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मनोज पटेल के कुछ अनुवादों के कोट्स

1. कविताएँ लिखते हुए,
हथेली पर चीरा लग गया कागज़ से.
तकरीबन एक-चौथाई बढ़ा दी इस चीरे ने
मेरी जीवन रेखा. (वेरा पावलोवा)

2. मेरी किस्मत जहाजरानी के कारखाने में नहीं बनी
फिर भी मैनें समुन्दर के फासले तय किए. (अफजाल अहमद सैयद)

3. क्या सच में तरल थीं सभी धातुएं पहले ?
तो क्या गर खरीदी होती कार हमने कुछ पहले
दिया होता उन्होंने इसे एक कप में हमें ? (नाओमी शिहाब न्ये)

4. तुम्हारे आने से पहले
गद्द्य थी दुनिया
कविता तो अब हुई है पैदा. (निज़ार कब्बानी)

5. कालीन पर तुम्हारे पाँव
नाक-नक्श हैं
कविता के. (निज़ार कब्बानी)

6. मैं मशहूर होना चाहती हूँ वैसे ही
जैसे मशहूर होती है गरारी,
या एक काज बटन का,
इसलिए नहीं कि इन्होनें कर दिया कोई बड़ा काम,
बल्कि इसलिए कि वे कभी नहीं चूके उससे
जो वे कर सकते थे. (नाओमी शिहाब न्ये)

7. कौन देगा दिलासा मेरी माँ को
फिर रोएगा चुपके-चुपके कौन अगर मर गई मैं
और अगर कहीं मर गई मैं चटपट
तुम्हारे दिल से कौन जुदा करेगा मेरा दिल ? (लीना तिबी)

8. आदमी के ऊंचे उठे सर को
सहारा देने की खातिर
हमें तलाश है
एक रीढ़ की हड्डी की
जो रह सके
सीधी. (मिरोस्लाव होलुब)

9. ऎसी ही तो है ज़िंदगी
सात बार गिरना
और उठना आठ बार. (रोलाँ बार्थ की 'ए लवर्स डिस्कोर्स' से)

10. जब गुजर जाती है कोई खूबसूरत स्त्री
पृथ्वी खो देती है संतुलन अपना
सौ साल के मातम का एलान करता है चंद्रमा
और बेरोजगार हो जाती है कविता (निज़ार कब्बानी)

11. मैनें बीस पंक्तियाँ लिखीं प्रेम के बारे में
और कल्पना किया कि
यह घेरेबंदी
बीस मीटर पीछे हट गई है. (महमूद दरवेश)

12. मैंने अपनी पीठ पर लादा था अपने कामरेड को.
और उसे अपने नीचे मेरी झुकी हुई पीठ
ग्लोब के उभरे हुए हिस्से जैसी लगती है. (येहूदा आमिखाई)

13. रेत, मैं तुम्हें मुबारकबाद देता हूँ.
सिर्फ तुम ही ढाल सकती हो
पानी और मरीचिका को
एक ही प्याले में. (अडोनिस)

14. अगर जैतून के पेड़ जानते होते उन हाथों को
जिन्होनें उन्हें रोपा था
उनके तेल आंसुओं में बदल गए होते. (महमूद दरवेश)


15. अगर लौट सकूं शुरूआत तक
कुछ कम अक्षर चुनूंगा अपने नाम के लिए. (महमूद दरवेश)

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