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वरवर राव की कविता

लक़ीर खींच कर जब खड़े हों

मिट्टी से बचना सम्भव नहीं ।

नक्सलबाड़ी का तीर खींच कर जब खड़े हों

मर्यादा में रहकर बोलना सम्भव नहीं

आक्रोश भरे गीतों की धुन

वेदना के स्वर में सम्भव नहीं ।

ख़ून से रंगे हाथों की बातें

ज़ोर-ज़ोर से चीख़-चीख़ कर छाती पीटकर

कही जाती हैं

वरवर राव

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