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ज्योति दीवान छोटी का यूँ गुजर जाना ........





ये एक ढलती शाम है, नर्मदा का जल शांत परन्तु बहुत उद्धिग्न है. आज होशंगाबाद में यह नर्मदा अपने उद्दाम वेग से नहीं बह रही है, लगता है शांत होकर अपने आप से पूछ रही है कि आखिर नियति क्या है, संसार क्या है नश्वरता क्या है और क्यों कोई कैसे अपने जीवन की यात्रा को इतनी जल्दी समेट लेता है ? दोपहर को मनोज भाई ने जब सूचना दी कि ज्योति का देहावसान हो गया है तों सन्न रह गया था एकदम से, अभी पिछले हफ्ते ही मै और गोपाल घर गये थे बहुत देर तक बैठे थे और वो लगातार ठीक हो रही थी, केरल से चलने वाले ईलाज से बेहद खुश थी आशान्वित थी कि अब वो फ़िर से ठीक होकर अपनी बेटी जों सिर्फ छः माह की है, से खेलने लगेगी. ज्योति जैसा नाम वैसा काम अपने में मस्त और बच्चों से बेहद लगाव, एक लंबे समय तक वो एकलव्य में काम करती रही बच्चों के लिए पत्रिका "उड़ान" निकालना और इस पत्रिका के लिए ढेर सारा काम करना, रचनाएँ छांटना, बच्चों को चिठ्ठी लिखना, फ़िर पत्रिका को संवारना और प्रकाशित कर वितरण करना साथ ही समाज के दीगर विषयों पर काम, जानकारी, प्रशिक्षण और महिला मुद्दों पर काम करने वाले समूह से लगातार सम्पर्क बनाकर काम करना. कुछ समय बाद ज्योति राजस्थान में 'दूसरा दशक' जयपुर  में काम करने चली गई, वहाँ वो पुस्तकालय को कैसे चलाये ताकि वो बाल गतिविधियों का सक्रीय केन्द्र बन सके जैसी महत्वपूर्ण योजना पर लंबे समय तक काम करती रही. दो साल बाद यहाँ लौट आई और फ़िर सक्रीय हो गई. ज्योति को हम सब 'छोटी' के नाम से जानते थे, उसे छोटा से बड़ा होता देखा और फ़िर साथ काम किया खूब जमके, पिछले बरस ही उसकी शादी हुई थी जुलाई में और अचानक फरवरी में मालूम पड़ा कि उसे गले में कैंसर हो गया था, एलोपैथी का सब ईलाज करने के बाद आखिर आयुर्वेदिक ईलाज शुरू किया था और वो लगातार ठीक हो रही थी. आज अचानक से इस तरह हम सबको छोडकर ज्योति चली गई, एक प्यारी साथी और बच्चों में बेहद लोकप्रिय ज्योति दी...........आज जब होशंगाबाद के राजघाट पर नर्मदा के तीरे हम ढेर सारे साथी वहाँ खड़े थे तों सबकी आँखों में आंसू थे और विश्वास करना कठिन हो रहा था कि 'छोटी' बहुत छोटी सी जिंदगी बिताकर हम सबको छोडकर चली गई है हमेशा के लिए. नर्मदा के जल की शान्ति हम सबको चिढा रही थी, क्यों....जीवन का सच इतना कड़वा क्यों होता है, श्मशान से सिर्फ श्मशान वैराग्य उत्पन्न होता है जों बहुत अस्थायी किस्म का होता है पर जीवन के सच शाश्वत होते है, राकेश और योगेश भाई के घर हम सब लोग देर तक बैठे सोचते रहे.......आज नहीं तों कल जीवन सामान्य गति पर लौट आएगा पर जों अपूरणीय क्षति हो जाती है, जीवन के अंतिम और चिरंतन सत्य से जब हम दो-चार होते है तों सारा किया धारा व्यर्थ लगने लगता है. आज ज्योति ने साथ छोड़ दिया हम सबकी लाडली और प्यारी 'छोटी'- हमारे परिवार की ज्योति आज नहीं है-पर क्या वो सच में चली गई है ? पंडित कुमार जी का कबीरकृत जी का भजन याद आता है....... 
जब होवेगी उम्र पूरी, तब छूटेगी हुकुम् हुजूरी,
यम के दूत बड़े मरदूद यम से पड़ा झमेला
उड़ जाएगा, उड़ जाएगा, हंस अकेला
जग दर्शन का मेला.................

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