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Posts of 26 May 15


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हमारे प्रिय लेखक और अग्रज , हिंदी के वरिष्ठ कहानीकार और उपन्यासकार डा प्रकाश कान्त जी का आज जन्मदिन है। वे सहसा आयोजन और उत्सवों से दूर रहते है पर हम तीन लोग कहाँ मानने वाले थे। अभी पहुंच गए और एक आत्मीय माहौल में एकदम सादे तरीके से मनाकर आ गए। वे खूब लम्बी और रचनात्मक जिंदगी जिए यही हम सबकी शुभेच्छा है।
 — with Bahadur Patel.















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प्यार सिर्फ प्यार होता है और झगडा बढ़ने से प्यार बढ़ता ही है चाहे फिर हमारी, तुम्हारी, इसकी, उसकी या सबकी जिन्दगी में कोई और आ जाए........पहला प्यार भूला पाना नामुमकिन है बस सवाल यह है कि हम भूलने को मानसिक रूप से तैयार हो जाए. जीवन चलता रहता है और कभी रुक नही सकता और फिर अभिनय के इस दौर में जो सर्वश्रेष्ठ भी हम अपने आप के सामने परोस लेते है जिन्दगी का वह भी कभी - कभी हम पर ठीक बूम रेंग की तरह से पलटवार करते हुए  लौट आता है. चाहे वह तनु हो, मनु हो या दत्तो   या मै तुम या हम - सब....... जिन्दगी... काश कि कभी रिटर्न हो सकती !!! मै शर्त लगाकर कडा श्रम करने को आज भी तैयार हूँ अगर यह जिन्दगी एक रफ कॉपी हो जाए और रिटर्न में एक सीधी सादी जिन्दगी मिल जाए.कुछ नहीं चाहिए बस चंद साँसें और एक् धडकता  हुआ दिल जो कहें " हर पल यहाँ जी भर जियो.........." 
कंगना हम सबके बीच महिला सशक्तिकरण और नए बाजार के दौर की नई आईकॉन है जो इस दुनिया में गाँव और बाजार के बीच संप्रभुता, फैशन, संस्कृति, मूल्य, सभ्यता की जो नए चमक और वैश्वीकरण का जो जाल है, की ओर उन्मुख करती है, कंगना जानती है कि बाजार और प्यार के बीच से रास्ता यश और रूपये की ओर जाता है इसके लिए अभिनय कर लेना कोई बड़ी बात नहीं है इसलिए उसे इस समय की बड़ी अभिनेत्री कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा पर हाँ वह  बेचना जानती है दिल - दिमाग या प्यार चाहे वह फेशन से हो, तनु मनु से हो या किसी भी तरह से, क्योकि हमारा समाज अब नया चाहता है चाहे प्रेम में या सेक्स में, बाजार में या भावनाओं में, और फिर समाज के बदलते दौर में महिलाओं के अधिकार, अस्मिता और प्रासंगिकता को भी दर्शाती है इस मायने में कि औरत सिर्फ भोग्या है शराब पीकर, या अंत तक फेरे देखने की चाह में वह अंत में सिर्फ एक लिजलिजी सी औरत ही साबित होती है जो पति परमेश्वर के आख्यान को ही महत्व देकर जड़ हो चुकी और सड़ी हुई मानसिकता को पुष्ट करती है. यह फिल्म नहीं हमारे समाज की बीमार होती जा रही मानसिकता, और गिरते जा रहे जीवन मूल्यों के बीच जीवन को एक बार फिर से पाने की कोशिश है जो सिर्फ यही बताती है कि हम सब कितने अजीब रिश्तों में जी रहे है. बदचलनी बेवफाई  में बदल जाये और ठरकी लोलिता को आदर्श मान लें या प्यार प्रदुषण का प्रतीक बन जाए तो जीवन कहाँ रह जाता है.......?

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