर्फ उँगलियों पे आ जमी,उस बर्फ को तो उँगलियों से अलग कर दिया, पर आज भी तुम्हारा वो आखरी इंतज़ार याद आता है,पत्तियों पर तो बर्फ की वजह से उन्हें सांस लेने में दिक्कत आई, पर मुझे, तुम्हारे न आने से बहुत तकलीफ हुई.!

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आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

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