बिहार चुनाव देश का बदनुमा दाग़ है
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बिहार चुनाव में जो आज हत्या हुई और किसी विधायक उम्मीदवार पीयूष पर हमला हुआ, वह शर्मनाक है, अस्वीकृति की संस्कृति को स्वीकारना और असहमति को सम्मान देना यदि नहीं आता तो बंद कर दीजिए यह नौटंकी कु-सरकार बहादुर और नीतीश नाम के कलंक
इस तरह की हत्याएं अस्वीकार्य है और यदि कानून व्यवस्था बिगड़ती है तो नीतीश से लेकर लालू तक को जेल में बंद कर दिया जाए, मोदी, शाह, मनोज तिवारी जैसे भांड से लेकर योगी, राहुल आदि की सभाएं खारिज कर इन नेताओं के राज्य में प्रवेश पर तुरंत रोक लगाई जाए, ये लोग सौहार्द्र बढ़ाने के बजाय लोगों को धर्म, जाति और रोजगार के नाम पर उकसा रहे है
14 नवंबर तक मीडिया जैसे दलाल और नीचतम माध्यम को नियंत्रण में रखना जरूरी है, वरना अनंत सिंह से लेकर लालू, नीतीश, तेजस्वी, चिराग या जीतनराम तक के लोग तांडव करेंगे
हमें इन चुनावों में गर्व होने के बजाय शर्म आ रही कि क्या - क्या बेवकूफियां लोकतंत्र के नाम पर बिहार में हो रही है और इसमें हत्या भी शामिल है, मजेदार यह कि ये राज्य और यहां के लोग अपने को बुद्धिजीवी और ब्यूरोक्रैट बनाने की मशीन कहते है, और मेरा स्पष्ट रूप से मानना है कि इस सबके के लिए जिम्मेदार केंद्र सरकार है, साथ ही वो बिहारी भी जो देशभर में नौकरी करके रोटी कमाते है और बकलोली करते है, ज्ञान पेलते है यहां - वहां जाति व्यवस्था पर, बिहार जाकर उज्जड़ भी हो जाते है एवं अपने ब्राह्मण, भूमिहार या दलितों के घेटों के संग - साथ उत्तेजक भीड़ में शामिल हो जाते है
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मै अब कहानियों पर यकीन नहीं करता, जीवन में कहानियों को बहुत सुना, करीब से घटते हुए देखा, कहानियों को जिया भी है, और कहानियों को बुनते हुए भी देखा - कहानियां सच्ची और झूठी भी होती है, अपने स्वार्थ और निजी फायदों के लिए लिखी - बुनी और सुनी - सुनाई जाती है या प्रस्तुत की जाती है या बेची जाती है, हम सब जानते है कि पुरस्कारों के लिए कहानियों का होना कितना जरूरी है और जीवन में इनका होना भी
कहानियों पर यकीन करना इसलिए छोड़ा कि बहुत कहानियां जीवन में लिखी - जो वास्तविकता से कोसों दूर थी और सिर्फ एक संदेश के लिए समूचा ताना-बाना बुना था मैने, जीवन में अपने अलावा मैने हजारों लोगों को पढ़ा और समझा, लाखों लोगों को कहानी के किसी चलते - फिरते पात्र के रूप में देखा है पर असली कहानी के लिए आज भी आँखें तरस रहीं है, अब मै किसी भी शख्स, घर, परिवार या समाज में कहानी नहीं देखता - क्योंकि अब मैं कहानी बुनकर बेचना नहीं चाहता
कहानियों के कहने वाले पर भी गहरा संदेह होता है - क्योंकि किसी ने अपने आप को आजतक गद्दार नहीं कहा या कहानी का दुखद अंत नहीं लिखा, जो लिखा वो मात्र दिवास्वप्न ही था - जो सिर्फ स्वांत - सुखाय ही था, कहानियां मन बहलाव का साधन निकली जिसकी छाया तले हम अपना दर्प पालते रहते है और खुश होकर एक भ्रम में जीवन निकाल देते है, और जब जीवन अंत की ओर आता है तो सिवाय गुनगुने पछतावों के कुछ नहीं हाथ लगता, अंत में आँखें मूंदते समय हम एक दुखांत वाली कहानी के चरित्र के रूप में खत्म हो जाते है
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न्याय कमजोर लोगों का अंतिम शस्त्र है, ताकतवर व्यक्ति या तंत्र अन्याय का हिसाब हाथोंहाथ कर देते है, असल में अन्याय और न्याय के बीच बहुत महीन अंतर है - जिसे सबको को देख पाना असम्भव है
न्याय और अन्याय के बीच एक और कड़ी है - कानून या नियम कायदे, जो इतने साधारण और प्रक्रियागत मुद्दे है कि इनमें उलझकर हम न्याय भूल ही जाते है - फिर वो प्राकृतिक न्याय हो या किसी न्यायाधीश द्वारा दिया गया कानूनगत न्याय
जीवन विसंगतियों से भरा पड़ा है, सिर्फ ताकतवर बनकर ही न्याय हासिल किया जा सकता है, बाकी सब तो उलझने और अपने - आपको व्यस्त रखकर दूसरों के जीवन चलाने के उपाय है जिसका प्रतिफल या अनुतोष आपको बाजदफे अपना जीवन चुकाकर देना पड़ता है
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हम सब अपने - अपने स्तर पर लड़ाइयां लड़ रहे है - अपने आप से, अपने वजूद से, अपनी परिस्थितियों से, अपने आसपास से, अपने घर या परिवार से, अस्मिता और जमीर से, परिवेश से, बीमारी और आर्थिक अस्थिरता से, कोई किसी को खाने को नहीं देता और ना कोई किसी का इलाज का खर्च उठा रहा है
हम सब लगातार बीमार होते जा रहे है - भौतिक और मानसिक रूप से और कैसे एक - एक क्षण, मिनिट, घंटा या दिन बीत रहा - कोई नहीं जान समझ सकता है, चंद मिनटों के मेल मिलाप, चंद खुशियां, हंसी के ठहाके यदि हम या कोई लगा लेता है, अपने छोटे - छोटे सपने पूरे करने की जिद में थोड़ा टेढ़ा - मेढ़ा चल देता है और दो घड़ी हंस - बोल लेता है तो आपको किसने हक दे दिया कि आप जजमेंटल होकर कमेंट पास करने लगें
एक ही जीवन और एक ही निश्चित समय इस संसार में सबको मिला है, सबको अपनी मर्जी से जीने और जीवन में मनचाहा करने का अधिकार है, आप को यह भी मालूम नहीं कि सामने वाला कहां से, किस प्लेटफॉर्म या स्तर से क्या बोल रहा है, समझ रहा है और कुछ कर रहा है, बगैर यह सब जाने - समझे आप भद्दे और गलीज कमेंट पास कर देते है , यह आपके नहीं, आपके संस्कारों और पालन पोषण की गलती है, शर्म आनी चाहिए आपको अपनी घटिया सोच और नीच कर्म पर
शुक्र मनाइए कि पीड़ाओं, गंभीर बीमारियों, अवसाद, तनाव और मृत्यु जैसी विभीषिका ने आपका घर अभी तक देखा नहीं है, किसी बेहद अपने को आपने तिल - तिलकर मरते नहीं देखा है - वरना जो हाल आप जैसे धूर्त, ढपोर शंखी और नीच आदमी का होता - वह देखकर ही आप एक क्षण जिंदा नहीं रहते, अपनी नीचता से बाज आइए, अपने आप पर ध्यान दीजिए, अपने आपको और अपने घर को सुधारिए उसकी जरूरत ज्यादा है बजाय दूसरों के निजी जीवन में ताक झांक करने के, एक सामान्य आदमी की बददुआएं आपको इतना कष्ट देंगी कि आप ना जी पाएंगे ना मर पाएंगे - समझ रहे है ना
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मोबाइल फेंककर त्यौहार मनाईए
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सूचना तकनीक, मोबाईल और आधुनिकता ने त्योहारों की खुशी और उत्साह छीन लिया है, कल सारा दिन देर रात तक वाट्सअप पर आए ठेले हुए मैसेजेस का जवाब देते हुए ही दिन बीत गया
जवाब दो तो मुश्किल और ना दो तो मुश्किल, "चार लोग" क्या कहेंगे कि इतना बिजी हो गया कि दीवाली की बधाई दी तो धन्यवाद भी नहीं बोल सकता, बाजार में भीड़ इतनी कि कुछ सुनाई नहीं दे रहा, घर आया तो रिश्तेदारों के फोन, मैसेजेस और ढेर सारे खट्टे - मीठे ताने कि बहुत बड़ा आदमी बन गया है, कभी फोन नहीं उठाता - ब्लाह, ब्लाह, ब्लाह - जीवन भर जूते ही मारते रहोगे क्या, कभी अपने को टटोल लो कि आप क्या करते रहते है सालभर चुगली, निंदा, और बुराई
यार लोगों, पड़ोसी और आसपास तो कम से कम खुद जाकर हाथ जोड़ लो, गले मिल लो, कुछ मत खाओ - पियो या खिलाओ - पिलाओ पर कम से कम इतनी तो शिष्टता रखो कि जाकर प्रत्यक्ष स-शरीर मिल लो - मरने के बाद वाट्सअप करते रहना फिर साला, नरक में क्या काम रहेगा और, जियो के टॉवर वहां भी मोदी लगवा देंगे और स्वर्ग - नरक में नेट फ्री रहेगा, टेंशन नॉट
दूसरा, लोगों ने अपने मन से बगैर इजाज़त इतने ग्रुप में जोड़ रखा है कि कहा नहीं जा सकता, किसी को नम्बर दिया नहीं कि घर जाकर देखो तो नत्थूलाल या चम्पाबाई ने आपको अलाने - फलाने ग्रुप में जोड़ लिया है , गजब है और ग्रुप में ढेरों कचरा - बगदा आता रहेगा और यह ग्रुप प्रोफेशनल्स का हो तो जैसे सबको छूट मिल जाती है कि कही से कुछ भी मिला नहीं कि ठेल - ठेलकर कोहराम मचा दो, भले आपने कुछ पढ़ा हो या नहीं या निंदा - पुराण में लग जाओ
वो तो कल रामजी की कृपा रही कि जवाब देते - देते वाट्सअप ने मुझे ही रिस्ट्रिक्ट कर दिया कि " बाबू , बहुत हुआ सम्मान, अब सो जाओ, चौबीस घंटे वाट्सअप बंद अब" - आपके ठेले हुए मैसेज के जवाब अभी नहीं दे पाऊंगा - सूचनार्थ
दीवाली की बधाई स्वीकार करें और बचे हुए दो - तीन दिन शांति से परिवार के साथ मनाएं और घर बना हुआ माल मसाला खाएं, और घूमिए - फिरिए, शहर में घर - घर जाकर दोस्तों - दुश्मनों से मिल आईए और दीवाली की राम - राम कर आईए
कोई काम नहीं, घर से दूर है तो नेटफ्लिक्स अमेज़न पर बढ़िया फिल्में देख लें, शहर घूम लें, चादर तानकर इतना सोइए कि थकान उतर जाए, कुछ पढ़ लीजिए, कुछ नहीं तो चित्र बनाइए, रसोई में कुछ ट्राय कीजिए और अपने आपका विरेचन कर आगे की योजना बनाईए
अर्जी - फर्जी तथाकथित सेलिब्रिटीज को रिस्पांस करना बंद करें, इनको रूपया मिल रहा फेसबुक से भी, वे आपके लिखें या आपके सुख दुख पर झांकने भी नहीं आते, आपकी दी हुई जन्मदिन की बधाई का दसियों साल जवाब नहीं देते, तो क्यों मूर्खता में पड़े है इन attitude वालों के चक्कर में, मरने दो सालों को, अपनी दीवाली क्यों खराब कर रहे है आप, अलित दलित से लेकर राजनीति पर लिखने वालों और साहित्य के घटिया लोगों से, मीडिया के दलालों से भी सावधान रहें - वे अपनी टीआरपी के चक्कर में रहते है, नेताओं और पार्षद टाईप गोलू मोलू टॉमी और शेरू से भी दूरी बनाएं, इनके लिए दीवाली पीआर का बहाना है
कौन भाग रहा - जियो या एयरटेल या सरकारी बीएसएनएल, ये सब आपको बिजी रखकर कमा रहे है, पर आपके रिश्ते खत्म कर रहें है, इससे पहले कि सब जल कर खाक हो जाएं - गले मिल लीजिए, गिले - शिकवे दूर कर लीजिए, अगली दीवाली किसने देखी है
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नया एटीएम कार्ड मिला या यूँ कहूँ कि रिन्यू हुआ - जो अब सन 2034 तक वैध और मान्य रहेगा, सोच रहा था कि बैंक कितना आशान्वित रहता है अपने ग्राहक को लेकर, जबकि जीवन का कोई भरोसा नहीं, और जब आप बीमारियों की एक खान में धंसे हो, अनगिनत पाप - पुण्य और आरोप - प्रत्यारोप की पोटली सर पर लादे चल रहे हो तो और कल सुबह की ही खबर नहीं कि सूरज से नज़रें मिला पाएंगे या नहीं
इस समय जब जीवन की अठ्ठावनवीं दीवाली के हल्ले - गुल्ले और शोर में बैठकर यह कार्ड खोलकर देख रहा हूं, निर्देश पढ़ रहा हूं जो बहुत ही सलीके और सरलतम भाषाओं में लिखें है - तो लगता है संप्रेषण और सहजता के मूल सिद्धांतों ने बाजार और ग्राहक के बीच कैसा रिश्ता बना दिया है
बहरहाल, 2034 तो किसने देखा है, अभी Ravi ने कहा कि मैं भारत अब जून / जुलाई 2026 में आऊंगा, तब मिलते है तो मैं मुस्कुरा दिया और जवाब में लिखा कि Let's Hope for the Best. उम्मीद न्यून है पर फिर भी ....
हम सब एक समय के बाद चूक जाते है - निराशा, निंदा, बदनामी, ख़ौफ़, डर, लोकलाज, गरिमा, अवसाद, तनाव और अपने हिसाब से बनाए चौखटों और दायरों में लोगों को परिभाषित करते, फिट करते, स्वीकृत और रिजेक्ट होते - होते हम थक जाते है, और फिर एक दिन जीवन से हार जाते है, संथारा (जैन धर्म में जीवन समाप्त कर लेने की एक प्रक्रिया) भी एक वास्तविकता है, जरूरी नहीं कि अपने को एक झटके में ही खत्म कर लें और मुक्त हो जाएं, यह हर पल घटने वाली बहुत सरल और सहज तकनीक है - जिसे बिरले ही अपना सकते है,एक बात है कि इसके लिए बहुत हिम्मत लगती है - अपने सामने अपने को तिरोहित होते देखना और तिल - तिल मरते देखना, भुगतना और उफ्फ भी नहीं करना, चुप रहना, भी सर्वश्रेष्ठ जीवन कौशलों में से एक है और तब जब आपके अपने लोग आप पर से विश्वास छोड़ दें और किनारे हो जाए, पर यह सत्य जितनी जल्दी हो स्वीकार कर लेना ही जीवन का दर्शन और प्रारब्ध है
खैर, उम्मीदें बरकरार रहनी चाहिए - नहीं तो जीवन बीमा है ही - जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी
क्या सच में जीवन में किसी कार्ड की तरह हमें भी अपनी अंतिम तिथि ना सही, पर माह और साल का ज्ञान होना जरूरी है - ताकि हम सोच सम्हलकर हर पल खर्च कर सकें
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दो बुलडॉग, एक अल्सेशियन, चार - पांच पामेरियन पाल लो और खुद लेब्राडोर बन जाओ - सब बढ़िया चलेगा - दुकान हो, धंधा, नौकरी हो या गल्ला
बस सबको खिलाते - पिलाते रहो, घूमाते रहो और पेडिग्री दिखाते रहो
कविता भी छपेगी, किताबें भी और महालक्ष्मी की आवक भी बनी रहेगी, सरस्वती तो वैसे भी तुम्हारे पास कभी नहीं थी, कॉपी पेस्ट के धंधे से ही महान बन गये हो
[लैब्राडोर प्रजाति का कुत्ता बहुत सामाजिक होता है हमारे यहां दो बार हमने पाला है इसलिए प्रामाणिकता से अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ]
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यदि आपको लगता है कि इंजीनियर, डॉक्टर, प्राध्यापक, मीडिया, न्यायाधीश, वकील और पढ़े - लिखें लोग बुद्धिजीवी है, नीति निर्माता या समाज में असर पैदा करने वाले इन्फ्लूएंसर हैं तो आप बहुत मुगालते में है, ये लोग विशुद्ध मूर्ख और जाहिल है - इन्हें समाज, दुनिया या वैश्विक मुद्दे तो दूर अपने क्षेत्र की बहुतेरी समस्याओं का भी भान नहीं है, सदियों से अपने कोरे और थोथे ज्ञान से सिर्फ रूपया कमाने में ये लोग लगें है, इन्हें सरल सा भाषा ज्ञान नहीं - अपनी माईबोली, अंग्रेजी, हिंदी या अपनी मातृभाषा समझना तो दूर - सही उच्चारण नहीं कर सकते और किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में ये इतने उथले और थोथे होते है और यह जानना हो तो चार पंक्तियों का लिखा हुआ कोई उद्बोधन या वक्तव्य पढ़वाकर देख लीजिए
समझ के स्तर पर ना इनकी कोई राजनैतिक विचारधारा है और ना ही कोई ठोस विकल्पों वाली समझ, सिर्फ मै, मै और मै तक सीमित ये लोग बेहद खोखले और आत्म मुग्धता में डूबे हुए है, मजेदार यह है कि अधिकांश इनमें से नशे में धुत्त है और चौबीसों घंटे अपने स्वयं के दर्प में गले - गले तक फंसे हुए ये लोग कूपमण्डूक है और नीचता में व्यस्त रहते है, दुर्भाग्य से इनके पास गलत तरीकों से कमाया हुआ अकूत रूपया है - जिसके कारण ये हर बात को मजाक समझकर और रूपया चढ़ाकर अपना काम निकलवाने में माहिर और पारंगत है , आप जरा सा इन्हें आईना दिखा दें तो ये गाली - गलौज या चरित्र हनन पर उतर आते है
पिछले चालीस वर्षों में इन अलग - अलग लोगों के साथ काम करके कम से कम मेरे जैसे अल्पज्ञानी की तो यही समझ पुख्ता हुई है कि यदि आप किसी छोटी सी समस्या या नीति निर्देश के लिए इनकी ओर देख रहे है भूल जाए इन घाघ लोगों को - बेहतर है आप चौराहे पर बैठकर किसी मजदूर, खेत में काम करते किसान, या किसी फैक्ट्री में काम करते श्रमिक से दो घड़ी बात कर लें क्योंकि उसके पास विजन, मिशन और समाधानों के ढेरों विकल्प होंगे - जो आप अपनाकर अपना जीवन ठीक कर सकते हैं, यही वे लोग है जो न्याय, कानून से लेकर शिक्षा और राजनीति की सबसे श्रेष्ठ समझ रखते है, ये तथाकथित फर्जी और एक्सीडेंटल रूप से पेशे में आए लोग शून्य है और मानसिक रोगी है
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ईश्वर या खुदा जब आपसे प्रसन्न होता है तो धीरे - धीरे आपकी जरूरतें कम कर देता है और इस तरह से आप अति धनवान, चल - अचल संपत्ति के मालिक होते हुए भी न्यूनतम आवश्यकताओं में जीवन बीताने लगते हैं, यह संकेत है कि आप अब अपने कर्म - कार्य वृहद समुदाय के लिए कीजिए और प्रसन्न रहिए, सकारात्मक रहिए, ईश्वर चाहता है कि आप सबसे मुक्त होकर अपना ध्यान समाज की भलाई और कल्याण में लगाएं
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