"कल से निराश दिख रहे, क्या हुआ" - अभी लाइवा मिल गया, दूध लेने जा रहा था
"आपने समाचार नहीं सुना, मेरा नाम नहीं था किसी भी लिस्ट में, पद्मश्री से पद्मभूषण तक की" - आवाज जैसे किसी गुफा से आ रही थी
"पर तुमने तो राखी, दिवाली, होली, ईद, क्रिसमस, गुरू पर्व, कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, से लेकर सबके जन्मदिन पर बधाई वाले पोस्टर लगाए थे अपनी कविताओं की दो सौ बारह किताबों के मुख पृष्ठों के साथ" फिर भी कुछ ना मिला - "और तो और कलेक्टर, पटवारी और सफाई कर्मचारी तक के फोटो पर हैप्पी जन्मदिन लिखा था, किसी ने अनुशंसा नहीं की"
"क्या ही कहूँ, अब विश्वास उठ गया है साला लेखन से और इस देश से, अब मैं जा रहा किसी द्वीप पर रहने - वही मरूंगा सुखी" - लाइवा बोला
"सुनो, अब जा ही रहे तो मेरे लिए दो लीटर दूध, एक किलो पनीर देते जाना, आज छुट्टी है तो मस्त मटर पनीर बनेगा आज तुम्हारे इस गम में और मैं तुम्हे मुहल्ले का बल्लम भूषण घोषित करता हूँ" - लाइवा को जाते देख रहा था
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संविधान भर बना रहें और लोग वास्तविक अर्थ में समता, भ्रातृत्व और स्वतंत्रता का अर्थ समझ लें यही पर्याप्त है
आजादी के अस्सी साल बाद यदि हम अभी भी अपने भाषणों में सीढ़ी के पायदान पर बैठे "अंतिम आदमी, सबसे पीछे खड़े आदमी, समाजवाद स्थापित करने और सबके साथ सबका विकास, अतिवाद और जातिवाद हटाना है, शोषण, महिला हिंसा" जैसे जुमले इस्तेमाल कर रहे हैं तो क्या मतलब है संविधान का और प्रस्तावना का, दुर्भाग्य से डाक्टर आंबेडकर ने न्याय की स्थापना की बात तो प्रस्तावना में करके आत्मार्पित करवा दी, पर अंदर के पृष्ठों पर कानून का राज लाद दिया - लिहाज़ा न्याय तो नहीं मिला किसी को, पर कानूनों की इतनी बाढ़ आ गई कि हम सब ध्वंस के मुहाने पर खड़े है, अदालतें न्याय नहीं - कानून के राज को मजबूत कर रहीं हैं और विधायिका भी कानून बना रही है - न्याय की कोई बात नहीं कर रहा है और यह दुर्भाग्य ही है
अब पढ़ाई-लिखाई और स्वास्थ्य सुविधाओं से लेकर बाकी विकास सूचकांकों पर बात करने की जरूरत नहीं है ; सुकून, शान्ति, बेरोजगारी या पर्यावरणीय चिंताओं की भी जरूरत बिल्कुल नहीं है, सबका भला करेंगे जय श्री राम, बोलो जय-जय सियाराम
77 वें गणतंत्र दिवस की बधाई
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इस सरकार ने समाज में विघटन पैदा किया और कुछ लोग अनपढ़, अयोग्य और हिंसक जाहिलो को (जातिवाद के संदर्भ में नहीं) डाक्टर, मास्टर, जज बनाने से लेकर पद्मश्री तक दिलवाना चाह रहे है
कांग्रेस के बोए बीज से भाजपा बेवकूफ बनाकर देश को धर्म में धकेल रही, यूजीसी नियम बनाकर विघटन कर रही, आरक्षण सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रहा, जिसे एक पंक्ति लिखना समझना नहीं आता - वह राजनीति या सरकारी नौकरी में आकर पूरे तंत्र को भ्रष्ट कर रहा है और बाकी तो जय श्रीराम है ही
मजे अंबानी-अदाणी ले रहे , युवा मूर्ख बन रहे, भूखे मरेंगे ससुरे और बेरोजगार ही खत्म हो जायेंगे - नारे लगाते हुए हिंदू राष्ट्र में, ये घटिया लोग हिंदू मुस्लिम करते करते अब हिंदू दलित आदिवासी भी करने लगे, सन 2014 में भी कहा था अभी फिर कहता हूँ कि ये किसी के सगे नहीं है, अपने फायदे के लिए देश का इतना सत्यानाश कर देंगे कि माँ बेटे, पति पत्नी, भाई बहन में लड़ाई करवाकर मानेंगे, दो कौड़ी की समझ नहीं और दलित आंदोलन वो चला रहे जिनके पेट भरे है, विदेश से पढ़कर आते है, अस्पतालों से लेकर विवि में बैठकर हरामखोरी कर रहे है
मोदी सरकार समाज में विघटन का काम कर रही है और यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है, अनुच्छेद 14 के तो एकदम ही खिलाफ है, इससे कुछ हासिल नहीं होगा, सरकार इसके बजाय युवाओं को नौकरी देने की बात करती तो समझ में आता, आरक्षण कोटा में ही बैकलॉग के पद 2014 से खाली पड़े हैं उसके बारे में ना दलित युवा सोच रहा है और ना पिछड़ा - जय श्री राम के नारे लगाकर धर्म की अफीम सबको पिलाई जा रही है
पूरे दलित आंदोलन का नुकसान इन दलित नेताओं और भ्रष्ट अकादमिक लोगों ने किया है कांशीराम, मायावती से लेकर अपने आसपास के टुच्चे मास्टर, डाक्टर या हैंड पंप मेकेनिक को देख लो जो खुद काम करते नहीं, सरकारी वेतन डकार रहे है और ये हरामखोर युवाओं को समाज को भड़का कर कबाड़ा कर रहें है , असली दलित आज भी बेसिक सूचनाओं या सुविधाओं से वंचित है या इन्हीं के घर में मल मूत्र साफ कर रहा है
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खुशियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे हमेशा कभी पूरी नहीं होती और गाहे-बगाहे कम पड़ जाती हैं, जबकि हमारे दुख अपने आपमें - भले एक या बहुत छोटे हो - संपूर्ण होते है और इतने भरपूर होते है कि वे एक जीवन क्या, समूची कायनात को हिलाकर रख सकते है, इसलिए खुशियों को तवज्जों मत दीजिए, दुखों से मनमिली दोस्ती कीजिए, प्यार कीजिए - जीवन खुद-ब-खुद गुलज़ार रहेगा
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प्रेम, उम्मीद, आशा, आस्था, भरोसा, विश्वास और गति सब समय के आंचल में बंधे हुए कारक है - जो
मिलकर जीवन में कही ना कही, किसी ना किसी तरह से छोटी-बड़ी बातों, घटनाओं और प्रारब्ध के कारण बन जाते है और हम ताउम्र समय के इंतजार में बैठे रहते है, देखते-देखते ही पता नहीं कब एक दिन आता है - जब हम समय के परे हो जाते हैं, समय के परे हो जाने से कुछ खत्म नहीं होता - बस समय के पहिए पर कुछ और परतें चढ़ जाती है - जिसका हिसाब भी हम समय से नहीं मांग सकते और यही सबसे दुखद बात है इस छोटी सी यात्रा की
आज माघ पूर्णिमा का चाँद देखते हुए, समय, धुरी और उस सबकी याद बेसब्री से आ रही जिसकी बात करना अब
बेमानी हो गया है
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