Skip to main content

किसी की जान गई और आपकी अदा ठहरी - असगरी बाई 18 Nov 2019

किसी की जान गई और आपकी अदा ठहरी


45.38 मिनिट्स की यह फ़िल्म देखकर आप असगरी बाई को समझ सकते है

ध्रुपद संगीत की इस विलक्षण गायिका से हुई टीकमगढ़ की एक सुबह की मुलाकात आज ना जाने क्यों बहुत याद आई
उनकी हंसी, डांट और कहना कि यदि सुर दिल में नही तो ईश्वर को कहां से पायेगा लड़के
बात 1992 की है शायद जब किसी काम से डाइट कुंडा ( टीकमगढ़) में गया था तो जेहन में था कि वे इसी शहर में रहती है, उनका जन्म अगस्त 1918 में बिजावर जिला छतरपुर में हुआ था, भिंड के गोहद के उस्ताद जहूर खां साहब ने उनकी माँ से उन्हें पांच वर्ष की उम्र में मांग लिया था कि यह संगीत में बड़ा नाम करेगी
असगरी बाई के जीवन में जहूर खां साहब, राजा वीरदेव सिंह जूदेव और बाबा ब्रह्मचारी का बड़ा प्रभाव रहा और जो ध्रुपद उन्होंने गाया है वह कोई नही गा सकता
यह संयोग ही था कि यह फ़िल्म बनने के बाद 87 वर्ष की उम्र में यानी 9 अगस्त 2006 को उनकी मृत्यु हो गई, फ़िल्म के आखिर में वे जिस अंदाज में कहती है इससे लगता है कि अपनी मृत्यु का आभास उन्हें हो गया था, पदम् पुरस्कारों समेत उन्हें ढेरों पुरस्कारों से नवाजा गया था - पर आखिरी दिनों में बेहद गरीब रही और दुखी भी पर उनकी बेलौस हंसी और बिंदास स्वभाव से वे कभी नही हटी
असगरी बाई को आज याद कर रहा हूँ तो मुझे राम राजा के आंगन - ओरछा, में सुनी हुई एक बेजोड़ महफ़िल याद आती है जब उन्होंने अपने उस्ताद की शिक्षा का तरीका, काजल लगाने पर बारह साल की उम्र में सिर मुंडवा देने की कहानी और 84 मात्राएं गलत गिनने पर उंगलियों को तोड़ने की बात बताई थी और माईक पर उनकी पोपले मुँह की खर खर करती हंसी पांडाल में देर तक गूंजती रही थी
असगरी बाई आप ने जो मुकाम हासिल किया - वो कोई नही कर पायेगा और राम राजा का मन्दिर हो, टीकमगढ़ का मंदिर या बिजावर की भूमि या पन्ना शहर की गलियां - सब आपको हमेंशा याद करते रहेंगे
गायक हमेंशा ज़िंदा रहते है - सूरज डूबने से रोशनी खत्म नही होती - इल्म के उजालों में दिलों - दिमाग़ को वो रोशनी हर अँधेरों को चीरकर हमेंशा झंकृत करती रहती है

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...