Skip to main content

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही निशाँ होगा.


यह है काकोरी जो अब सिर्फ ९ अगस्त और १९ दिसंबर को यानी की साल मे दो बार याद किया जाता है. "बच्चे आते है आसपास के स्कूलों के, साहब लोग आते है, अधिकारी आते है, विधायक आते है, पुलिस वाले आते है इन दो दिनों मे मेला लगता है, खूब बड़े बड़े कार्यक्रम होते है, बाकि तो सब ऐसे ही रहता है. कभी कभी कोई दो-तीन लोग आ जाते है. हम तो चौकीदार है अशोक नाम है हमारा, अठारह हजार वेतन है, लोक निर्माण विभाग के कर्मचारी है हम, दिन मे हम रहते है, दूसरा रात मे आता है" 

लखनऊ से बीस किलोमीटर दूर काकोरी कांड की याद मे बना यह शहीद स्मारक आज बेहद शांत था मै हरदोई से आ रहा था. बचपन से पढ़ा था और सुना था आज अचानक इधर आने का मन हुआ और आ गया. १४ बीघा मे बना यह स्मारक बाज नगर मे है. बढ़िया शांत जगह है, बैठने की सुन्दर व्यवस्था है, एक पुस्तकालय है जिसमे शायद पचास पुस्तकें है और फुल टाईम कर्मचारी ना होने से यह साल मे दो ही दिन खुलता है और लोग इसका लाभ जमकर उठाते है. आसपास के लोग क्यों आये भला? 

अब ये देशभक्ति आदि किसी के काम की नहीं है जनाब, मूर्ख थे ये सारे लोग जिनकी तस्वीरें लगी है जो देश की खातिर झूल गये फांसी के तख्ते पर अरे भाग जाते तो आज शान से ट्रेन के ऐसी के टिकिट मे घूमते फ्री मे और मस्त राजनीती करते. खैर मुझे क्या मै अजब यहाँ आया तो कोई था नहीं भरी धूप मे पीने का पानी तलाश रहा था पर ना मिला पानी ना कोई लोग तो बस अपनी कुछ तस्वीरें ले ली ताकि जीवन मे सबुत याद रहे कि चलो उंगली कटाकर हम भी शहीद हुए थे कभी. 

बहरहाल चित्र देखिये और एक बार सिर्फ एक बार इन महान लोगों को याद करिये हाँ दीवारों की हालत पर ध्यान मत देना.

















Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...

सतरें जीवन के - तटस्थ Satare Jivan ke

सतरें जीवन के   जब प्रवाह में बह जाने का समय आता है, लगता है कि अब सब खत्म हो ही रहा है - अचानक एक तिनका कही से तैरते हुए आ जाता है और शिद्दत से थाम लेता है यह कहकर कि धैर्य रखो, शांत हो जाओ - उजाले की किरणें छटा बिखेरेंगी जल्दी ही शाम ओस से भीगी हुई एक कविता है जिसने संसार में अपनी लय से सबको बाँध रखा है जीवन झूठ का पुलिंदा है और हम सब इसे पसंद करते है, हम सब झूठ के साम्राज्य को बनाये रखना चाहते है और इसी उपक्रम में मरने तक मेहनत करते रहते हैं, अंत में मौत का सच इसकी हवा निकाल देता है अयोग्यता ही असली धन और शांति है, जब तक अयोग्य लोग है तब तक योग्यता की असली और वीभत्स सच्चाई सामने आती रहेगी जो स्वाभाविक ना होकर ना - ना प्रकार के कृत्रिम संसाधनों से अर्जित कर सुख सम्पदा हासिल करने के लिए बेहतरीन स्वांग के साथ ओढ़ी गई है हारना और स्वीकारना हिम्मत का काम है और इसकी जड़ें बहुत गहरी होती है, अपूर्णताएँ, अकुशलताएँ और अधकचरी थोथी सूचनाएँ जीवन के उत्तरार्ध में आपको एहसास दिलाती है कि आपके सारे प्रयास, अभ्यास और चेष्टाएँ व्यर्थ है - इसलिये ख़ारिज करो अपने हर कर्म को, समझ को, देख...