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Posts of 14 to 15 Nov 2018


कुछ कवि जब चूक जाते है और सिवाय घटिया राजनीति के और कविता के बरक्स अपनी जाहिल बुद्धि दर्शाते हैं तो रेखांकित करने के ठेके लेते है चापलूसी इनकी फीस होती है, ये वो मठाधीश होते है जो बुरी तरह से अपराध बोध में घिरे होते है और सबसे रिश्ते निभाकर अच्छा बनने की जुगाड़ में रहते है
ये हक मिलता नही ,जबरिया विद्वता झाड़कर या घुसकर हासिल कर लिया जाता है विद्वता की नाकाम कोशिश करते हुए और मज़ेदार यह कि ज्यादातर ठेकेदार अपने पद, रुतबे और कच्चे पक्के सम्बन्धों से अतिक्रमण कर बरसों बरसों कुण्डली मारकर बैठे रहते हैं पत्रिका और अखबारों में - जबकि कविता को खुद बोलना चाहिए या बोलती ही हैं - उसे किसी घसियारे की लम्बी रेखांकित टिप्पणी की कतई जरूरत नही होती - नही जी , हम तो उपकृत करेंगें उन्हें जो चरण पकड़कर बैठे है हमारे
और कुछ कवि जो रेखांकित हो जाते है वे अपने आप को नोबल विजेता मानकर शेष जिंदगी बीता देते है , इस गुरुर में कि वे अब महान है और अपने कविता के विद्यालय चालू कर बाकायदा गंडाबद्ध शिष्य बनाकर कवितालय चालू कर देते है और एक जमात कुछ भी कच्चा पक्का लिखकर पहुंच जाती है जंचवाने
इस सबमे पत्रिका का प्रचार मुफ्त में होता रहता है 
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मप्र विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 28 और भाजपा ने 23 महिलाओं को टिकट दिए है यानी 8-9% और इन्हीं पार्टियों ने पंचायत से लेकर सहकारी और पानी प्रबंधन जैसी समितियों में जहां कोई निर्णय, वित्तीय प्रबंधन, ढांचागत व्यवस्थाएं बनाने या रुपया इन्वॉल्व नही है - वहां 50% महिलाओं को आरक्षण दे रखा है, इस 28/23 के गणित में भी सामान्य, दलित, अजा, अजजा और अपिव महिलाओं की क्या स्थिति है - उसे तो भूल जाइए
यह हाल है हमारी समता, समानता, बराबरी, महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाओ, लाड़ली लक्ष्मी आदि आदि ज्ञान बाँटने वालों के
अभी दिव्यांगों/ मूक - बधिर और अंधें उम्मीदवारों का आंकड़ा मुझे ज्ञात नही है और यह भी नही मालूम कि किसी भी पार्टी ने उन्हें टिकिट दिए है या नही
असल में हम सब बकैत है बहुत बड़े वाले और इस सबमें राजनैतिक पार्टियों की नही समाज की गलती है जो ना संवेदनशील है ना महिला समानता में यकीन करता है
देवास इंदौर में ( 9+5 =14) विधानसभा क्षेत्रों के लिए भाजपा ने मात्र 3 (मालिनी गौड़ , उषा ठाकुर - इंदौर और गायत्री पवार को देवास से) को मैदान में उतारा है और कांग्रेस को एक भी महिला नही मिली, उज्जैन की दोनो सीट भी पुरुषों को ही दी है दोनो पार्टियों ने , निमाड़ का अभी देखा नही है , आप और बाकी पार्टियों की बात करने से मतलब नही है
दुर्भाग्य है कि ये दोनों पार्टियां घोर पुरुषवादी और पितृसत्ता की पोषक है
भाजपा ने तो उंगली कटाकर शहीदों में नाम भी लिखाया है और कांग्रेस ने तो सोचा तक नही , कमाल यह है कि दिग्विजय सिंह जिन्होंने 23 अप्रेल 1993 को पंचायती राज लागू होने के बाद सबसे पहले मप्र में लागू किया था और स्थानीय सुशासन की इकाईयों में ग्रामीण महिलाओं को 33 % आरक्षण दिया था और बाद में 50 % बिहार के बाद किया था, आज यह बात क्यों भूल गए
अफसोस कि यही वे जड़ लोग है जो लोकसभा में महिलाओं के आरक्षण पर कुण्डली मारकर बैठे है , और इन्हीं जैसों के चलते महिलाएं पीछे है और मप्र का नाम महिला अत्याचार में सर्वोपरि है
भाजपा भी कम नही है इतने वर्षों में एक भी दलित आदिवासी महिला को सामने नही ला पाए और उमा भारती के नाम का झुनझुना बजाकर जल्दी ही सत्ता से रुखसत कर दिया
कोई फर्क नही है इन दोनों के मूल चरित्रों में , ये सब घोर पुरुष प्रधान समाज और सत्ता के साथी है, संघ तो चलो ठीक है पर पार्टी में भी नही,भाजपा के तो प्रदेश स्तर पर भी महिलाएं नही है कांग्रेस में शोभा ओझा प्रियंका चतुर्वेदी दम भरती नजर आती है कुछ हद तक निर्णय प्रक्रिया में भी शामिल है पर भाजपा में तो सुपड़ा ही साफ है - कुल मिलाकर शिवराज के चेहरे बेचकर चुनाव लड़ना है और उनकी घर वाली बापड़ी अपने ही घर में औरतों से गालियां खा रही है दिनभर ; बेचारी उषा ठाकुर को सीधे सीधे कह देते कि - जाओ बहनजी अपनी कृपाण अब खुद सम्हालें पर उसे बलि की बकरी बना दिया, देवास में महल और सामंतवाद को अबकी बार जनता निपटायेगी बहुत हो गया है 30 वर्ष का सामंतवादी नेतृत्व और महलों की रजवाड़ी
खैर,अबकी बार महिलाओं और युवा लड़कियों को इनसे पूछना चाहिए कि महिलाएं कहां है बेटी बचाकर क्या बलात्कार, छेड़छाड़ और दहेज हत्या के लिए तैयार करना है या विधानसभा और प्रदेश के निर्णयों में बराबरी से शामिल करना है और अगर इन सबको महिलाओं की योग्यता पर शक है तो निकाल बाहर करो और बहिष्कार करो, इन पुरुषवादी नेताओं को लगाओ दस और गिनो एक
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नोटबन्दी से लेकर रॉफेल और पुराने सभी पुण्यों को लेकर मोची मीडिया चुप रहा
CNN जैसी हिम्मत नही हमारे यहां किसी माई के लाल में
मुझे लगता है कि जो कारनामे है उसमें सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेता या राष्ट्रपति रबर स्टाम्प ना होते या विपक्ष ही दमदार होता तो दो साल में यानी 8 नवम्बर 16 की अगली सुबह ही नोटबन्दी के निर्णय को रद्द कर इस सरकार को बर्खास्त कर देते
अब सवाल यह है कि कब तक ये आंख मिचौली चलती रहेगी, सिर्फ और सिर्फ दो लोगों ने इस देश को बर्बाद किया, भाजपा को बहुत छोटे हिस्से के रूप में भव्य दफ्तर मिला, वरिष्ठ लोगों को कुछ हिस्सा और बाकी सब ये दो गरीबी रेखा के रेखांकित हड़प गए
संघ से लेकर भाजपा के आनुषंगिक संगठनों में आखिर क्यों नाराजी है, मन्दिर तो बहाना है बाकी असली चीज है इन दो की मनमानी से त्रस्त हो गए है
मैं मुतमईन हूँ कि ये दो लोग 2019 के बाद रिपीट नही होंगें - लिख लीजिए
बहुत छोटी पोस्ट है पर इसमें बहुत इशारे है
हम सब कहेंगें - एक था मोदी
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ये देश तुमसे नहीं सँभलेगा साहब !
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"ये देश तुमसे नहीं सँभलेगा साहब ! ये देश वैसा नहीं है, जैसा तुम सोचते हो। इस देश के बारे में तुम कुछ नहीं जानते।
जहाँ एक तरफ़ इस देश का एक मध्यकालीन कवि तुलसीदास काशी में रहकर कह रहा था -- 'माँगि के खइबो, मसीत (मस्जिद) में सोइबो, लेबै को एक न देबै को दोऊ', वहीं इसी काशी में रहने वाला एक आधुनिक कवि नज़ीर बनारसी कहता है -- 'हमने तो नमाज़ें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वज़ू कर के।'
जो इंसान यह परम्परा, यह संस्कृति, यह साझापन नहीं समझता, वो इस देश को नहीं समझ सकता। आप तो एकदम नहीं समझ सकते !"
(जगन्नाथ दुबे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में शोध-अध्येता है)
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छठ पर्व की सबको बधाई
मप्र में यह होता नही और हमारी मराठी संस्कृति में तो बिल्कुल नही है , मराठी परिवार इस समृद्ध लोकपर्व से महरूम है , उनकी कल्पना में भी यह नही हो सकता, लखनऊ में था तो छठ को थोड़ा देखा समझा था, इधर लोक देवियों पर दो तीन माह काम किया तो धर्म का निराला स्वरूप सामने आया
लोक में धर्म का अर्थ उत्साह, आशा का संचार, सबके सुख और समृद्धि की कामना, लोक गीतों का जीवन के साथ जीवंत जुड़ाव, वृहत्तर मनुष्य समाज के साथ अपने काम आने वाले या मूक पशु पक्षी और जानवरों का कल्याण और सबसे ज्यादा खेती किसानी और इसके उत्पादों से जुड़ कर जीवन में नया सवेरा लाने की सामूहिक पहल है और महिला , पुरुष , बच्चें , अधेड़ और वृद्ध सब अपने आपमे उत्साह का संचार कर जोश से मनाते है और सजावट से लेकर खाने पीने की चीजों में संतुलित पद्धतियां अपनाकर धर्म को नया अर्थ देते है
इधर छठ से लेकर दीवाली और अन्य त्योहारों पर कुछ वैचारिक विरोध, परखने की वैज्ञानिक सोच और इस सम्पदा को खारिज करने की साजिश भी देख रहा हूँ कुछ समय से और कुछ लोगों को इस तरह के उत्सवों के बहाने अपनी राजनीति चमकाते भी देख रहा हूँ
धर्म अलग है , संस्कृति अलग, लोक पर्व और परम्पराएं अलग और घटियापन अलग - जो स्वरूप आज हमें बाजार और दक्षिण पंथी पार्टियां दिखला रही है धर्म का, अयोध्या का मंदिर देश के धर्म का एकमात्र प्रतीक और अस्मिता नही हो सकता इसलिए मैं इस तरह की मानसिकता का विरोध करता हूँ पर छठ जैसे पर्व और इस तरह के सभी धर्मों, भारत ही नही बल्कि दुनियाभर के सभी छोटे - बड़े क्षेत्रों के सांस्कृतिक उत्सवों का समर्थन करता हूँ
आज भाई Pushya Mitra ने बड़े जतन से अपने अख़बार में महत्वपूर्ण सामग्री जुटाई उसे पढ़कर और सीखने और समझने को मिला और अब यकीन है कि कोई भी व्यक्ति, दल या विचारधारा अपने स्वार्थों के चलते इस देश की धड़कन और उत्साह उमंग को अपने खांचों में ढाल नही सकता, हमारी लोक आस्थाएँ और विश्वास बहुत गहरे से हममें धँसे है और ये ऐसे ही बने रहें यही प्रार्थनाएँ कर सकता हूँ, शैवाल जी का सारगर्भित आलेख , अग्रज भाई Satyanand Nirupam जी का इस पर्व का महत्व बताता और आगाह करता लेख आज के पढ़ें दिन की उपलब्धि है
मित्र और युवा इंजीनियर Raman Raj ने फेसबुक लाइव पर अपने गांव से पूजा, प्रसाद और सारी विधि लगभग पूरी शाम दिखाकर चमत्कृत कर दिया, आभारी हूँ इस स्नेह का
पुनः सबको और विशेषकर अपने बिहार, झारखण्ड , पूर्वांचल, उत्तर प्रदेश के मित्र, परिजनों और संगी साथियों को बधाई, शुभकामनाएं और बहुत प्यार
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