Skip to main content

Man Ko Chiththi - Post of 20 Sept 2024

व्यक्ति जो कह रहा है उसे सुनो, फिर व्यक्ति को देखो, उसके आचरण और व्यवहार को देखो कि जो वह कह रहा था उसका पालन कर रहा है या नही - ज्ञान देना आसान है, पर उसे अपने जीवन, अपने सिद्धांतों और अपने दैनिक जीवन के मूल्यों में उतारना असम्भव है हममें से अधिकांश लोग दूसरों से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते है, अरे भाई मत हो प्रभावित - दूसरा जो कर रहा है उसका धँधा है, उसका काम है, बोलना सरल है, कॉपी पेस्ट मारकर लिखना और सरल है - नूतन क्या है, नया क्या है, नवाचार क्या है 

एक उदाहरण से समझिये - एक सज्जन गांधी पर प्रवचन दे रहें थे , डेढ़ घण्टे में उन्होंने लगभग 240 बार गांधी बोला, गांधी के ख़त, बातें और गांधी के विचार अलग-अलग किताबों से पढ़कर सुनाएं और अंत में सभागार में देर तक बजी तालियों ने सिद्ध किया कि ये सज्जन ही विद्वान है बाकी गांधी तो निहायत ही उजबक थे, इस तरह वे एक बार पुनः बड़े विचारक, विद्वान और प्रखर वक्ता सिद्ध हुए, कार्यक्रम के बाद अपना मानदेय का लिफ़ाफ़ा बटोरकर, गाड़ी के लिये लगा पेट्रोल का नगदी लेकर अपनी 22 लाख की गाड़ी में रवाना हो गए - उसी शहर में आयोजित किसी और संगोष्ठी में - जहाँ से उन्हें पुनः उतना ही सब मिलने वाला था जितना यहाँ से मिला था 

 यह आस्थाओं, भरोसो और विचारों की "हत्या-पश्चात" [ Post Murder Age of Ideology, Faiths and Trustiships ] का युग है इसलिये अपने सही - गलत पर स्थिर रहिये जैसे है वैसे रहिये और सहज जीने का प्रयत्न करें, किसी से बराबरी करेंगे या तुलना तो ग्लानि में आत्महत्या करना पड़ेगी, बस सहज रहिये यकीन मानिए सब दिखावा है, आत्म मुग्धता को संतुष्ट करने के बहुतेरे उपायों में से एक है यह भ्रम, सब मिथ्या है, यदि किसी से प्रभावित हो रहें है तो एक बार उसे पुनः देखना कि कही यह उसकी आजीविका तो नही है 

 #मन_को_चिट्ठी 

 (ज्ञानियों, बाबाओं और धर्माचार्यों के प्रवचन पढ़ सुनकर, प्रश्नोत्तरी के लाइव और रील्स देखकर उपजा विचार)

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...

सतरें जीवन के - तटस्थ Satare Jivan ke

सतरें जीवन के   जब प्रवाह में बह जाने का समय आता है, लगता है कि अब सब खत्म हो ही रहा है - अचानक एक तिनका कही से तैरते हुए आ जाता है और शिद्दत से थाम लेता है यह कहकर कि धैर्य रखो, शांत हो जाओ - उजाले की किरणें छटा बिखेरेंगी जल्दी ही शाम ओस से भीगी हुई एक कविता है जिसने संसार में अपनी लय से सबको बाँध रखा है जीवन झूठ का पुलिंदा है और हम सब इसे पसंद करते है, हम सब झूठ के साम्राज्य को बनाये रखना चाहते है और इसी उपक्रम में मरने तक मेहनत करते रहते हैं, अंत में मौत का सच इसकी हवा निकाल देता है अयोग्यता ही असली धन और शांति है, जब तक अयोग्य लोग है तब तक योग्यता की असली और वीभत्स सच्चाई सामने आती रहेगी जो स्वाभाविक ना होकर ना - ना प्रकार के कृत्रिम संसाधनों से अर्जित कर सुख सम्पदा हासिल करने के लिए बेहतरीन स्वांग के साथ ओढ़ी गई है हारना और स्वीकारना हिम्मत का काम है और इसकी जड़ें बहुत गहरी होती है, अपूर्णताएँ, अकुशलताएँ और अधकचरी थोथी सूचनाएँ जीवन के उत्तरार्ध में आपको एहसास दिलाती है कि आपके सारे प्रयास, अभ्यास और चेष्टाएँ व्यर्थ है - इसलिये ख़ारिज करो अपने हर कर्म को, समझ को, देख...