You have to choose your own battles, and the right place to conquer
Be careful while choosing the both, because we have limited time and energy
***दिन उदासियां की स्मृतियों से गुजरता है और रातें भविष्य की कोख में जन्म लेने के स्वप्न देखते विदा हो रही है, तुमसे बात करने की सदिच्छा में भोर होती है और दिन चढ़ने तक स्मृति पटल से सब मिट जाता है, इन यात्राओं के साथ भौतिक यात्राओं पर भी प्रतिबंध लगा सकूं तो सुकून की छांह में यह अर्थहीनता कुछ कम हो, जीवन अनिश्चितताओं में इस उम्मीद पर हर पल बीतता है कि "यह भी गुजर जायेगा, सकारात्मक बने रहो" - पर ना ये सब गुजरता है और ना जीवन का अंत करीब नज़र आता है और इस सबके बीच व्योम में टंगी आत्मा का बोझ शरीर के मानस पर दिनों-दिन बढ़ते ही जा रहा है
इधर कबीट (कैथा)की खुश्बू, जंगली इमली, महुआ, तेंदू की नर्म पत्तियाँ, जामुन के कच्चे फल, आम की कच्ची छोटी गुठलियां, खिरनी का पीलापन, इमली की खटास, करौंदे की खटास, चारोली यानी अचार की मिठास और कच्चा हरापन और देर रात तक ठंडी हवा में सुबह के शुक्र तारे के सपने बेचैन कर रहें है, लगता है अरुण दाते की आवाज में "भातुकली च्या खेला मधली राजा आणिक रानी" गाना सुनता रहूं, दौड़ना चाहता हूँ उन पगडंडियों पर जो घने और घने झुरमुटों के बीच से होकर गुजरती है और अमर बेल के झुंड में फंसकर किसी नदी के किनारे फिसलना चाहता हूँ या पुष्कर के उस बड़े ताल के किनारे देर शाम तक डूबते सूरज को निहारना चाहता हूँ, ख्वाजा साहब की दरगाह पर रातभर सूफी कव्वालियां सुनता रहूँ जो जीवन दृष्टि देती है या अरूणाचल प्रदेश के त्वांग जिले के उन सर्पिले घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर पुनः लौट जाना चाहता हूँ या जोशीमठ में कही फूलों के बीच वाबस्ता होकर शिद्दत से तुम्हे याद करते हुए सिर्फ एक बार लंबी और आखिरी कविता लिखना चाहता हूँ
उन सपनों की कथा कहो ना - किसी एक नदी का नाम लेते हुए
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मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है
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संसार के इतने बड़े हिस्से में राज करते हुए आज अपने गीत - संगीत की जादू भरी पोटली और असंख्य गानों के साजो - सामान को यही छोड़कर कहां चली गई , शायद वहां जाकर एक बार तो पूछोगी - जब कोई नहीं होगा, अपना - पराया या कोई नहीं दिखेगा संगीत का मुरीद तो गुनगुनाओगी नहीं आशा दी - "ये क्या जगह है दोस्तों", बहुत याद आओगी आशा दी
गंभीर उदासी भरे गीतों के लिए जहां लता दी को सुनता रहा, वही शोख और चंचल आवाज के लिए आशा दी को सुनना अचरज से भर देता था, पंचम दा के साथ जीवन, घर में ही बड़ी बहन लता दी का दबदबा और बाकी अपनी ही सहोदर बहनों से प्रतिस्पर्धा करती रही, वाणी जयराम, सुमन कल्याणपूरे, अनुराधा पौडवाल, अल्का याग्निक या अन्य की बात तो छोड़ ही दो
गीत हो, गज़ल या कोई कव्वाली - अपनी आवाज से जादू बिखेरती आशा दी की बात ही निराली थी, वे जगजीत के साथ लाइव में बैठ जाती ठसक से या मेहंदी साहब के साथ, हरिहरन, बाला सुब्रमण्यम, गुलाम अली हो या आओगे जब तुम साजना गाते वक्त उस्ताद राशिद खां के साथ, किशोर कुमार, रफी, मन्ना डे, हेमंत दा, महेंद्र कपूर, या मुकेश के साथ शब्बीर कुमार या कुमार सानू को अकेले में सुनना यानी आशा दी के बगैर सच में अधूरा लगता है
विवाद और प्यार, दोस्ती और सहजता जिनके जीवन का हिस्सा रहा, हिंदी के संग मराठी और दीगर भाषाओं में गीतों को समझना और बाकी मराठी नाट्य संगीत को भी उनसे जितना सुना - वह विलक्षण था, शायद यह विश्वास करना खुद के लिए ही मुश्किल हो कि हमने संगीत में इन बहनों का वर्चस्व और जादू देखा है
कहने की जरूरत नहीं कि हम उस पीढ़ी के हिस्सा है जिन्होंने लता, आशा, उषा, वाणी जयराम, अनुराधा पौडवाल, सुमन कल्याणपूरे, अल्का याग्निक, सुनिधि चौहान या और भी असंख्य गायिकाओं को अपने सामने गाते, झूमते और संगीत के दबदबे को बिखेरते देखा है, दुर्भाग्य से लता दी के बाद आज आशा दी ने भी यह संसार छोड़ दिया और माँ सरस्वती की वाणी की तरह गूंजने वाली आवाज सदा के लिए शांत हो गई
जहां भी रहो, सुख - सुकून और शांति से रहो, आप हमेशा हमारे दिल में रहोगी आशा दी
सादर प्रणाम और श्रद्धांजलि
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हर्ष के बरक्स अंतिम अरण्य
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अभी निर्मल वर्मा का "अंतिम अरण्य" पुनः पढ़ रहा हूँ तो सुरेंद्र वर्मा का "मुझे चाँद चाहिए" भी याद आ रहा है - जिसे मैंने एक पाठयपुस्तक की तरह से बार-बार पढ़ा है, निर्मल के "अंतिम अरण्य" का नायक जहां एक बड़े वितान का नायक है और अपने अंतिम दिनों में घर लौटता है - जहां नौकर है, वैभव है, अकेलापन है, जंगल है और उम्र भर की स्मृतियां है, वही "मुझे चाँद चाहिए" का नायक हर्ष युवा है, अमीर है, दिल्ली में अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर आया है और उसके पास संसार के सारे अप्रतिम सुख है, उमंगों और उल्लास से भरा जीवन है - पर दोनों ही नायकों में एक मौत का इंतजार कर रहा है और दूसरा मौत को खुद आगे बढ़कर गले लगा लेता है, प्रेम की ताकत और ऐब दोनों जगह दिखते हैं पर सारी गड़बड़ भावनाओं और व्यवहार कुशलता की है
सुरेन्द्र वर्मा कृत "मुझे चाँद चाहिए" - के केंद्रीय पात्र हर्ष को यदि केवल एक निराश या पलायनवादी व्यक्ति मान लिया जाए तो यह उसके चरित्र के साथ अन्याय होगा, हर्ष दरअसल एक व्यवहारिक, संवेदनशील और प्रेम तथा असफलताओं का सरताज है—एक ऐसा नायक, जिसकी सबसे बड़ी त्रासदी उसकी अधूरी रह गई ज़िंदगी है
हर्ष जीवन को बहुत गहराई से समझता है, वह भावुक अवश्य है, परन्तु अव्यावहारिक नहीं - उसे यह स्पष्ट बोध है कि जीवन केवल इच्छाओं से नहीं चलता, बल्कि परिस्थितियों, सामाजिक मर्यादाओं और समय की कठोरता से भी संचालित होता है, वर्षा वशिष्ठ के प्रति उसका प्रेम सच्चा और निष्कलुष है, किन्तु वह यह भी जानता है कि हर सच्चा प्रेम अपने मुकाम तक नहीं पहुँचता और यही व्यवहारिकता उसे एक परिपक्व व्यक्तित्व बनाती है
प्रेम के क्षेत्र में हर्ष एक “सरताज” इस अर्थ में है कि वह प्रेम को केवल पाने का माध्यम नहीं मानता, बल्कि उसे एक गहन अनुभूति, एक साधना की तरह जीता है, वह वर्षा से अपने प्रेम में स्वार्थ नहीं रखता, बल्कि उसकी खुशी और स्वतंत्रता को भी उतना ही महत्व देता है, उसके लिए प्रेम त्याग और समझ का दूसरा नाम है, यही कारण है कि उसका प्रेम, भले ही अधूरा रह जाए, पर उसकी गरिमा बनी रहती है
लेकिन जीवन की असफलताएँ—चाहे वे प्रेम की हों या आत्म-सिद्धि की—हर्ष के भीतर एक गहरा खालीपन छोड़ देती हैं, वह इन असफलताओं से भागता नहीं, बल्कि उन्हें पूरी ईमानदारी से स्वीकार करता है, फिर भी, लगातार अधूरेपन और विफलताओं का बोझ उसे भीतर से तोड़ देता है, उसकी आत्महत्या को केवल कमजोरी नहीं, बल्कि एक अधूरी जिंदगी की चरम अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है
इस प्रकार, हर्ष एक ऐसा नायक है जो अपने समय, परिस्थितियों और भावनाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है, पर अंततः जीवन की जटिलताओं में उलझ कर रह जाता है, वह हमें यह सिखाता है कि प्रेम और जीवन में असफल होना भी एक गहरी मानवीय सच्चाई है—और कभी-कभी यही अधूरापन किसी चरित्र को सबसे अधिक पूर्ण बना देता है
"मुझे चाँद चाहिए" - में हर्ष और वर्षा के संवाद विशेष रूप से जीवन की निरर्थकता, प्रेम की पीड़ा और मृत्यु की ओर झुकाव को गहराई से व्यक्त करते हैं, हर्ष की आत्महत्या से पहले के भाव सीधे, काव्यात्मक और भीतर तक बेचैन कर देने वाले हैं और ये बुरी तरह से व्यथित करते है, हिंदी में पढ़े उपन्यासों में शेखर के बाद हर्ष ही है जो दिल के बहुत करीब लगता है, मोहित से हमेशा कहता था कि हर्ष का प्रारब्ध और नियति ना जाने क्यों अपनी सी लगती है
हर्ष के ये वाक्य बारम्बार दिमाग में कौंधते है जब वो आत्महत्या के थोड़े समय पहले से वर्षा वशिष्ठ के साथ संवाद गहराई से करने लगता है
“वर्षा, कभी-कभी लगता है कि जो हम जी रहे हैं, वह हमारा अपना नहीं है… जैसे किसी और का अधूरा सपना हो"
“मैं तुम्हें चाहता हूँ, लेकिन शायद चाहना ही हमारे लिए सबसे बड़ी सज़ा बन गया है"
“मृत्यु से डर नहीं लगता अब… वह एक शांति जैसी लगती है, जहाँ कोई सवाल नहीं होंगे"
“मेरे भीतर जैसे सब कुछ खत्म हो गया है… बस एक खालीपन है, जो हर दिन थोड़ा और गहरा हो जाता है"
“अगर मैं चला जाऊँ, तो इसे भागना मत समझना… शायद यह मेरा एकमात्र सच होगा"
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“हम अपने जीवन को समझने की कोशिश में ही उसे खो देते हैं"
“मनुष्य अपने भीतर जितना गहरा उतरता है, उतना ही अकेला हो जाता है"
“मृत्यु कोई अचानक आने वाली चीज़ नहीं, वह धीरे-धीरे हमारे भीतर बसती रहती है"
“जीवन और मृत्यु के बीच कोई स्पष्ट रेखा नहीं होती, वे एक-दूसरे में घुलते रहते हैं'
“जो बीत गया है, वही सबसे अधिक जीवित रहता है"
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'अंतिम अरण्य' - निर्मल वर्मा को फिर से पढ़ रहा हूँ और यह लगभग समझ गया हूँ कि - "जब तक वो (ज्ञान) आता है, बहुत देर हो चुकी होती है
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लिखने - पढ़ने और सोचने - समझने का स्पेस खत्म हो गया है, कल एक कवि की कविता पर पाठकीय टिप्पणी की थी - जिसमें कवि पर नहीं, सिर्फ कविता के क्राफ्ट पर बात की थी कि पहली बार पढ़ने पर ही किसी समझदार को बहुत बारीकी से सांप्रदायिकता के बरक्स रची कविता है, यह समझ सकता है
बस इतना लिखना था कि कवि का लम्बा स्पष्टीकरण इनबॉक्स में आया - अन्य कविताओं के साथ कि मेरा ये आशय नहीं था, और ऐसी एक कविता थी - जिसको मैने तो कम से कम सन 2013 के बाद नहीं पढ़ा था
फिर किसी बनारस विवि के हिंदी वाले शोधार्थी के मुझे ट्रॉल किया, इस मूर्ख को संदीप नाईक लिखना नहीं आता,(सन्दीप नायक लिखा था - गंवार ने) हिंदी के शोधार्थी की इतनी बुरी हालत है कि आरक्षित कोटे से आ तो जाते है, पर विशुद्ध गंवार ही रहते है चार साल तक फिर गाइड के लंगोट धोकर डिग्री भी पा लेते है और नौकरी भी निर्लज्जता से हथिया लेते है, और इसकी वाल पर एक निहायत ही निर्लज्ज व्यक्ति ने जो आधे से ज्यादा सायकिक है और भोपाल की कवयित्री तेजी से रूपया उधार लेकर बैठा था और दोनों पति - पत्नी ने कइयों को बेवकूफ बनाया, मुझे परवर्ट कह रहा है, मै यह निजी कमेंट नहीं करना चाह रहा था, पर उस मूर्ख ने लिखा तो यह लिखना पड़ा
एक और कवि जो सेटिंग और कोटे से शोधार्थी बना है मेरा प्रतिकार कर रहा जबकि हाथ पांव जोड़कर अपनी कविताओं पर लिखने के लिए चिरौरी करता रहा है
दिल्ली के एक अधेड़ मूर्ख संपादक ने बजाय मेरी बात समझने के अपनी मूर्खता, प्रोफेसरी और कम अक्ली का प्रदर्शन करते हुए भड़ास लिख दी, जिसे बेहद घटिया हिंदी की आलोचना की समझ ना होने कारण बरसों पहले फेसबुक से हकाल दिया था, वो कूद गया बीच में, हमारे यहां कहते है - "दो के बीच जो बोलता है उसे मूर्ख कहा जाता हैं", अब समझ आया कि यह पढ़ाने के बजाय दिल्ली के प्राध्यापकों की राजनीति में क्यों धरने प्रदर्शन करता है, हवा हवाई करने वाला यह क्या ही हिंदी जानता होगा - गधे क्लास में तो पढ़ा नहीं सकते - बाहर ही ढेंचू - ढेंचू कर सकते है, बैल बुद्धि को लगता है कि हर जगह जंतर मंतर है, अबै उजबक मैं तेरा शोधार्थी नहीं, ना तेरे जैसे गधे से कोई काम पड़ेगा, बेवकूफ औकात में रह अपनी
बस इतना ही अभी कि संत्रास और दिमागी उथल - पुथल से बेहतर है पोस्ट डिलीट करो, हिंदी के बजबजाते हुए सेप्टिक टैंक में जो हल्के मल के टुकड़े है, और यही ज्यादा है इन दिनों - वो तैरकर ऊपर आ ही जाते है और यह एक बार नहीं - दर्जनों बार देखा है, एक बार "सीता - गीता - अंजू - मंजू - अनिता - सुनीता" ने ट्रॉल किया था और फिर इन सती सावित्रीयो की पोल इन्हीं ने खोल दी, इनके दिल फेंक जवान आशिकों के साथ के चक्कर मालूम पड़े तो इन ससुरियों की भी औकात समझ आई और अब आज अंत में यही पाया है कि इन घटिया लोगों के मुंह लगने से बेहतर है - अलग हो जाओ, जो अपनी निज जीवन में कुंठित है, बीवियों से परेशान है, गाइड के दस्त वाले पोतड़े और टट्टी पेशाब के लंगोट धोने में व्यस्त है, उधारी लेकर चुका नहीं पा रहें, हर जगह जलील हो रहे है, प्रोफेसर बन नहीं पा रहें, अपना शरीर संभालने के बजाय ललनाएं और कवयित्रियों की दाद और खुजाल पाने देश नाप रहे है, पढ़ाई - लिखाई के बजाय, उनसे क्या ही बहस करना, अफसोस ये हिंदी के हरकारे है और इन्हीं कमज़र्फ और नालायकों की वजह से क्षेत्रीय भाषाएं और लोकभाषाएं समृद्ध हो रही है
मुझे किसी से कोई रोटी - बेटी का संबंध तो बनाना नहीं है, और ना ही इन लीचड़ और हरामखोरो के समान कोई पुरस्कार लेना है या किसी साहित्य अकादमी का सचिव बनना है और देश की हर चिंदी पत्रिका में छपना है या किसी वाणी - राजकमल या अन्तिका से अपनी किताब लानी है - जो इन प्रकाशनों के संपादकों की नजर में चढ़ने के लिए बंदर कूद करता रहूं हरेक की वाल पर और नोबल पुरस्कार की दौड़ में रहूं या चरित्र प्रमाणपत्र लिखवाता रहूं
मुआफी पर भाड़ में जाओ और डूब मरो कमबख्तों, और थोड़ी भी इज्जत बची हो तो कही और चले जाओ अपना मुंह काला कर लो - हिंदी पर बड़ा उपकार होगा
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आखिर वही हुआ जिसका अंदेशा था, चलो देर आए दुरुस्त आए, असल में दुनिया के सारे ट्रंप बेहद लीचड़, कमजोर, और धूर्त है - जिनमें दो कौड़ी की अक्ल नहीं है, वे सिर्फ बकलोल है और शेखीबाज है
जो लोग अपने लोगों और अपने देश को साथ नहीं रख सकते, या अपने लोगों के विकास की बात नहीं कर सकते - वे इसके अलावा कुछ और नहीं कर सकते, विशुद्ध रूप से ये सब कायर और डरपोक है और अमेरिकी ट्रंप ने यह कल रात सिद्ध कर दिया और यह भी कि वो पूरा मानसिक रोगी है - बोले तो गंभीर mental, neurotic, depression and anxiety का शिकार है
हमारी मीडिया और मीडिया के दलालों को अब मसाला मिलना बंद होगा, पर कोई ना - अब चुनावों की घटिया रिपोर्टिंग चालू होगी - ताकि इन असुरों के नाखून पैने होते रहें और ये बर्बादी के कगार पर हम सबको ले जाएं
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"तो ट्रंप सभ्यता खत्म कर रहा है आज रात, और दुनिया खत्म हो जाएगी, तेरा क्या प्लान है यदि निपट गया तो फिर" लाईवा मिल गया था अभी बाजार में, मैने छेड़ दिया ससुर को
"भाई साहब मेरी आत्मा भटकेगी, प्लीज - प्लीज, युद्ध पर लिखी मेरी तेरह हजार पांच सौ बाईस कविताएं पड़ी है, किसी से छपवा दो, आश्वासन ही दे दो और भगवान के लिए कम से कम इक्कावन कविताएं सुन लो, आप घर चलो मैं आया" - लाईवा ने अपनी एक्टिवा को धकेलते हुए कहा
मैंने अपनी गाड़ी बढ़ाई और कहा - "बाबू मैं हरिद्वार निकल रहा हूँ बस अभी, तू घर आ मत जाना, पूरा घर हॉर्मुज की तरह से पैक कर दिया है और सैंतालीस कवि रक्षा कर रहें है घर की, आपस में एक दूसरे को कविताएं सुनाते हुए, समझा" और घर निकल आया, टीवी चालू कर रहा हूँ, अमेरिका के ट्रंप को वादा निभाते देखना चाहता हूँ
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