Skip to main content

निशांत की एक कविता

निशांत की एक कविता


निशांत - 9239612662

निशांत की यह कविता परिकथा मई-जून, 2010 में छपी थी। निशांत बहुत समय से कविता लेखन में सक्रिय हैं और कविता के लिए उन्हें प्रतिष्टित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, 2008, शब्द साधना युवा सम्मान, 2010 और प्रथम नागार्जुन कृति सम्मान, 2009 मिला है। कविता की एक किताब जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा ज्ञानपीठ से प्रकाशित हो चुकी है। निशांत फिलहाल जेएनयू में पीएचडी कर रहे हैं।
यह कविता प्रेमचंद की जयंती (31 जुलाई) पर विशेष। बहुत जल्दी निशांत की और कविताएं आप पढ़ सकेंगे।




प्रेमचंद को पढ़ते हुए

हमारे नाम के भीतर
बैठे होते हैं हमारे पुरखे
उनकी स्मृतियां
हमारी सभ्यताएं संस्कृतियां इतिहास
और कभा-कभी उनका भूगोल भी

क्यों किसी का नाम
गोबर धनिया फेंकना मिठइया होता है
जबकि वह सीधा-सादा सरल-सा होता है
दिखता भी है एकदम वैसा ही

ये सारे नाम वहीं से आते हैं
जहां मिट्टी पानी से सना रहता है हाथ
धूप से भीगा रहता है सर

नामों के पीछे काम करती है
एक गहरी-काली साजिश
बहुत-बहुत समय पहले की साजिश

आज भी बचे हुए हैं ढेर-ढेर नाम

किसी वैदिक मंत्रों की खोज में
उद्धाटित किया होगा उन्होंने यह सूत्र वाक्य
कि उनकी आत्मा पर चिपका दो यह नाम
और कहते रहो नाम में क्या रखा है

नाम से खोलते हैं वे एक ताला
एक तिलिस्म
एक सभ्यता
एक संस्कृति
एक इतिहास
और दाखिल हो जाते हैं
आत्मा के गह्वर में टपके ताऊत की तरह

एक नाम लेते हैं वे
सबकुछ स्पष्ट दिखने लगता है उन्हें
नाम नहीं एक मंत्र बुदबुदाते हैं वे
खड़ी कर लेते हैं अपनी अयोध्या

हमारा सारा रहस्य
हमारे उजबक से नामों में छुपा है
धर्मांतरम करने से ज्यादा जरूरी है नामांतरण करना

वे कहते हैं नाम में क्या रखा है

नाम बदलना
एक पूरी सभ्यता पूरी संस्कृति
और कभी-कभी एक पूरा इतिहास बदलना ह

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

अदम गोंडवी की ग़ज़लें

अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन......... काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में 000 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की? इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया सेक्स की रंगीनियाँ या ...

Rest in Peace Dr BK Pasi, You will be Remembered Always

नमन डा बी के पासी सन 1991-92 का साल था , एम ए अंग्रेज़ी में करने के बाद कुछ और पढ़ा जाए इस बात की इच्छा थी लिहाजा सोचा कि पीएच डी करने में तो समय लगेगा क्यों ना एम फिल कर लिया जाए, इंदौर के देवी अहिल्या विवि में थोड़ा परिचय था, स्याग भाई ( डा रामनारायण स्याग ) ने ताजा ताजा शोध पूरा किया था और शिक्षा विभाग में अक्सर आना जाना होता था, देवास की मीना बुद्धिसागर उन दिनों वहा शोध के लिए पंजीकृत हुई ही थी, डा उमेश वशिष्ठ, डा सुशील त्यागी, डा छाया गोयल और डा देवराज गोयल से परिचय था ही, सो सोचा कि क्यों ना यहाँ कुछ पढाई की संभावनाएं टटोली जाएँ. सीधा जाकर डा बी के पासी से मिला तो उन्होंने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा क्या करेगा अब पढ़कर और इतना अच्छा काम कर रहा है तो अब क्या करना है फिर मैंने जिद की तो उन्होंने कहा कि थोड़ा ठहर जा मै एक नया पाठ्यक्रम शुरू कर रहा हूँ भविष्य अध्ययन मान्यता के लिए प्रकरण यु जी सी गया है आते ही सूचना करूंगा. बात आई गयी हो गयी, एक दिन बैतूल में गया हुआ था एक शिक्षक प्रशिक्षण में था तो डा पासी का फोन घर पहुंचा और कहा कि तुरंत मिलने को बुलाया है. मै आते ही ...