Skip to main content

Man Ko Chiththi Post of 2 Feb 2026

अपने अनुभव से कह रहा कि निराश, असफल, फेल, नापास होना बिल्कुल बुरा नहीं है, सकारात्मकता अच्छी बात है, पर मनुष्य जीवन में हमेशा उत्साह में, सकारात्मक या आशावादी नहीं हुआ जा सकता, और यदि मैं यह करता हूँ , दिखता हूँ या व्यवहार में लाता हूँ तो यह मैं अपने आप से दोगलापन कर रहा हूँ, अपने आपको धोखा दे रहा हूँ और असहज हूँ, मन और चित्त शांत नहीं है, कोई हड़बड़ाहट और बेचैनी है जो मुझे खाये जा रही है, इस सबमें दूसरों को धोखा देता हूँ - वह बात तो बहुत देर से हो सकती है कि मेरे इस नकली मुखौटे ने कितनों का नुकसान कर दिया, जीवन भर ऐसे मुखौटो से ही धोखा खाते आया हूँ - फिर वह विचारधारा हो, व्यवहार हो, ईमानदारी हो, साहित्य हो, समाजसेवा हो, कानूनी दायरे और अदालतें हो, न्याय हो, नैतिकता या स्वाभिमान, सब भोंथरे और थोथे निकलें
इसलिए कोशिश करता हूँ कि जैसा हूँ - वैसा ही रहूँ, जो भाव-भंगिमा भीतर से है वही बनी रहे, जो भाषा भीतर उपजती है वही व्यक्त करूँ - अब उसमें गाली आये या श्रृंगार , यही उम्मीद करता हूँ कि सकारात्मकता और प्रचंड आशा के बदले सहज, सरल जीवन बगैर दाँव-पेंच के बना रहें, जब जीवन भर कोई आवरण नहीं ओढ़ा तो अब क्या खाक सुधरूँगा, भलाई की उम्मीद करने का समय चला गया, ना अपेक्षा - ना उपेक्षा

#मन_को_चिठ्ठी 

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास

शिवानी (प्रसिद्द पत्रकार सुश्री मृणाल पांडेय जी की माताजी)  ने अपने उपन्यास "शमशान चम्पा" में एक जिक्र किया है चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास अवगुण तुझमे एक है भ्रमर ना आवें पास.    बहुत सालों तक वो परेशान होती रही कि आखिर चम्पा के पेड़ पर भंवरा क्यों नहीं आता......( वानस्पतिक रूप से चम्पा के फूलों पर भंवरा नहीं आता और इनमे नैसर्गिक परागण होता है) मै अक्सर अपनी एक मित्र को छेड़ा करता था कमोबेश रोज.......एक दिन उज्जैन के जिला शिक्षा केन्द्र में सुबह की बात होगी मैंने अपनी मित्र को फ़िर यही कहा.चम्पा तुझमे तीन गुण.............. तो एक शिक्षक महाशय से रहा नहीं गया और बोले कि क्या आप जानते है कि ऐसा क्यों है ? मैंने और मेरी मित्र ने कहा कि नहीं तो वे बोले......... चम्पा वरणी राधिका, भ्रमर कृष्ण का दास  यही कारण अवगुण भया,  भ्रमर ना आवें पास.    यह अदभुत उत्तर था दिमाग एकदम से सन्न रह गया मैंने आकर शिवानी जी को एक पत्र लिखा और कहा कि हमारे मालवे में इसका यह उत्तर है. शिवानी जी का पोस्ट कार्ड आया कि "'संदीप, जिस सवाल का मै सालों से उत्तर खोज रही थी व...