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नाम का संकट और अस्मिता का संकट

Santosh Kr. Pandey: लोग कैसे कैसे मजेदार, अजीब, रोचक नाम रखते हैं ! कुछ महीनो पहले एक ब्रिटिश महिला से मुलाक़ात हुई और उनका नाम था -- "Edit Kiss " ! भारत में मेरे एक टीचर की पत्नी का नाम था- "पांचाली " (गुरु और गुरु माता दोनों मुझे माफ़ करें, वैसे ये कोई गुप्त बात नहीं है! ) !मोहल्ले के २ अधनंगे लौंडो का नाम था- " चिर्रे और चिगोढ़े (क्या अर्थ है आज तक मुझे नहीं समझ में आया)! पहली बार गावं में जब वोटर कार्ड के लिए फोटोग्राफर आया तो कुछ महिलाओं को अपना असली नाम तक याद नहीं था ! कारण ये था की वर्षों पहले जब वे गावं में ब्याह के आयीं थी तो उनके मायके की दिशा के आधार पर उन्हें लोग बुलाने लगे --जैसे - "पुरबही, दखिनही "! इसी से गावं के इस नियम का भी पता चला की किसी का नाम " पछही" नहीं है क्योंकि पश्चिम की तरफ से बहुवें नही लाई जाती बल्कि पश्चिम की तरफ केवल बेटियों को भेजा जाता है ! नाम के इस पुराण पर आप लोग भी अपनी राय दें !
मेरा जवाब भाई संतोष को.........
इसलिए में हमेशा कहता हूँ कि मुझे सिर्फ मेरे नाम से पुकारो....क्योकि कई दिनों बाद हम पापा, चाचा, ताऊ, मामा, भैया, बोस, साहब या कुछ और बन् जाते है और एक दिन जब कोई अपना नाम लेकर पुकारता है तो हम असमंजस में पड जाते है कि ये कौन है........और अपने होने की सार्थकता भी खो देते है पर हमारे मूल्य हमें सिखाते है कि नाम ना ले बहुत ही जोर देने पर कि मुझे मेरे नाम से पुकारो तो लोग संदीप जी, भाई जी या पता नहीं क्या क्या विशेषण लगाकर पुकारते है जो कि बहुत ही आपत्तिजनक है या फ़िर कहते है इसे अस्मिता का संकट हो गया है (Identity Crisis) पर में आज भी सबसे कहता हूँ कि मुझे मेरे सिर्फ और सिर्फ नाम से पुकारो कोई Suffix or Prefix नहीं .........छोटे हो या बड़े सिर्फ नाम.............असल में शेक्सपियर ने गडबड की है कि नाम में क्या रखा है................अच्छा मुद्दा उठाने के लिए "आदरणीय प्रिय संतोष भाई जी साहब"......ही ही ही ही ही अब में छेड़ रहा हूँ...............श्रीमान जी को.........

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