"मुंबईया फिल्म उद्योग के भांड और वैश्विक कलाकार"
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हमारे यहां कंगना रनौत जैसी गंवार और विशुद्ध मूर्ख से लेकर बाकी हेमामालिनी तक की मूक बधिर लोगों की फौज है, मूर्ख अक्षय जैसे लोग है जो पूछते है कि आप आम काटकर खाते है या छीलकर, लिएंडर पेस है - जो अंधभक्त होकर दक्षिणपंथ को ज्वाईन कर लेते है, दलाल मीडिया है जो विधायक सांसद और पार्षदों के टुकड़ों पर पलकर कुत्तों की तरह उनके पीछे कैमरे उठाए दौड़ते है, उनका हगा - मूता चाटकर पेट भरते है तभी ना गत बारह वर्षों में एक भी प्रेस वार्ता नहीं हुई
वही अमेरिका की सदाबहार अभिनेत्री मैरिल स्ट्रीप है जो मूर्ख डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत में मूल सवाल उठाती है और बगैर भय के ट्रंप को सवालों के बीच खड़ा करती है, हमारे परिधान को तो नौटंकी करने और शूट करने से फुर्सत नहीं मिल रही, पूरी दुनिया और अपना देश गैस, पेट्रोल और डीजल के साथ महंगाई से जूझ रहा है और वो अमर होने के नुस्खे शूट कर रहा किसी भांड की तरह कपड़े बदल बदलकर महिलाओं के बीच
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मेरिल ने कहा
आप परिवारों को तबाह कर रहे हैं और इसे राजनीति कह रहे हैं। हमें ऐसा नहीं होना चाहिए।"
ट्रम्प अपनी कुर्सी पर थोड़ा हिले। मॉडरेटर ने अपना पेन नीचे रख दिया। 17 लंबे सेकंड बीत गए—कोई नहीं बोला।
मेरिल ने अपनी बात जारी रखी, उनकी आवाज़ स्थिर थी और चिल्लाने से कहीं ज़्यादा प्रभावशाली थी—ऐसी गूंज जो सिर्फ़ उन्हीं में हो सकती है :
"यह देश मेहनतकश लोगों के आंदोलन और दिलों पर बना है। और जिन लोगों की आप सिर्फ़ संख्या के रूप में बात कर रहे हैं? वे हमारे खेतों में काम करते हैं, हमारा भोजन उगाते हैं, हमारे घर बनाते हैं और हमारे समुदायों की सेवा करते हैं। वे हमारे इतिहास का हिस्सा हैं, चाहे आपको पसंद हो या न हो।"
ट्रम्प ने बीच में बोलने की कोशिश की।
मेरिल ने एक उंगली उठाई—आक्रामक रूप से नहीं, बस दृढ़ता से, उस महिला के अधिकार के साथ जो सच्चाई को भली-भांति जानती है।
"मुझे बात पूरी करने दीजिए।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उसके बाद मेरिल बोलीं : "नेतृत्व लोगों को डराने के बारे में नहीं है, यह उनकी रक्षा करने के बारे में है। और क्रूरता ताकत नहीं होती है।"
श्रोता तालियाँ बजाते हुए अपनी सीटों से उठ खड़े हुए। ट्रम्प उठे और मंच से चले गए।
मेरिल वहीं रहीं। सीधे कैमरे में देखा, उनकी आवाज़ अब पहले से नरम थी, लेकिन उनके अब तक के किसी भी प्रदर्शन से ज़्यादा तीखी थी ।
"अगर हम रास्ता भटक गए हैं, तो लोगों को बाहर धकेलने से नहीं। हम उसे तब पाएंगे जब हम याद रखेंगे कि हमने क्या बनने का वादा किया था।"
• क्या सबक है इस बातचीत का -
वही कलाकार सच्चा कलाकार है जो भेडिये की आँख में आँख डालकर उसे भेड़िया कह सके !!
• क्या जिज्ञासा है -
क्या दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्मे बनाने वाली मुम्बईया बिरादरी में कोई मिस या मिस्टर मेरिल स्ट्रीप हैं ?
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एक मित्र से बातें कर रहा था कल, तब पता चला कि व्यक्तियों, संस्थाओं और संविधान के रखवालों के व्यवहार कितने घटिया और दोगले हो गए है, एक तो जनसरोकार और पैरवी की बात करते नहीं अघाते, दूसरा सारा ध्यान कुकर्मों, षडयंत्रों और ओछी हरकतों पर रहता है, तीसरा अपने सारे मददगारों को लगातार उपेक्षित करके पता नहीं किस दौड़ में दौड़कर कहां जाना चाहते है और आखिर में रूपये की हवस ने इन्हें विशुद्ध अंधा बना दिया है
मतलब न्याय, भ्रातृत्व, जेंडर, समता, समानता, स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की बात करने वाले और इसी से अपना पेट पालने वाले इस हद तक गिर जायेंगे कभी सोचा नहीं था
छी है इन पर, शर्मनाक और कायराना
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"कल्पनाशीलता, अभिव्यक्ति और कौशल" - बच्चों के लिए अति आवश्यक शैक्षिक मूल्य है ; सुनना - बोलना - पढ़ना और अंत में लिखना किसी भी भाषा सीखने के क्रम में महत्वपूर्ण चरण है, अखबार, पत्रिकाएं, किताबें इस सबमें बड़ा रोल अदा करती है
#चकमक पत्रिका से 1986-87 से जुड़ाव रहा है और यह दिल के इतने करीब है कि आज जब उम्र के छह दशक पूरे होनेवाले है तो चालीस सालों का यह साथ बहुत अज़ीज़ और करीबी है, हर अंक एक नया मुद्दा और नई समझ लेकर आता है, इस लंबी यात्रा में चकमक ने कई उतार - चढ़ाव देखें है और संपादकों ने अपने हिसाब से इसे ढालने की कोशिश की, पर प्रकाशक एकलव्य संस्था ने अपने मूल्यों, सिद्धांतों और बच्चों के साहित्य को लेकर कभी कोई समझौता नहीं किया, कई लोगों ने इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके निज जीवन में तरक्की की सीढ़ियां चढ़ी, संपत्ति अर्जित की ना मात्र चल - अचल, बल्कि नाम यश और कीर्ति भी, यहां तक कि अपनी दुकान भी बनाई और बाल साहित्य के नाम पर बेहद कमर्शियल होकर करोड़ों का टर्न ओवर हासिल किया और अभी भी कर रहें है, पर एकलव्य संस्था के मूल्य अभी भी वैसे ही है और इसलिए चकमक बाकी बाजारू और खरीदे - बिके हुए साहित्यकार, संपादक, धन के बल उचकते और दौड़ते पांच सितारा फर्जी लोगों की भीड़ में आज एक मजबूत प्रकाश स्तंभ की तरह है
कल यह अंक मिला तो सारे काम छोड़कर इसे पढ़ा, बच्चों की लिखी रचनाएं और उनके चित्र जितने अनूठे और अदभुत होते है - उसका कोई सानी संसार में नहीं हो सकता , असल में चकमक बाजार में बच्चों के नाम पर खरीद - बेच रहे बाल साहित्य, प्रकाशकों, संपादकों और लेखकों के लिए एक जवाब और चुनौती भी है
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परिलब्धियां, उपलब्धि, चल-अचल संपत्ति, भौतिक सुख-सुविधाएं, भोग-विलास और वो सारे उपक्रम जो जीवन में पाने के लिए हम सारी उम्र दौड़ते रहते है, और जब यह क्षणिक रूप से हाथ लगते हैं - तो समझ आता है कि जीवन तो बीत ही गया, जिन मौकों और स्थानों या समय पर हमें संसार देखना-समझना या उपभोग करना था - उस समय हम मेहनत कर जुटान में लगे थे और ज्यादा-ज्यादा पाने की दौड़ में व्यस्त थे, पर जब समय निकल गया तो ना जीवन हाथ आया और ना कुछ सुख भोग पाएं
आज भी देखता हूँ तो सत्तर-अस्सी पार के लोग सिर्फ और सिर्फ हर जगह से बटोरने में ही लगे हैं, जबकि वे इतने टूट गए है कि मशीनीकृत जीवन जी रहे हैं , वे ना प्रकृति को निहार पा रहें - ना अपनी संवेदनाओं को महसूस कर पा रहें है, एक अजीब सी हवस और उन्मुक्तता में जीते हुए सिर्फ बटोर रहें है, वस्तुत: उन्हें जगह और मौके खाली कर देना चाहिए़, अपने अनुभव बेचने के बजाय अपने लिए कुछ रचने-बुनने और गुनने के प्रयास करना चाहिए़ - शायद यही उन्हें बचाएगा
मैं कम से कम यह समझ गया हूँ, मेरे घर-परिवार में तीसरी पीढ़ी तैयार हो गई है, अपने परिचितों में पर्याप्त परिपक्वता और समझदारी आ गई है, अपने छात्रों को पुष्पित - पल्लवित होकर फ़ल देते और शाखाओं में बंटते देख रहा हूँ - तो बेहद खुश हूँ कि मेरा काम खत्म हो रहा है और अब समय रहते अपने आपको हर जगह से खारिज कर और स्वयं को विस्थापित कर किसी गैर प्रतिस्पर्धी स्थान और सुकून वाली जगह पर अनन्तिम समय का और निर्धारित दिन का इंतजार करूँ, लगभग सब छोड़ दिया है धन सम्पत्ति, बस एक किताबों का मोह है - जो धीरे-धीरे ही जायेगा यही शायद बेहतर है और सबसे बड़ी उपब्धियों भी
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