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अम्बर रंजना पाण्डेय की तीन नई कविताएं

पकड़ नहीं आती छवि

दूती की भूमिका में मंच पर
बांच रही हैं आर्या-छंद मेरी प्रेयसी.
चांदी की पुतलियों का हार और हंसुली
गले में पहनें. संसार यदि छंद-
विधान है तो उसमें
अन्त्यानुप्रास हैं वह. किसी
उत्प्रेक्षा सा रूप जगमग दीपक
के निकट. दूती के छंद में कहती
हैं नायिका से, ''छाजों
बरसेगा मेह, उसकी छवि की छांह
बिन छलना यह जग, जाओ सखी
छतनार वट की छांह खड़ा है
तुम्हारा छबीला'' और मुझे मंच के नीचे
कितना अन्धकार लगता है. कैसे रहूँगा मैं
जब तुम चली जाओगी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय,
दिल्ली. यह अभिनय नहीं सुहाता, नट-
नटियों के धंधे.

रूप दिखता है और अचानक
हो जाता है स्वाद. पकड़
नहीं आती छवि छंद से भी
ज्यादा छंटैत है.
****

ऋतु-स्नान

चैत समाप्यप्राय हैं. आठ-दस हाथ दूर
आलते रचे, मैले पांवों
को तौल तौल धरती
उतरती प्रवाह
में. एक ही चीर से
ढँके सब शरीर.
एक स्नान सूर्योदय से
पूर्व कर चुकी हैं वह. यहाँ
केश धोने आई हैं. पांच
दिनों की ऋतुमती, थकी और
मंथर, अधोमुखी जैसे हो
आम्र-फलों की लता. नर्मदे
मेरे एकांत पर फूलना
लिखा था यों यह ब्रह्मकमल कि
मारता हूँ डुबकी, अचानक
उसके स्तनों पर जमे गाढ़
स्वेद, धूल और श्वासों से
सिंची फूल पड़ती हैं मुझपर
मोगरे की क्यारियाँ. वीर्य
और रज का मैं पुतला, मुझे
नदी के बीचोंबीच होना
था मुकुल शिवपुत्र का कामोद.
****

बहुत हैं मेरे प्रेमी

मैं तो भ्रष्ट होने के लिए ही
बनी हूँ
बहुत हैं मेरे प्रेमी
पाँव पड़ता हैं मेरा नित्य
ऊँचा-नीचा

मुझसे सती होने की आस
मत रखना, कवि

मैं तो अशुद्ध हूँ
घाट घाट का जल
भाँत भाँत की शैया
भिन्न भिन्न भतोर का भात
सब भोग कर
आई हूँ तुम्हारे निकट

प्रौढ़ा हूँ विदग्धा हूँ
जल चुकी हूँ
यज्ञ में चिता में चूल्हे में

कनपटियों की सिरायों में
टनटनाती रहीं सबके, दृष्टि में
रही अदृश्य होकर, जिह्वा पर
मैं धरती हूँ कलेवर
उदर में क्षुधा, अन्न में तोष
निद्रा में भी
स्वप्न खींच लाया मुझे
और ले लिया मेरे कंठ का चुम्बन

फिर कहती हूँ, सुनो
ध्यान धरकर

मैं किसी एक की होकर नहीं रहती
न रह सकती हूँ एक जगह
न एक जैसी रहती हूँ

नित्य नूतन रूप धरती हूँ
मैं इच्छावती
वर्ष के सब दिन हूँ रजस्वला
मैं अस्वच्छ हूँ टहकता हैं मेरा
रोम रोम स्वेद से
इसलिए मैं लक्ष्मी नहीं हूँ
न उसकी ज्येष्ठ भगिनी

मैं भाषा हूँ, कवि
मुझे रहने दो यों ही
भूमि पर गिरी, धूल-मैल
से भरी

जड़ता में ढूंढोगे तो मिलेगा
सतीत्व, जीवन तो स्खलन
हैं, कवि

जल गिरता हैं
वीर्य गिरता हैं
वैसे मैं भी गिरती हूँ
मुझे सँभालने का यत्न न करो
मैं भाषा हूँ
मैं भ्रष्ट होना चाहती हूँ.
****

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