मुझे पूर्ण विराम पसंद नहीं, पूरा खिला हुआ फूल पसंद नहीं, संपूर्णता पसंद नहीं, मुझे पूरा चाँद पसंद नहीं - आधा अधूरा सब कुछ अच्छा लगता है, आधे अधूरे कच्चे पक्के लोग, आधी अधूरी समझ वाले लोग, आधी बनी हुई आकृतियां, आधे अधूरे शिल्प, आधे अधूरे ख्वाब और आधी अधूरी रह गई अतृप्त इच्छाएं पसंद है, अंतिम अरण्य में निर्मल कहते है ना "जीवन में कुछ इच्छाएं अधूरी रह जाए तो जीने की आस बनी रहती है"
सरल सा कारण है कि जब कोई चीज अधूरी रह जाती है तो उसमें पूर्णता की गुंजाइश रहती है, पूर्णत्तर होकर क्या पा लेंगे, संपूर्णता अपने आप में एक दकियानूसी सोच, अपरिपक्वता और अपुष्ट विचारों की धारणा है और यह "परफेक्शन" की जिद में जीने वाले बेहद "लूनेटिक" यानी एक प्रकार के मानसिक रोगी है
अधूरापन एक सनक को जन्म देता है कि अभी रास्ते और मंजिलें और भी है, प्रयोग - नवाचार और जीतने की कोशीशे और भी है, और यह सब बहुत सरलता और सहजता से हासिल किया जा सकता है, पर यदि किसी वाक्य पर पूर्ण विराम लगा दिया जाए तो सारी संभावनाएं ही हम खो देते है
सीखना और सतत सीखते रहना अधूरेपन और अपूर्णता की अदम्य इच्छा से ही आता है इसलिए जरूरी है कि हम रीतते रहें, हथेलियों पर सरसों उगाने का स्वप्न आबाद रहें और यही जीवन की पूर्णता है,संसार की सारी लड़ाईयां या हाथ से झलने वाले पंखों से वातानुकूलित उपकरणों तक की विकास यात्रा या पशुओं की खाल से टेरीकॉट या बेहतरीन सूती कपड़ों की यात्रा अधूरेपन का ही मुकम्मल हासिल है
मुझे एक भी सम्पूर्ण चीज कायनात में दिखा दो, एक भी व्यक्ति सम्पूर्ण दिखा दो - यहां तक कि Gestald वादी भी पूर्णता की खोज में अपूर्ण रहे और समय की देहरी पर पूर्ण होने की चमक ही खत्म हो गई, विश्वास रखिए जो आपसे परफेक्शन की मांग करता है उसे जरा करीब से देखिए, वह इस संसार का सबसे दयनीय प्राणी है क्योंकि उसे उसके अपराध बोध, प्रसाद पर्यंत तक की सुविधाएं या कोई पद अंदर ही अंदर खाता रहता है
बहरहाल, ये जो चाँद है ना दोनों के बीच खेलकर ही लोक में इतना रच बस गया है कि संसार के आधे लोग इसकी गति से ही मानसिक रूप से रोगी बनते है और ठीक होते है, अपूर्णता ही मुक्ति और विलोपित होने का हथियार है, अपूर्णता ही जीवन दर्शन है , संसार के विकल और वृहद परिदृश्य पर आप साठ सत्तर बरस के जीवन में क्या ही ऐसा कर लोगे कि परिपूर्ण हो जाओ और शिखर पर पहुंच जाओ
"तुम जो चाहो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं" - आंधी फिल्म के इस गीत को आज की ठंडी रात में छत पर जाकर सुनिए जरा एक बार, आपको अपने अधूरेपन से प्यार हो जायेगा, और फिर जीवन को संपूर्ण करने के रास्ते नज़र आने लगे शायद
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"चलिए यहाँ नहीं कहीं और कहीं फिर मुलाकात होगी दादा"
अभी सेवाग्राम गया था अगस्त में तो मैने तेज प्रताप टण्डन से बात की थी कि आ रहा हूँ, हमेशा की तरह चहकता रहा और बोला आईए, आईए, आप वर्धा नहीं आ पाए तो मैं आ जाऊंगा सेवाग्राम, वर्धा जाऊं और तेज से ना मिलूं तो लड़ लेता था, कुछ भी करके मिलने आ जाता था, एक बार पूरा म गा हिंदी विवि का कैंपस घूमाया था, वर्धा में देर तक बाइक पर घूमते रहे थे, कभी स्टेशन आ जाता था छोड़ने , बड़े भाई के समान सम्मान और प्यार मिलता था उससे
पिछली दफा भी भाई और म गा हिंदी विवि के प्राध्यापक संदीप मधुकर सपकाळे जी और अनुज Gourav Chouhan के साथ मिलने आया था, एक बार अपनी मित्र और माँ के साथ इंदौर - उज्जैन आया तो मैने कहा देवास आ जाओ घर है तो संकोच कर गया लड़का, बोला "हम तीन लोग है, आप नाहक परेशान होंगे"
बहुत ही प्रतिभाशाली युवा और बेहतरीन शायर के देहावसान की खबर कल अनुज Neeraj Chhilwar की भीत से मिली, नीरज ने कहा कि मैं अभी बात करने की स्थिति में ही नहीं, बहुत दुखी हूँ, नीरज से अभी के प्रवास में मिला था तब तेज की तबियत खराब होने की बात हुई थी, इतने सालों का संबंध तोड़कर लड़का चला गया, यह सोचा ही नहीं था, उम्र ही क्या थी तेज, ज्यादा से ज्यादा तीस या बत्तीस
बस रह - रहकर उसके लिखे और बोले शब्द याद आते रहे रातभर कि "चलिए यहाँ नहीं कहीं और कहीं फिर मुलाकात होगी", सोया ही नहीं मै तो रातभर, छत पर घूमता रहा और यह दुख अब हमेशा तारी रहेगा
तेज जहां भी रहो - खुश रहो मेरे भाई, हम सब दुखी तो है पर तुम खुश रहना
खूब प्यार और श्रद्धांजलि
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