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इतना तो नहीं - गीत चतुर्वेदी की एक कविता

इतना तो नहीं

मैं इतना तो नहीं चला कि
मेरे जूते फट जाएँ

मैं चला सिद्धार्थ के शहर से हर्ष के गाँव तक
मैं चन्द्रगुप्त अशोक खुसरो और रज़िया से ही मिल पाया
मेरे जूतों के निशान
डि'गामा के गोवा और हेमू के पानीपत में हैं
अभी कितनी जगह जाना था मुझे
अभी कितनों से मिलना था
इतना तो नहीं चला कि
मेरे जूते फट जाएँ

मैंने जो नोट दिए थे, वे करकराते कड़क थे
जो जूते तुमने दिए, उनने मुँह खोल दिया इतनी जल्दी
दुकानदार !
यह कैसी दग़ाबाज़ी है

मैं इस सड़क पर पैदल हूँ और
ख़ुद को अकेला पाता हूँ
अभी तल्लों से अलग हो जाएगा जूते का धड़
और जो मिलेंगे मुझसे
उनसे क्या कहूँगा
कि मैं ऐसी सदी में हूँ
जहाँ दाम चुकाकर भी असल नहीं मिलता
जहाँ तुम्हारे युगों के मुक़ाबले आसान है व्यापार
जहाँ यूनान का पसीना टपकता है मगध में
और पलक झपकते सोना बन जाता है
जहाँ गालों पर ढोकर लाते हैं हम वेनिस का पानी
उस सदी में ऐसा जूता नहीं
जो इक्कीस दिन भी टिक सके पैरों में साबुत
कि अब साफ़ दिखाने वाले चश्मे बनते हैं
फ़िर भी कितना मुश्किल है
किसी की आँखों का जल देखना
और छल देखना
कि दिल में छिपा है क्या-क्या यह बता दे
ऐसा कोई उपकरण अब तक नहीं बन पाया

इस सदी में कम से कम मिल गए जूते
अगली सदी में ऐसा होगा कि
दुकानदार दाम भी ले ले
और जूते भी न दे ?

फट गए जूतों के साथ एक आदमी
बीच सड़क पैदल
कैसे गीली रुई बन जाता है

कोई मुझसे न पूछे
मैं चलते-चलते ठिठक क्यों गया हूँ

इस लम्बी सड़क पर
क़दम-क़दम पर छलका है खून
जिसे किसी जड़ में नहीं डाला जा सकता
जिससे खाद भी नहीं बना सकते केंचुए
यहाँ कहाँ मिलेगा कोई मोची
जो चार कीलें ही मार दे

कपड़े जो मैनें पहने हैं
ये मेरी आत्मा को नहीं ढँक सकते
चमक जो मेरी आँखों में है
उस रोशनी से है जो मेरे भीतर नहीं पहुँचती
पसीना जो बाहर निकला है
वह आत्मा का आँसू है
जूते जो पहने हैं मैनें
असल में वह व्यापार है

अभी अकबर से मिलना था मुझे
और कहना था
कोई रोग हो तो अपने ही ज़माने के हकीम को दिखाना
इस सदी में मत आना
यहाँ
खड़िए का चूरन खिला देते हैं चमकती पुर्जी में लपेट

मुझे सैकड़ों साल पुराने एक सम्राट और भिश्ती से मिलने जाना है
जिसके बारे में बच्चे पढेंगे स्कूलों में
मैं अपनी सदी का राजदूत
कैसे बैठूँगा उसके दरबार में
कैसे बताऊँगा ठगी की इस सदी के बारे में
जहाँ वह भेस बदलकर आएगा फ़िर पछताएगा
मैं कैसे कहूँगा रास्ते में मिलने वाले इतिहास से
कि अगली सदियों में संभलकर जाना
आगे बहुत बड़े ठग खड़े हैं
तुम्हे उल्टा लटका देंगे तुम्हारे ही रोपे किसी पेड़ पर

मैं मसीहा नहीं जो नंगे पैर चल लूँ
इन पथरीली सड़कों पर
मैं एक मामूली, बहुत मामूली इनसान हूँ
इनसानियत के हक़ में ख़ामोश
मैं एक सज़ायाफ़्ता हूँ
अबोध होने का दोषी
चौबीसों घंटे फाँसी के तख़्त पर खड़ा
एक वस्तु हूँ
एक खोई हुई चीख़
मजमे में बदल गया एक रुदन हूँ
मेरे फटे जूतों पर न हँसा जाए
मैं दोनों हाथ ऊपर उठाता हूँ
इसे प्रार्थना भले समझ लें
बिलकुल
समर्पण का संकेत नहीं



[गीत चतुर्वेदी उन नामों में से एक हैं, जिनसे हिन्दी साहित्य की युवा कविता धारा पहचानी जाती है. गीत चतुर्वेदी का आभार, उन्होंने अपनी कविता प्रकाशित करने की सहर्ष अनुमति दी. काल-यात्रा और जूते जैसे एक बेसिक एलिमेंट से झगड़ता और साम्य बैठाता एक यात्री कितनी अलग-अलग परेशानियों से गुज़रता है, इसे गीत चतुर्वेदी ने बड़े सरल तरीक़े से दिखाया है. यहाँ डि'गामा व अक़बर हैं तो ख़ुसरो और रज़िया भी हैं. एक बात तो साफ़ है, गीत चतुर्वेदी की कवितायें अत्यंत साफ़ और आत्मा की गहराइयों से निकली कवितायेँ हैं, उन कविताओं से बिलकुल भिन्न, जहाँ उपलब्ध बुद्धि और किताबी ज्ञान का बोलबाला

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