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Man ko Chithti, Khari Khari and Drisht Kavi- Posts from 8 Nov to 8 Dec 2025

आज दिसंबर की आठ तारीख है, हे कवियों, कहानीकारों, धूर्त बूढ़े साहित्यकारों, संपादकों, हिंदी के ठेकेदार प्राध्यापकों, प्रकाशकों, पीएचडी के शोधार्थियों और युवा छर्रे लॉग्स - हिंदी की सन 2025 की श्रेष्ठ किताबें, रचनाओं की सूची कब शाया करोगे और अपने - अपने लोगों को अलंकृत एवं उपकृत करोगे, जल्दी करो - प्रकाशकों को माल खपाना है, 10 जनवरी से दिल्ली में मैला शुरू हो रहा है, गोडाउन का कचरा हटाना है - ताकि नया उजाला आ सकें, जल्दी करो बै, दीवाली में पांच हजार में पांच सौ नहीं बिकी, दस रूपए प्रति किताब वाला सेट नहीं बिका , अब तो प्रचार चालू करो रे
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समाज कार्य में क्या ना करें - 7
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जस्टिस मेकर्स के नाम से मेला हो रहा जयपुर में, निगेटिव नहीं हूँ पर पिछले चालीस वर्षों के अनुभव के आधार पर कह रहा कि ऐसे मेले सिर्फ और सिर्फ नौटंकी और माल खपाने, नए ग्राहक ढूंढने, फेलोशिप के अवसर खोजने और मेल मिलाप के साधन होते है, कितने ही लोगों की पोस्ट देख रहा हूँ जो एनजीओ या मीडिया का फर्जी लेबल लगाकर ज्ञानी बन रहें है, ये सब तथाकथित सामाजिक विकास के क्षेत्र से है और फेलो है, इनकी ना कानून की समझ है ना न्याय की, एक पंक्ति सही लिखना नहीं आता, जीवन का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ रूपया कमाना, अपनी निज छबि बनाना, AI का इस्तेमाल करके अंग्रेजी में अपना खुद का गुणगान गाना और संस्थागत स्तर पर अनुदान जुगाड़ना है ताकि वार्षिक टर्न ओवर बढ़ सकें और मोटे फंड्स का जुगाड़ हो सकें, सेमिनार, कार्यशाला, बैठकों की अचानक बाढ़ आ गई है
दरअसल में संस्थाओं और खासककरके सामाजिक काम करने वालों का चरित्र इधर दो दशकों में बुरी तरह से बदल गया है, समुदाय और दलित - वंचित फोकस में नहीं, बल्कि पूरा ध्येय अनुदानकर्ता यानी Grantee पर है और किस तरह से किसी भी काम के लिए फंड लेना है - यही एकमात्र उद्देश्य बच गया है और इसके लिए तमाम तरह के प्रपंच, नौटंकी, प्रचार प्रसार और प्रोपोगेंडा किए जा रहे है, इसकी वजह से दिक्कत यह नहीं कि अनुदान पाकर लोग रईस या कार्पोरेट बन रहें है, दिक्कत यह है कि गांव के युवा जो अल्पज्ञानी है या दसवीं फेल है या बारहवीं पास - इस तरह की संस्थाओं या व्यक्तियों से जुड़कर अति महत्वाकांक्षी बन गए, फेलोशिप का लॉलीपॉप पाकर असंख्य संस्थाएं बनाने में जुट गए और येन - केन प्रकार से फंड पाना उद्देश्य हो गया, और इसके साथ देश भर में पर्यटन करना शगल बन गया, इस उत्सव प्रिय देश में रोज मेले - ठेले लगे रहते है और बस घूमो - फिरो, फोटो हिंचो और मजे करो, विकास, समुदाय या विकल्प ढूंढने के अवसर गए भाड़ में, नवाचार करने को कोई तैयार नहीं, बस मेलो - ठेलो में घूमते रहो, इन्हें आप गौर से देखेंगे तो पायेंगे कि ये बस बाहर घूमने यानी सिर्फ मेलों या अवसरों की तलाश में रहते है, अच्छी भली हिंदी जानने वाले लोग अंग्रेजी पर उतर आए है वो भी AI की या गूगल ट्रांसलिटरेशन की अंग्रेजी पर, दुखद यह है कि हमारे पुराने वरिष्ठ साथी जो 50 - 75 की आयु में है - वे भी लंगड़ाते हुए व्हील चेयर पर कार्पोरेट्स के इन मेलों में शिरकत कर बेशर्मी से तस्वीरें शाया कर रहें है या बड़े - बड़े CSRs के कार्यक्रमों , जो पांच या सात सितारा होटल में हवाई यात्रा करके आयोजित है - का हिस्सा बनकर साझेदार है, मै जिन लोगों के साथ 1985-98, 2003 तक ज़मीनी काम करता रहा अफसोस - वे भी आज इस तरह के कार्यक्रमों में शिद्दत से शामिल है
बहरहाल, पलटकर देखता हूँ तो अपने जीवन के संघर्ष, काम और आंदोलनरूपी जज्बे का इतना बुरा हश्र होगा - सोचा नहीं था, एक अजीब तरह की निगेटिविटी है, पर इस सबका मतलब यह नहीं कि मैं उम्मीद और आशा छोड़ बैठा हूँ, अपने सामने बड़े हुए बच्चे जब इस तरह के प्रपंच में पड़ते है और जबरदस्त एटीट्यूड के साथ बात करके सामने आते है या जिन्हें हिंदी की एक पंक्ति लिखना नहीं आता - वे अंग्रेजी में AI जनित घटिया रिपोर्ट लिखकर फंड्स लेने के लिए "फंडर को रिझाते है" तो अफसोस होता है कि ये सड़क पर अंडा ही बेच लेते तो कम - से - कम इनपर श्रद्धा रहती पर किया क्या जाए, भेंड़चाल है और इस पाप में सब शामिल है
निजीकरण का दुख एक नहीं है, यह पूरे राष्ट्र को बर्बाद कर देता है - इंडिगो, संचार में जियो, डी मार्ट जैसे बाजार, अमेज़न, स्वेज़, ज़ोमेटो, ब्लिंकिट की स्थिति देखकर समझा जा सकता है, मै तो इंतजार में हूँ की रेलवे में कब ऐसी मजेदार और हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न होती है
बुलडोजर हमारी अस्सी साला प्रगति का द्योतक है - उप्र से शुरू हुआ अभियान अब देश भर में लाड़ला अभियान बन गया है, बिहार जैसे राज्य में भी यह सफल हो रहा है - कितनी खुशी की बात है
नोटबंदी से लेकर बाकी सब हमने अम्बानी - अदाणी को सौंप दिया - बैंक, जंगल, पानी, हवा, पेट्रोल और क्या बचा अब - पछतावा क्यों फिर
पूरा देश हिंदू मुस्लिम अयोध्या से लेकर मथुरा ज्ञानवापी में डूबा है, ना हिन्दू को रोटी चाहिए़ - ना मुस्लिम को - दोनों रोटी सेंक रहे है बजाय खाने के
जिस ट्रंप को हमने झुला झुलाया और उसकी भव्य यात्राएं निकाली, आज उसी को ठेंगा दिखाकर हम रूस से अस्सी साल पुरानी दोस्ती निभाते हुए फक्र महसूस कर रहे हैं, और यह दोस्ती शुरू नेहरू ने की थी और निभाई थी और हमारे योजना आयोग का पांच साला मॉडल वही से लिया था
गांधी हो या नेहरू सरकार के उल्टी दस्त की दवा, ये ही दो लोग है - राजघाट और नेहरू की नीतियां ही मार्गदर्शक है - बाकी आप गोडसे से मनोरंजन करके अपनी धर्मपरायण जनता को बरगलाते रहें कोई फर्क नहीं पड़ रहा
असल में हम लोग ही मूर्ख है - जो इन झांसेबाजों के चक्कर में सौ वर्षों से चढ्ढी पहनकर कमल खिला रहे है - वरना तो नंगई अपने चरम पर है, जीने के रास्ते हमने बंद किए है सड़क पर धर्म लाकर और अंधभक्ति निभाकर वरना ज्ञान से भरपुर एवं सोने की चिड़िया से भरा और बना देश यूं होता आज कंगाल, भूखा और फटेहाल
कांग्रेस से लेकर अवसरबाज सपा, तृणमूल, बसपा, वामपंथी या कोई और क्षेत्रीय दल और नीतीश जैसे टुच्चे लोग अब अपने अपने घेट्टो में है और इन्हें देश नहीं सत्ता चाहिए, कुल मिलाकर ममता, राहुल और अखिलेश में ही थोड़ा दमखम बचा है - जो सामने आकर लड़ रहे है, सड़कों पर है और विरोध कर रहे - बाकी मायावती से लेकर तमाम वामपंथी निहायत ही अवसरवादी निकले है और कायर भी
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जितना सत्यानाश होना था वह धीरे - धीरे कर ही दिया सरकार ने, चाहे यूएन में सदस्यता का मुद्दा हो, पड़ोसी से संबंध हो, टैरिफ के मुद्दे हो, G -9, ईंधन की बात हो, छबि की बात हो या दक्षिण एशिया में नेतृत्व की बात हो, रोज बाप बदलने वालों से क्या ही उम्मीद की जाए
बाकी जनता जनार्दन की जय हो, धर्म की जय और अधर्म का नाश हो, नफरत की बेल अमरबेल से ज्यादा फलती - फूलती रहें, महंगाई बढ़ती रहें, पूरे देश की हवा का भी निजीकरण हो जाए तो हम यही कहेंगे कि
आयेगा तो मोदी
अपन और अपनी पीढ़ी तो लगभग साठ की हो रही और दो - चार साल में मुक्ति मिलेगी और नुक्ती बंटेगी पर आपके बच्चे, आपके नाती - पोते और आने वाले लोगों का क्या होगा, कभी सोचा है प्रजाजन
जो लोग देश की राजधानी का प्रदूषण और जीवनदायिनी नदियों को नहीं सम्हाल पा रहे वे सौ अरब के कारोबार की संधि पर हस्ताक्षर कर रहे है , वे दुनिया की पहली आर्थिक व्यवस्था बनने की बात कर रहे है, अब हंसी भी नहीं आती मुझको और शर्म उनको आती नहीं
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जो लोग एक ही लक्ष्य के साथ जीते है - उनकी उम्र नहीं बढ़ती, यह देखाभाला अनुभव है, परन्तु वे बहुत महीन पीसने वाली मशीन भी बन जाते है - यह भी उतना ही सच है, जीवन एक ही है - लक्ष्य एक हो सकता है, परंतु यदि आपने जीवन को अनेकार्थी लक्ष्यों में नहीं लिया तो फिर आप इतिहास में जरूर अमर हो सकते है - किंतु एक अच्छे व्यक्ति के रूप में कभी किसी को याद नहीं रहेंगे, और सबको छोड़ भी दे तो आखिरी सांसों के समय निर्विकार भाव नहीं रहेंगे, सुखी मरने का अभ्यास करना जरूरी है और इसके लिए आपको विविधता में ही जीना होगा और इस मूल सिद्धांत को प्रकृति से सीख सकते है जहाँ अमीबा भी है और मनुष्य भी

#मन_को_चिठ्ठी

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जिंदगी अक्सर हमें बुरी तरह से तोड़ती है, बिखेरती है और हैदस में डालती है, लगता है कि हम अब टूट ही जाएंगे, बिखरने के बाद लगता है अब कभी खड़े नहीं हो सकेंगे - परन्तु ऐसा नहीं है , हमें उन्हीं से सीख लेनी चाहिए जो तोड़ - मरोड़कर हमें अधमरा कर छोड़ देते है, जो हमें इतना गर्त में डाल देते हैं कि ऊपर आना मुश्किल हो जाता है, ऐसे समय में हमें अपने ही भीतर से प्रकाश के उस सोते को खोजना होगा - जो हमें अंधेरों को चीरकर उजालों की ऊपरी परतों पर ले आए, उन चुनौतियों को स्वीकार करके हिम्मत जुटाना होगी कि है फिर एक भव्य स्वरूप में खड़े होकर किसी के लिए नज़ीर बन सकें, यही शायद इंसान होने की फितरत है और जवाब देने की हिमाकत भी
कुछ यूँ जोड़े अपने आपको कि फेस वैल्यू बढ़ जाए और तोड़ने वालों को पश्चाताप करने का मौका भी नसीब ना हो

#मन_को_चिठ्ठी

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एक गलत ज़िंदगी में सही कुछ नहीं होता, ना कर्म, ना फ़ल, ना प्रश्न, ना परिणाम और ना प्रारब्ध - जब सब कुछ गलत ही गलत हो जाए तो फिर ज़िन्दगी के मायने ही बदल जाते हैं
एक गलत दुनिया में कोई कभी सही नहीं कर पाएगा, या तो हम इस दुनिया और इसके रंग में रंग जायेंगे या क्या सही है - यह जानकर समाज से कट जायेंगे या बिछड़ जायेंगे

कभी लगता है ऐसे समय में जिंदा रहकर भी क्या करना जब जीने की वजह छिन कर सही - गलत के खांचों में जीवन बांट दिया जाए  

#मन_को_चिठ्ठी

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उसके चेहरे पर उम्मीदों की धुंधली सी छाप थी - जो उस लोहे के चद्दर से आ रही धूप के छिद्रों से छनकर आ रही रोशनी की वजह से चमक रही थी, डॉक्टर्स पर उसे सहसा विश्वास हो चला था जिन्होंने उसे आश्वस्त किया था कि चिंता मत करो सब ठीक होगा, पर स्थिति कुछ और ही थी, जीवन भर एकछत्र राज करने वाला व्यक्ति आज हताशा में एकालाप कर रहा था, सिवाय पछतावों और अपराध बोध के उसके पास कुछ नहीं था, निहायत कमजोर और लाचार होता, हर जगह से पस्त होता आदमी कितना मजबूर हो जाता है कि उसका नजरिया और लहजा ही बदल जाता है - जीवन और लोगों के प्रति
वह धीरे - धीरे क्षीण हो गया था, शरीर ने उसे बदहाल कर दिया था और उसकी बीमारियां उसके संग - साथ यूं एक सार हो गई थी कि उसके अलावा उसके व्यक्तित्व को देखना ही मुश्किल था, बीमारियों की जांच रिपोर्ट, अस्पतालों के पर्चे, दवाईयों के बिल, एक्स रे, सोनोग्राफी, एंडोस्कोपी के काले कागज जिनपर अजीब तरह के धब्बे लगे हुए थे - जिन्हें वह बार - बार देखता और अपने शरीर को कि कहां - क्या ठीक हो रहा है
देशभर के चुनिंदा अस्पतालों में घूमकर और जेब का सारा रूपया बर्बाद करके आखिर में वह स्थानीय सरकारी अस्पताल के बरामदे में दिनभर बैठा रहता और बड़े डाक्टर का इंतजार करता, जो उसे जीवन की उम्मीदों भरी खान में ले जाता और दूर से अंधेरे की सुरंग के उस ओर रोशनी दिखाने का जतन करता, वह डाक्टर भी कम नहीं था अपने जीवन में आने वाले किसी भी मरीज की चवन्नी नहीं छोड़ी थी, जब तक कंगाल ना कर दिया बड़े समूह को तब तक वह लूटता रहा, फिर किसी बाबा के चक्कर में आकर पुण्य - पाप के फेर में पड़ा और उसे लगा कि इस खोए और खत्म व्यक्ति को उम्मीद दिखाकर वह अपना अगला जन्म सुधार सकता है
जीवन हताशा, असफलता और नैराश्य में ही सम्पूर्ण होता है - यह बात अब मै भी समझ गया हूँ और लगता है कि किसी की उम्मीदों को पतवार थमाकर यदि एक हताश व्यक्ति को भवसागर में धक्का दे दें तो इससे बड़ा पुण्य नहीं कोई
उम्मीद का होना जीवन का होना है, चाहे कितने भी निराश हो और सब कुछ खत्म हो गया हो पर एक खिड़की, एक दरवाजा हमेशा खुला रहता है और उस तक पहुंचने के लिए हमें कोशिश करते ही रहना चाहिए
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हम सबके जीवन में एक ठहराव बहुत जरूरी है - ताकि पलटकर उन लम्हों को देख सकें जो सुख - दुख और स्मृतियों का पिटारा अपने साथ लिए हुए है, किसी छत पर बैठकर गुनगुनी धूप में पांव पसारकर इन सबको तराशना, सहलाना और हर सुख - दुख से प्यार से पूछना कि आखिर वो क्या समय था - जब तुम जीवन में आएं, एक सबक सीखाकर चले गए और अब फिर कब आओगे, उन स्मृतियों को आहिस्ते से पुचकारना जरूरी है और छांटते - बीनते हुए सुखद स्मृतियों की शिदोरी एक बार फिर से भर ली जाए
जीवन के उत्तरार्ध में उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी बेहद जरूरी है - जिन्होंने ये सब तोहफे दिए कि अगाध स्नेह के साथ हम इन्हें किसी गुनगुनी धूप में याद कर रहे हैं, मुआफ़ कर दीजिए सबको और अपने से लगन लगाइए, एक ही जीवन है और आपको ही जीना - मरना है, इसमें कोई संग - साथ नहीं देता, बस इसलिए सबकी परवाह छोड़कर भरपूर जी लीजिए, रिस जाने दीजिए अपने - आपको और सूखने दीजिए भावों को, जब सब खत्म होगा तो सब कुछ बचा रहेगा
"कोई फरियाद किसी दिल में दबी हो जैसे " - फिल्म तुम बिन का यह गीत सुनते हुए दिन बीताएंगे तो बहुत कुछ रिसेगा और रीत भी जायेगा पर शाम को ढलते सूरज के वक्त आपके पास एक पूरी रात होगी फिर से किसी फीनिक्स की भांति जी उठने के लिए
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अशोक वाजपेई ने कहा है कि रजा के कार्यक्रम में आने वाले 90% युवा कम पढ़े - लिखे हैं और वह ठीक से अभ्यास करके नहीं आते, इसको लेकर रजा में नियमित रूप से जाने वाले युवाओं में एक बेचैनी है और वे अपने-अपने तरीके से अपनी मेहनत पढ़ाई - लिखाई और श्रम को जस्टिफाई कर रहे हैं - जो कि उचित भी है और सही भी
मुझे लगता है क्यों ना सारे लोग मिलकर अशोक जी से आग्रह करें कि सामान्यीकरण के बजाय नामजद बात करें, अपनी बात खोलें, और स्पष्ट करें कि यह कहने की मंशा क्या है, बार - बार युवा लेखकों का रिपीट होना संदेह को जन्म देता है, यह सर्वविदित है कि कौन इसमें नियमित जा रहा है, वहां क्या - क्या नौटंकी होती है, उन्हीं में से कोई एक फर्जी आईडी बनाकर फोटो पोस्ट करता है कार्यक्रम की और बताता है कि रात कौन किसके कमरे में आया गया, मंडला से लेकर दिल्ली तक हुए आयोजनों की तो यही दास्तां है
बल्कि मेरा तो कहना है कि इन युवाओं को अब विरोध करना चाहिए कि इस तरह के वक्तव्य, उनकी समझ पर उठने वाले प्रश्न, मेहनत पर शंका बेमानी है, और अशोक जी को अरूण कमल से हुई बातचीत [जो तद्भव में छपी है] को स्पष्ट तरीके से बताना चाहिए, ये युवा जो पढ़ा रहे है, व्यवसाय में है, प्रकाशन में है या कुछ नहीं नही भी कर रहे तो संभावनाओं से भरे तो है, आपने एक सौ पचास करोड़ के देश में बीस प्रतिशत युवाओं में से मात्र दो सौ को बुलाया और एक सौ अस्सी को खारिज कर दिया, फतवा देने लगे, आप साहित्य का काम कर रहे या देवबंद में शिफ्ट हो गए है, अशोक जी आप यूपीएससी के किसी चयन बोर्ड में बैठे है या साहित्य के मैदान में, रज़ा और कृष्णा सोबती जी की संपत्ति पर बैठकर आप न्यायमूर्ति बन बैठे है स्वयंभू शायद, एकदम हिटलरी अंदाज में है आजकल
बहरहाल, अपन ना कभी गए ना जायेंगे पर यह सब बहुत घातक है
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गंभीर किस्म के वरिष्ठ कलाकारों और साहित्यकारों को छोड़ दें, जो कोई अपेक्षा नहीं करते - परन्तु छूटभैय्या और चलताऊ किस्म के कलाकार या लेखक हो या उनके खानदान के वारिस यानि पल रहे पिल्ले और छर्रे चौबीस घंटों इसके उसके साथ, यहां - वहां, ताजमहल या किसी मंदिर - मस्जिद या गुरुद्वारे के सामने खड़े रहकर या कुत्ते - बिल्ली के साथ फोटू हींचकर पेलते रहेंगे और फेसबुक से लेकर इंस्टाग्राम तक गदर मचाते रहेंगे और उस पर से तुर्रा यह कि हम लाइक करें , शेयर करें, वाहवाही करें और इनका एटीट्यूड इतना कि जन्मदिन की बधाई आप सालों तक निशुल्क देते रहो, धन्यवाद लिखना बाप - माँ ने सिखाया नहीं
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जिंदगी अक्सर हमें बुरी तरह से तोड़ती है, बिखेरती है और हैदस में डालती है, लगता है कि हम अब टूट ही जाएंगे, बिखरने के बाद लगता है अब कभी खड़े नहीं हो सकेंगे - परन्तु ऐसा नहीं है , हमें उन्हीं से सीख लेनी चाहिए जो तोड़ - मरोड़कर हमें अधमरा कर छोड़ देते है, जो हमें इतना गर्त में डाल देते हैं कि ऊपर आना मुश्किल हो जाता है, ऐसे समय में हमें अपने ही भीतर से प्रकाश के उस सोते को खोजना होगा - जो हमें अंधेरों को चीरकर उजालों की ऊपरी परतों पर ले आए, उन चुनौतियों को स्वीकार करके हिम्मत जुटाना होगी कि है फिर एक भव्य स्वरूप में खड़े होकर किसी के लिए नज़ीर बन सकें, यही शायद इंसान होने की फितरत है और जवाब देने की हिमाकत भी
कुछ यूँ जोड़े अपने आपको कि फेस वैल्यू बढ़ जाए और तोड़ने वालों को पश्चाताप करने का मौका भी नसीब ना हो
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हिंदी हो या कोई अन्य भाषा हर जगह अनाचार, व्याभिचार और अनैतिकता है साहित्य के नाम पर, पर हमारी बेचारी हिंदी का साहित्य जगत भयानक आत्ममुग्ध, कुंठित और गैंगबाज है, और इसके लेखकों को न जाने किस बात का गुरूर है - जो सर पर बेवजह उठाए घूमते रहते है, अधिकांश मास्टरी, प्राध्यापकीय व्यवसाय या भड़ैती करके विशुद्ध व्यवसाय करने वाले लोग है, छपास रोग से ग्रसित ये लोग जातिवाद और धर्म, रूपए, पूंजी, फर्जी विचारधाराओं और वर्ग विशेष के घेट्टो में रहकर कुटिलता से षड्यंत्र रचते है और बेहद संकरे दायरों में रहकर प्रपंचों में पड़े रहते है
पुरस्कार से लेकर अड्डेबाजी और अय्याशी के नित नए उपक्रम ढूंढने में सेटिंगबाज ये लोग महाधूर्त होते है, बस बचकर रहिए, यही समय की मांग है, न इनसे दोस्ती रखिए, न किताब लीजिए, न पढ़िए इन्हें और न कोई संबंध रखने की जरूरत है
तो फिर क्या पढ़ें, क्लासिक - बस और कुछ नहीं, कम से कम समकालीन और चालीस से पचास तक के या इससे नीचे की उम्र वालों को पढ़ना मतलब जीवन बर्बाद करना है, आधे समय तो इनके छर्रे, घर वाले, कुत्ते, बिल्ली, घर वालियां या मुहल्ले खानदान के गोलू - भोलू - मोलू - कालू या मोती ही झंडे लेकर खड़े रहते है, चम्पादकों की चरण वंदना करते हुए ये टॉमी और चेरीज कुछ भी कर लेंगे
बहरहाल, ठंड चालू हो गई है, सरसों का तेल और बेबी ऑयल लेकर ये लोग खड़े है मैदान में - बस आप मुहल्ले की दरी पर बैठकर कोई उत्सव करवाइए, ये चले आयेंगे मसाज करने और अमूल का मक्खन लेकर आपको लगा भी देंगे, बस इन्हें सूचना भर हो जाए - झुंड में चले आयेंगे सूंघते हुए सियार कही के
ईश्वर शक्ति दें, सद्बुद्धि दें और सबका नहीं तो कम से कम हिंदी का कल्याण करें
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ठीक हो फिल्म है, असल में कुछ ज्यादा हीओवर रेट कर दिया, पोस्ट कोविड बनी फिल्म है - जिसमें जाति का कोण जबरन उछाला जा रह है, मुझे नहीं लगता कि निर्देशक की कोई ऐसी मंशा रही होगी, और किसी कॉलम में जाति की जानकारी देना छुपाना - कोई इतना बड़ा मुद्दा नहीं कि फिल्म उसी के इर्द-गिर्द घूमती रहें, पोस्ट कोविड भारत और दुनिया को हम सबने प्रत्यक्ष रूप से देखा और भुगता है, पलायन की त्रासदी से भी वाकिफ है हम सब, और उसी घटना का नाट्य रूपांतर कोई इतनी बड़ी बात भी नहीं, ये दोनों तो युवा थे पर हमने बुजुर्गों को किशोर लड़कियों को, महिलाओं और बच्चों को इस विभीषिका के दौरान हजारों किमी दूर पैदल चलते या सायकिल चलाते देखा है
ज्यादा सेंसेशन रचने से फिल्म हिट हो जाए - यह जरूरी नहीं, एक बेहद सामान्य सी फिल्म है और इसे जाति, संघर्ष, लड़ाई, वर्ग, वर्चस्व और बदलाव के नजरिए से रखना या देखना - मुझे व्यक्तिगत रूप से सही नहीं लगता, कल से जो श्रम कानून और नये कोड्स सरकार ने लागू किए है देशभर में उसके परिणाम इससे ज्यादा घातक होंगे तब क्या, उसमें भी जात बिरादरी और वर्ग चेतना खोजेंगे
दोनों युवाओं का अभिनय बढ़िया है और कही कही संवाद उम्दा है, बाकी तो एक * की रैंकिंग वाली फिल्म है
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हिंदी हो या कोई अन्य भाषा हर जगह अनाचार, व्याभिचार और अनैतिकता है साहित्य के नाम पर, पर हमारी बेचारी हिंदी का साहित्य जगत भयानक आत्ममुग्ध, कुंठित और गैंगबाज है, और इसके लेखकों को न जाने किस बात का गुरूर है - जो सर पर बेवजह उठाए घूमते रहते है, अधिकांश मास्टरी, प्राध्यापकीय व्यवसाय या भड़ैती करके विशुद्ध व्यवसाय करने वाले लोग है, छपास रोग से ग्रसित ये लोग जातिवाद और धर्म, रूपए, पूंजी, फर्जी विचारधाराओं और वर्ग विशेष के घेट्टो में रहकर कुटिलता से षड्यंत्र रचते है और बेहद संकरे दायरों में रहकर प्रपंचों में पड़े रहते है
पुरस्कार से लेकर अड्डेबाजी और अय्याशी के नित नए उपक्रम ढूंढने में सेटिंगबाज ये लोग महाधूर्त होते है, बस बचकर रहिए, यही समय की मांग है, न इनसे दोस्ती रखिए, न किताब लीजिए, न पढ़िए इन्हें और न कोई संबंध रखने की जरूरत है
तो फिर क्या पढ़ें, क्लासिक - बस और कुछ नहीं, कम से कम समकालीन और चालीस से पचास तक के या इससे नीचे की उम्र वालों को पढ़ना मतलब जीवन बर्बाद करना है, आधे समय तो इनके छर्रे, घर वाले, कुत्ते, बिल्ली, घर वालियां या मुहल्ले खानदान के गोलू - भोलू - मोलू - कालू या मोती ही झंडे लेकर खड़े रहते है, चम्पादकों की चरण वंदना करते हुए ये टॉमी और चेरीज कुछ भी कर लेंगे
बहरहाल, ठंड चालू हो गई है, सरसों का तेल और बेबी ऑयल लेकर ये लोग खड़े है मैदान में - बस आप मुहल्ले की दरी पर बैठकर कोई उत्सव करवाइए, ये चले आयेंगे मसाज करने और अमूल का मक्खन लेकर आपको लगा भी देंगे, बस इन्हें सूचना भर हो जाए - झुंड में चले आयेंगे सूंघते हुए सियार कही के
ईश्वर शक्ति दें, सद्बुद्धि दें और सबका नहीं तो कम से कम हिंदी का कल्याण करें
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मै उसके द्वार तक गया था और देखा कि मैं पहले से ही वहां था, मै वहां पहले से ही मौजूद हूँ, यह जानकर मै लौटने लगा पर मेरे लौटने के पहले मै चल दिया था, और इस तरह से मुझमें और मेरे में ही द्वंद्व हो गया और बाकी तो सब मायावी था - किसी स्वप्न की भांति मेरे भीतर का जो था - उसने मुझे कहा कि तुम क्यों चले आए मेरे संग - साथ, जिसके पास हमें जाना था वह तो पहले से ही कही और है और किसी और दुनिया में, बस दिखने - दिखाने के लिए वह यहां है इस संसार में, उस दरवाजे की तरह - जो दोनों तरफ खुलता है और यह सिर्फ देखने और महसूसने पर ही निर्भर करता है कि दरवाजा खुला है, बंद है और अंत में यह भी कि हम किस ओर खड़े है और कैसे देख रहे है
सुबह के ख्वाब अब पूरे होते नजर आ रहे है , हम जल्दी ही एक साथ एक दरवाजे पर खड़े होंगे और ठीक उसे ही देखेंगे - जिसे देखने की उत्कंठ इच्छा में जीवन भर प्रतीक्षारत रहें और दरवाजे इसी ओर खुलते नजर आएंगे - अपनी पूरी रोशनी और आभा के साथ
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कैदी
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ओ. हेनरी
जीवन के सुख-दुख का प्रतिबिंब मनुष्य के मुखड़े पर सदैव तैरता रहता है, लेकिन उसे ढूँढ़ निकालने की दृष्टि केवल चित्रकार के पास होती है। वह भी एक चित्रकार था। भावना और वास्वविकता का एक अद्भुत सामंजस्य होता था उसके बनाए चित्रों में।
एक बार उसके मन में आया कि ईसा मसीह का चित्र बनाया जाए। सोचते-सोचते एक नया प्रसंग उभर आया। उसके मस्तिष्क में छोटे-से ईसा को एक शैतान हंटर से मार रहा है, लेकिन न जाने क्यों ईसा का चित्र बन ही नहीं रहा था। चित्रकार की आँखों में ईसा की जो मूर्ति बनी थी, उसका मानव रूप में दर्शन दुर्लभ ही था। बहुत खोजा, मगर वैसा तेजस्वी मुखड़ा उसे कहीं नहीं मिला।
एक दिन उद्यान में टहलते समय उसकी दृष्टि अनाथालय के आठ वर्ष के बालक पर पड़ी। बहुत भोला था। ठीक ईसा की तरह, सुंदर और निष्पाप। उसने बालक को गोद में उठा लिया और शिक्षक से आदेश लेकर अपने स्टूडियो में ले आया। अपूर्व उत्साह से उसने कुछ ही मिनटों में चित्र बना डाला। चित्र पूरा कर वह बालक को अनाथालय पहुँचा आया।
अब ईसा के साथ शैतान का चित्र बनाने की समस्या उठ खड़ी हुई। वह एक क्रूर चेहरे की खोज में निकल पड़ा। दिन की कौन कहे, महीनों बीत गए। शराबखानों, वेश्याओं के मोहल्ले, गुंडों के अड्डों की खाक छानी, मगर उसको शैतान कहीं न मिला। चौदह वर्ष पूर्व बनाया गया चित्र अभी तक अधूरा पड़ा हुआ था। अचानक एक दिन जेल से निकलते एक कैदी से उसकी भेंट हुई। साँवला रंग, बढ़े हुए केश, दाढ़ी और विकट हँसी। चित्रकार खुशी से उछल पड़ा। दो बोतल शराब के बदले कैदी को चित्र बन जाने तक रुकने के लिए राजी कर लिया।
बड़ी लगन से उसने अपना अधूरा चित्र पूरा किया। ईसा को हंटर से मारने वाले शैतान का उसने हूबहू चित्र उतार लिया।
'महाशय जरा मैं भी चित्र देखूँ।' कैदी बोला। चित्र देखते ही उसके माथे पर पसीने की बूँदे उभर आईं। वह हकलाते हुए बोला, 'क्षमा कीजिए। आपने मुझे अभी तक पहचाना नहीं। मैं ही आपका ईसा मसीह हूँ। चौदह वर्ष पूर्व आप मुझे अनाथालय से अपने स्टूडियो में लाए थे। मुझे देखकर ही आपने ईसा का चित्र बनाया था।'
सुनकर कलाकार हतप्रभ रह गया।
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समय का पहिया बड़ा क्रूर है और यह कहानी हम सबके ईसा से शैतान बनने की कहानी है
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इस पार मै हूँ और उस पार तुम और अब सब तोड़कर छोड़कर लौटना चाहता हूँ - वही जहां दूर सूरज अस्त हो चुका है और अंधेरे का साम्राज्य घिरने लगा है चहुंओर, ये पानी भी शांत हो गया है, किनारे बैठे मुसाफिर अपने पाँव गंगा में डालकर बैठ गए है, थक कर चूर हो गए है कि बस अब और नहीं, और ये जो सबको बांध रहे है तार - खंभे, वे भी सदियों से खड़े खड़े बेबस है - क्योंकि उनके पास विलोप होने के विकल्प नहीं - बस अब सब खत्म हो जाना चाहिए
मन बेचैनियों की अंतहीन दास्तां है और हर सफ़े का संघर्ष एक आदिम त्रासदी
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देवास के एमजी रोड पर अतिक्रमण हटाने और चौड़ीकरण के लिए एक हफ़्ते से मुहिम चल रही है, सारी दुकानों को जमींदोज कर दिया गया है, बाजार ध्वस्त हो गया है, अगले चार - छह माह तो मलबा उठाने में लगेंगे और बाद में नगर निगम और दुकानदारों को दुकानें ठीक करने में छह माह न्यूनतम, छह माह से एक साल तक सब बर्बाद रहेगा,दो हजार छब्बीस नुकसान का वर्ष रहेगा, जन प्रतिनिधियों को शर्म आना चाहिए
स्थानीय दलाल मीडिया मजे लेकर वीडियो डाल रहा है, दोनों पार्टियों और विधायक एवं सांसद से रूपया खाने वाले दल्ले मीडिया का कैमरा उठाकर घूम रहे है, निगम में पहली बार एक कमिश्नर के रूप में दबंग आयएएस आया है - "दलीप कुमार" जिसे नवरात्रि के दौरान होर्डिंग एवं बैनरबाज प्रेमी घटिया भाजपाइयों ने खूब परेशान किया था और अब वह चुन - चुनकर मजे ले रहा है, व्यापारी रो रहे है, घर टूट गए है, रहने - खाना बनाने की जगह नहीं बची है, महिलाएं - बच्चे - बुजुर्ग बाहर खड़े है, सारी गृहस्थी बर्बाद हो गई है
इस पूरे वाकए में सच यह है कि लोग अति कर देते है, अतिक्रमण करके इतना कब्जा कर लेते है कि चलना मुश्किल हो जाता है, प्रशासन का यह कदम सराहनीय है, युवा, साहसी और हिम्मतवाले मर्द कलेक्टर, एसपी और कमिश्नर की तिकड़ी ने देवास के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण काम किया है और सारे नेताओं की अकड़ को जूते के नीचे कुचलकर रख दिया है, अब इन नेताओं को इनकी असली औकात भी बता दें तो बेहतर होगा, भले किसी का ट्रांसफर हो जाए पर इन नेताओं की हेकड़ी निकालना जरूरी है
इस समय लगभग चालीस वर्षों से जनता के साथ फर्जी सहानुभूति निभाने वाले सामंती घराने के लोग और देवास के विकास पर मौन साधने वाले विधायक का क्या रूख है - नहीं समझ आया, इन्हीं व्यापारियों ने बहुत चंदा देकर और स्वागत द्वार लगाकर इस विधायक और सांसद, महापौर और पार्षदों को चढ़ाया और बार - बार जिताया, पूर्व सिविल जज एवं युवा सांसद कहां है और बाकी भाजपा के नेता जिनके होर्डिंग - बैनर लगे रहते है - गोलू, मोलू, शेरू, कालू - सब गायब है, कांग्रेस के लोग घड़ियाली मगरमच्छ की तरह से मलबे में पड़ी बाजार की लाश पर हंसी - ठिठोली करते नकली सहानुभूति जता रहे हैं - जिन्हें कोई घास नहीं डाल रहा
अब समय आ गया है कि देवास जिले से भाजपा के दोगले शासन को अगले चुनावों में उखाड़कर फेंका जाए - वरना ये लोग जनता को भी बर्बाद कर देंगे, शहर के विकास का कोई नक्शा नहीं, समझ नहीं बस गुलाम बनाए रखो सबको और गुलाब जामुन खाते रहो
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SIR के तनाव, जल्दी और हड़बड़ाहट को देखते हुए लगता है कि सरकार भारत में 2027 में मध्यावधि चुनाव करवा रही है

दो कारण है : - 

एक तो यह कि मोदी का जादू खत्म हो रहा है और अलग अलग राज्यों से बगावत हो रही है, युवाओं में अब जागरूकता बढ़ रही है, पंद्रह वर्षों में गरीबी कुल मिलाकर पांच किलो मासिक फ्री राशन पर आकर टिक गई है - जिसे दलित, वंचित भी समझ रहे हैं, वैश्विक स्तर पर भी भारत की छबि खराब हो रही है, मानव सूचकांक में भारत की नीचे जाती स्थिति, डालर की साख, और दुनिया के शीर्ष देशों से बिगड़ते रिश्ते और सबसे ज्यादा मोदी को आंतरिक रूप से पार्टी में विरोध  सहना पड़ रहा है, मोदी के हाथ आज जिस अंदाज में अयोध्या में कांप रहे थे या नाटक भी कर रहे थे - वह दर्शाता है कि स्वास्थ्य भी अब नाजुक है मोदी का और एक आदमी से इतनी उम्र ने उम्मीद भी नहीं करना चाहिए़ - मुझे तो बल्कि अब दया आती है मोदी पर 

दूसरा, मोदी की उम्र और अब हाथों से फिसलते प्रबंधन, राज्यों की बागडोर और मीडिया की स्थिति को देखते हुए सत्ता की बागडोर किसी और को सौंपना चाहिए़ - क्योंकि यही समय है जब भाजपा पूर्ण रूप से अपनी सशक्त उपस्थिति संसद में जमा करके संविधान  बदलने और देश को विशेष रूप से ढाल सकती है क्योंकि 2029 तक क्षेत्रीय दल और बाकी लोग तब तक बहुत आगे बढ़ जायेंगे

इसलिए यह सर्वेक्षण पूर्ण होते ही सरकार लोकसभा के चुनाव ना करवा दें तो कहना

[ नोट - स्वस्थ बहस देश हित में स्वीकार्य है, मूर्खतापूर्ण कमेंट्स को डिलीट करके ब्लॉक किया जायेगा ]

#खरी_खरी
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अयोध्या में श्रीराम मंदिर पर आखिर आज ध्वज लहरा गया, तीन कार्यकाल लग गए मोदी सरकार को यह महती काम करने में, अदालत से लेकर जमीन और निर्माण और आज ध्वज फहराना कितना मुश्किल सफर रहा होगा, यह सोचकर ही काँप जाता हूँ मै तो, मेरे से तो अपने कमरे का पंखा ही साफ नहीं होता  

सोचिए जिस देश में नब्बे प्रतिशत युवा बेरोजगार, अस्सी करोड़ पांच किलो फ्री राशन पर पलने वाले निकम्मे हरामखोर निर्भर हो, असमानता, जातिवाद, वर्गवाद, आरक्षण, पिछड़ापन, भेदभाव, गरीबी से लेकर तमाम मानकों में विश्व स्तर पर सबसे पिछड़े, महिला हिंसा में सबसे आगे, कुपोषण से लेकर जलवायु परिवर्तन में सबसे आगे और घुसपैठ में दुनियाभर के लोग घुस आते है हमारे देश में, पच्चीस करोड़ आतंकवादी, सात राज्यों में नक्सलवादी, बेचारे अंबानी अदाणी को समाज सेवा और देशसेवा के लिए जमीन देने में अदालतों का घटिया रुख, नर्मदा बचाओ आंदोलन, अर्बन नक्सलों का देश से खात्मा, राहुल गांधी को नेस्तानाबूद करना और सबसे ज्यादा साले पढ़े लिखें बुद्धिजीवी और मोदी विरोध में लगे चिंतनीय देश में बेचारे मोदी सरकार को कितना काम करना पड़ेगा, इसलिए कह रहे है कि 2050 तक जीताते रहिए, कम - से - कम दो तीन काम और कर पाएंगे - तभी न हम बनेंगे विश्व गुरू और अभी नोबल पुरस्कार भी मिलना है, वोट देंगे तभी ना मिलेगा - भले SIR  में नाम कट जाए 

बहरहाल,जय श्रीराम रहेगा हिंदू राष्ट्र में सबको, मोदी सरकार का वैश्विक स्तर पर अभिनंदन किया जाए 

जय जय सियाराम
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बहुत परेशान था वह - कारण सिर्फ इतना था कि एक सभ्य समाज में पढ़े-लिखे लोगों के बीच में वह भी पढ़ा लिखा था, बाकायदा उसने मेडिसिन में स्नातक और परास्नातक पास किया था - परंतु उसे रहना इस ग्रामीण परिवेश में था, वहीं पर उसकी प्रतिस्पर्धा उन अंगूठा टेक डॉक्टर और नीम हकीमों से थी - जिन्हें प्रचलित भाषा में बंगाली डॉक्टर कहा जाता है
एक बात उसने आखिर में बड़ी अच्छी कही थी, उसने कहा था कि इलाज करना, झाड़ फूंक करना, लिखना - पढ़ना, नीति बनाना या राजकाज करना तुलनात्मक रूप से बहुत सरल है, परंतु किसी बोर्ड या विश्वविद्यालय में नियमित रूप से मेहनत करके धैर्य के साथ पढ़ना - लिखना समझना और वहां की गतिविधियों को गुनना और बुनना बहुत मुश्किल है - क्योंकि यह सिर्फ एक बार नहीं होती, बल्कि एक लंबे समय तक सतत चलने वाली प्रक्रिया है और इसके लिए जो श्रम, मेहनत, दृष्टि और इच्छा शक्ति चाहिए वह बिरलों में होती है, इसलिए जब भी योग्यता की बात होती है या कहीं किसी जगह पर कौशल और दक्षता से परिपूर्ण व्यक्ति की जरूरत होती है तो बंगाली डॉक्टर को नहीं - बल्कि एक पढ़े-लिखे डिग्री वाले व्यक्ति को प्राथमिकता दी जाती है
"इस समाज में कितना भी कुछ कर लो, पर जब तक समझदार और पढ़े - लिखे लोग हैं, डिग्री का महत्व बना रहेगा, कितनी भी गाली दे दो डिग्री धारियों को क्योंकि अवसर ना मिल पाने का अपराध बोध तो सालेगा ही, यह बहुत भीतर धंसी हुई कुंठा और जलन है"
उसकी यह बात सुनकर मुझे थोड़ा अचरज लगा, पर अब लगता है कि वह एकदम सही बोल रहा था, हम लोग बेलूर मठ से दक्षिणेश्वर की तरफ नाव से जा रहे थे और जब मैंने उसकी ओर देखा तो उसका चेहरा डूबते सूरज की लालिमा से चमक रहा था - शिक्षा, डिग्री, कौशल और दक्षताओं का तेज झलक रहा था और लग रहा था कि कोई भले ही कितना ही कुछ भी करके कमा - धमा ले, परंतु पढ़े-लिखे व्यक्ति और डिग्रीधारी की बराबरी कभी नहीं कर सकेगा
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जूलिया रॉबर्ट्स ने एक बार कहा था, "जब लोग आपको छोड़कर चले जाएं, तो उन्हें जाने दीजिए - आपकी तक़दीर कभी भी उन लोगों से जुड़ी नहीं होती जो आपको छोड़ते हैं, और इसका मतलब यह नहीं है कि वे बुरे लोग हैं, इसका मतलब है कि उनका आपके जीवन में एक भूमिका थी जो अब समाप्त हो गई है"- ये शब्द हमें एक सच्चाई याद दिलाते हैं, जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं - कि हर व्यक्ति जो हमारे जीवन में आता है, वह हमेशा के लिए नहीं रहता
लोग हमारे जीवन में विभिन्न कारणों से आते हैं, हमें कुछ सिखाने, अनुभव साझा करने या किसी खास दौर में हमारा साथ देने के लिए, लेकिन जब वे जाते हैं, तो यह समझना महत्वपूर्ण है कि उनकी भूमिका हमारे सफर में पूरी हो गई है, और अब हमारे रास्ते अलग हो गए हैं
जिन लोगों को हमें जाने देना होता है, उनके साथ जुड़ा रहना हमारी वृद्धि में रुकावट डालता है और हमें अपनी पूरी तक़दीर में आगे बढ़ने से रोकता है
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और ये कलकत्ते की एक भीगी हुई सी बेहद संगीन और शांत रात है, किसी बहुत अपने और करीबी के साथ बैठकर यह चाय पीते हुए सोच रहा हूँ कि यह मुलाकात अब आखिरी मुलाकात है और इसके बाद ना बात होगी, ना मुलाकात और ना कोई महीन तंतु हमारे बीच किसी रेशम सी डोर का बचा रहेगा, कैसे सब टूट जाता है आहिस्ते से पता ही नहीं चलता, सब उन्नीस सौ बयानवें और आज दो हजार पच्चीस, उफ्फ
एक चाय, एक शाम और एक भरे पूरे भीड़ भरे शहर से विदाई सिर्फ भौतिक या दैहिक विदाई नहीं - बल्कि अब सारे संबंधों और नैतिक जिम्मेदारियों से भी विदाई है
कलकत्ता सिर्फ अब ट्राम या काले जादू के शहर की बात नहीं, बल्कि अब यह एक स्थाई दंश है - जो ताउम्र चुभता रहेगा, मै यह कप और बशी की दोनों जोड़ियों को अपने साथ ले जाकर घर के अपने लावारिस संग्रह में रखने की सोच रहा हूँ - ताकि रोज देखूं , रोज इस शहर को एक टींस के साथ याद करूं और फिर एक दिन जब सच में विदा होने लगूं तो ये चीनी मिट्टी की जोड़ियां मेरे सिरहाने बांस की काठी पर रखी रहें और अपनी घास एवं लकड़ी के उड़नखटोले पर अपनी ही मिट्टी के साथ भी मिल जाए, एक सार हो जाए
कलकत्ता तुम्हारा नाम बदल गया, कोलकाता हो गया, पर स्मृतियां तो अक्षुण्ण है और उन्हें कौन, कब, कैसे और क्यों बदल सकता है
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जीवन अपने आप में एक दुर्गम एवं दुरूह यात्रा है - जो स्मृतियों को भरने का जोखिम भी लेता है और अपने विभिन्न आकार - प्रकार से सीख भी देता है, हम जब भी एक नए सफर की ओर एक कदम आगे बढ़ाते है - हम पाते है कि अंदर की ऊर्जा इकट्ठी होकर यात्रा की स्मृतियों को मधुर, रोचक और शैक्षिक बनाने में लग जाती है, सीखना और यात्रा एक दूसरे के पूरक है, अभागे है वो लोग जो एक कदम भी आगे बढ़ने में कतराते है और किसी कुंद जगह पर बैठकर जीवन का दर्शन बुन लेते है
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मुझे पूर्ण विराम पसंद नहीं, पूरा खिला हुआ फूल पसंद नहीं, संपूर्णता पसंद नहीं, मुझे पूरा चाँद पसंद नहीं - आधा अधूरा सब कुछ अच्छा लगता है, आधे अधूरे कच्चे पक्के लोग, आधी अधूरी समझ वाले लोग, आधी बनी हुई आकृतियां, आधे अधूरे शिल्प, आधे अधूरे ख्वाब और आधी अधूरी रह गई अतृप्त इच्छाएं पसंद है, अंतिम अरण्य में निर्मल कहते है ना "जीवन में कुछ इच्छाएं अधूरी रह जाए तो जीने की आस बनी रहती है"
सरल सा कारण है कि जब कोई चीज अधूरी रह जाती है तो उसमें पूर्णता की गुंजाइश रहती है, पूर्णत्तर होकर क्या पा लेंगे, संपूर्णता अपने आप में एक दकियानूसी सोच, अपरिपक्वता और अपुष्ट विचारों की धारणा है और यह "परफेक्शन" की जिद में जीने वाले बेहद "लूनेटिक" यानी एक प्रकार के मानसिक रोगी है
अधूरापन एक सनक को जन्म देता है कि अभी रास्ते और मंजिलें और भी है, प्रयोग - नवाचार और जीतने की कोशीशे और भी है, और यह सब बहुत सरलता और सहजता से हासिल किया जा सकता है, पर यदि किसी वाक्य पर पूर्ण विराम लगा दिया जाए तो सारी संभावनाएं ही हम खो देते है
सीखना और सतत सीखते रहना अधूरेपन और अपूर्णता की अदम्य इच्छा से ही आता है इसलिए जरूरी है कि हम रीतते रहें, हथेलियों पर सरसों उगाने का स्वप्न आबाद रहें और यही जीवन की पूर्णता है,संसार की सारी लड़ाईयां या हाथ से झलने वाले पंखों से वातानुकूलित उपकरणों तक की विकास यात्रा या पशुओं की खाल से टेरीकॉट या बेहतरीन सूती कपड़ों की यात्रा अधूरेपन का ही मुकम्मल हासिल है
मुझे एक भी सम्पूर्ण चीज कायनात में दिखा दो, एक भी व्यक्ति सम्पूर्ण दिखा दो - यहां तक कि Gestald वादी भी पूर्णता की खोज में अपूर्ण रहे और समय की देहरी पर पूर्ण होने की चमक ही खत्म हो गई, विश्वास रखिए जो आपसे परफेक्शन की मांग करता है उसे जरा करीब से देखिए, वह इस संसार का सबसे दयनीय प्राणी है क्योंकि उसे उसके अपराध बोध, प्रसाद पर्यंत तक की सुविधाएं या कोई पद अंदर ही अंदर खाता रहता है
बहरहाल, ये जो चाँद है ना दोनों के बीच खेलकर ही लोक में इतना रच बस गया है कि संसार के आधे लोग इसकी गति से ही मानसिक रूप से रोगी बनते है और ठीक होते है, अपूर्णता ही मुक्ति और विलोपित होने का हथियार है, अपूर्णता ही जीवन दर्शन है , संसार के विकल और वृहद परिदृश्य पर आप साठ सत्तर बरस के जीवन में क्या ही ऐसा कर लोगे कि परिपूर्ण हो जाओ और शिखर पर पहुंच जाओ
"तुम जो चाहो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं" - आंधी फिल्म के इस गीत को आज की ठंडी रात में छत पर जाकर सुनिए जरा एक बार, आपको अपने अधूरेपन से प्यार हो जायेगा, और फिर जीवन को संपूर्ण करने के रास्ते नज़र आने लगे शायद
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किसी ने अभी पूछा - "संदीप, एक प्रश्न है -
कौन हारा-कौन जीता, कितना फ़ायदा-कितना नुकसान, कौन आगे - कौन पीछे, कौन अमीर - कौन गरीब, इस स्तर पर तो हर कोई सोचता है..इसके लिए कोई खास बुद्धिमता नहीं चाहिए, लेकिन क्या इनके अलावा भी कोई ऊँचा स्तर है जो इन सबसे भी ऊंचा है, कोई ऐसा स्तर भी है जिसपर किसी का कभी ध्यान ही ना गया हो"
बहुत देर तक सोचना नहीं पड़ा और प्रत्युत्पन्नमति से उत्तर दिया कि - "सिर्फ मन की शांति, सुकून और संतोष, निरपेक्ष और तटस्थ भाव से जीना , सब कुछ छोड़कर जैसे यह एक यात्रा है और हमें बस अगले स्टेशन उतरना है, हम उतरते समय रेल की सीट उखाड़कर नहीं ले जाते, बस के शीशे नहीं रख लेते बैग में, अपने संग चल रहे सहयात्रियों से बहुत बात होती है, बहुधा हम खुल भी जाते है, खाने से लेकर विचार शेयर करते है, सहजता से एक प्रेम भी हो जाता है, पर स्टेशन आने पर उतरना ही पड़ता है, बिछड़ना ही पड़ता है, जैसे हम बगैर अपेक्षा से हर यात्रा में उतर जाते है - वैसे ही रहना है जीवन में"
याद रहे कि हर पल एक स्टेशन गुजरते जा रहा है, हर पल हम आगे बढ़ रहे है, हर क्षण सब कुछ पीछे छूटते जा रहा है, हम जैसे एक नदी में दो बार नहीं उतर सकते, वैसे ही एक सफर में पीछे लौटना मुश्किल होता है, इसलिए निर्मोही रहो, बाहर से गुजरते जा रहे, नदी - पहाड़ - पुल - झरने - सड़कें - भोगदे या क्रॉसिंग पर खड़ी उतावली भीड़ को ना देखो, बस यह देखो कि हम कहां है, कितने और स्टेशन बाकी है, यात्रा तो अनवरत जारी ही है, आराम कर लो, सब सहेज कर अपनी गठरी में रख लो - क्योंकि यही अब आपके साथ जायेगी, जो काम का नहीं है या जो उपयोग में आ गया है - उसे बाहर के संसार में फेंक दो और आहिस्ते से दरवाज़े तक पहुंच जाओ
उतरते समय भीड़ होगी - चढ़ने और उतरने वालों की, कुछ छूट ना जाए और किसी को सहारा ना देना पड़े
सफर में हूँ और हर सफर की अपनी प्रसव पीड़ा होती है, बस चंद स्टेशन और फिर सब खत्म, लगता है सुरंग बहुत लंबी, घुमावदार और अंधेरी थी, जिसे पारकर रोशनी के इस मुहाने पहुंचा हूँ, आगे सब साफ है अब

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