"कल से निराश दिख रहे, क्या हुआ" - अभी लाइवा मिल गया, दूध लेने जा रहा था "आपने समाचार नहीं सुना, मेरा नाम नहीं था किसी भी लिस्ट में, पद्मश्री से पद्मभूषण तक की" - आवाज जैसे किसी गुफा से आ रही थी "पर तुमने तो राखी, दिवाली, होली, ईद, क्रिसमस, गुरू पर्व, कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, से लेकर सबके जन्मदिन पर बधाई वाले पोस्टर लगाए थे अपनी कविताओं की दो सौ बारह किताबों के मुख पृष्ठों के साथ" फिर भी कुछ ना मिला - "और तो और कलेक्टर, पटवारी और सफाई कर्मचारी तक के फोटो पर हैप्पी जन्मदिन लिखा था, किसी ने अनुशंसा नहीं की" "क्या ही कहूँ, अब विश्वास उठ गया है साला लेखन से और इस देश से, अब मैं जा रहा किसी द्वीप पर रहने - वही मरूंगा सुखी" - लाइवा बोला "सुनो, अब जा ही रहे तो मेरे लिए दो लीटर दूध, एक किलो पनीर देते जाना, आज छुट्टी है तो मस्त मटर पनीर बनेगा आज तुम्हारे इस गम में और मैं तुम्हे मुहल्ले का बल्लम भूषण घोषित करता हूँ" - लाइवा को जाते देख रहा था #दृष्ट_कवि *** संविधान भर बना रहें और लोग वास्तविक अर्थ में समता, भ्रातृत्व और स्वतंत्रता का ...
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