Skip to main content

Man Ko Chiththi - Post of 5 Oct 2024

जीवन विरोधाभास, द्वंद और सच्चाई की डोरी पर चलने का नाम है, हमें अक्सर उन स्थितियों, अवसरों, जगहों और लोगों के बीच रहना पड़ता है - जो इस डोरी को दोनों सिरों पर मजबूती से थामे बैठे है और साँस रोककर हमारे फिसलने और गिरने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहें हैं कि हम गिरें और वे तालियाँ बजाते हुए पुट्ठे की धूल झाड़ कर हमारी लाश के पास आकर च - च - च करते रहें
मज़ेदार यह है कि अपरिग्रह, अस्तेय, अहिंसा का लबादा ओढ़कर जीवन चलाने वाले सबसे ज़्यादा भ्रष्ट, हिंसक और घातक है, तमाम सत्यशोधक बाशिन्दे झूठ के मैले आँचल तले अपने सुहाने स्वप्न बुनकर भरपूर ज़िन्दगी जीने के उपक्रम में लगे हैं, जो लोग घर - परिवार - शासन - प्रशासन और समाज की संस्थाओं या समुदायों में बुरी तरह से असफ़ल होकर नज़ीर बन गए - वे नेतृत्व की दिशा और डोर थामे बैठे है और नेतृत्व सीखाने के विश्वविद्यालय बन रहे है
जो लोग ईमानदार, संस्कृति मूलक समाज और उन्नत भविष्य के सपने सँजोये समाज के अगुआ बनने को उद्धत थे, वे सबसे ज़्यादा बेईमान, भ्रष्ट, परम्परा और पाखण्ड फ़ैलाने की अग्रिम पँक्ति में शामिल है, जो समग्रता, एकाग्रता, भिन्नता और समष्टिवाद के पुरोधा थे - आज बेहद संकीर्ण सोच के संग जीवन मार्ग पर सबको हाँकने का काम कर भीड़ का हिस्सा बना रहें हैं
जो लोग ज़मीन तोड़ने का काम करने और नया सृजन करने को कटिबद्ध और वैचारिक तौर पर प्रतिबद्ध बन प्रचारित कर रहें थे, वे कायर, षडयंत्रकारी और कुटिल निकलें और इन्होंने ही धर्म, जाति, बोली, भाषा, संस्कृति, राजनैतिक बोलबाले और विनाश के रथ पर सवार होकर - उन्ही सब बातों को प्रश्रय दिया - जो आदिम युग में भी नाजायज़ थी
रुपया, यश, कीर्ति, नाम, हवस और आत्मप्रचार की भूख ने आज हम सबको क्या से क्या बना दिया है, चारित्रिक रूप से और नैतिक रूप से हम एक इंसानी पैरहम में भी नही फिट बैठ रहें और यह गिरना इतना गिर गया है कि अब हम सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने दुष्कृत्यों को जस्टिफाई कर रहें हैं और अपने हर किये धरे को न्यायसंगत ठहरा रहें हैं, ज़मीर बेचकर रोटी का सौदा कर बैठे हैं
सिर्फ़ यही पूछता हूँ अपने-आप से कि मैं भी अभी इस राह का सिरमौर तो नही, पर इस कसी हुई डोरी पर नृत्य मुद्रा में हूँ - झूल रहा हूँ और समझ भी रहा हूँ - स्व संस्तुति यह है कि मैं मुक्ति तलाश कर रहा हूँ - पर जीवन, साँसारिक जरूरतें और समय के पहिये से दूर हटकर थोड़ा अतिरिक्त समय मिलें तो कुछ सही ठिकाना हाथ लगें, वरना तो अब मुश्किल है - एक स्वार्थी जाल में फँसकर आप सिर्फ़ उसके हिस्से हो सकते है - स्वतन्त्र और सृजनात्मक नही
दो बात याद आती है पूर्ववर्ती लोगों की - "हम क्या थे, क्या हो गए है और क्या होंगे", और दूसरी - "यह भी गुज़र जायेगा, जैसे सुख स्थाई नही - वैसे दुख भी नही"
आमीन

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

अदम गोंडवी की ग़ज़लें

अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन......... काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में 000 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की? इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया सेक्स की रंगीनियाँ या ...

Rest in Peace Dr BK Pasi, You will be Remembered Always

नमन डा बी के पासी सन 1991-92 का साल था , एम ए अंग्रेज़ी में करने के बाद कुछ और पढ़ा जाए इस बात की इच्छा थी लिहाजा सोचा कि पीएच डी करने में तो समय लगेगा क्यों ना एम फिल कर लिया जाए, इंदौर के देवी अहिल्या विवि में थोड़ा परिचय था, स्याग भाई ( डा रामनारायण स्याग ) ने ताजा ताजा शोध पूरा किया था और शिक्षा विभाग में अक्सर आना जाना होता था, देवास की मीना बुद्धिसागर उन दिनों वहा शोध के लिए पंजीकृत हुई ही थी, डा उमेश वशिष्ठ, डा सुशील त्यागी, डा छाया गोयल और डा देवराज गोयल से परिचय था ही, सो सोचा कि क्यों ना यहाँ कुछ पढाई की संभावनाएं टटोली जाएँ. सीधा जाकर डा बी के पासी से मिला तो उन्होंने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा क्या करेगा अब पढ़कर और इतना अच्छा काम कर रहा है तो अब क्या करना है फिर मैंने जिद की तो उन्होंने कहा कि थोड़ा ठहर जा मै एक नया पाठ्यक्रम शुरू कर रहा हूँ भविष्य अध्ययन मान्यता के लिए प्रकरण यु जी सी गया है आते ही सूचना करूंगा. बात आई गयी हो गयी, एक दिन बैतूल में गया हुआ था एक शिक्षक प्रशिक्षण में था तो डा पासी का फोन घर पहुंचा और कहा कि तुरंत मिलने को बुलाया है. मै आते ही ...