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यादें 27 दिसंबर 2017



असल में इतनी ठण्ड पड़ी ही नही कि वो सब मै भर निकाल पाऊं और दिखा पाऊं कि यह सब भी मेरे पास है मसलन माँ के हाथ बुने हुए कुछ स्वेटर्स, एक बड़ा गुलबंद, एक बन्दर टोपी जो बीमारी के समय पिताजी पहना करते थे, वैष्णो देवी गया था तब के लाये हुए पाँव और हाथ के मोज़े, माँ की आखिरी शाल जो कश्मीरी थी और बहुत महंगी भी जिसे अब तक ओढ़ रहा था, पाँव के घुटनों पर लगाने वाले इलास्टिक के दस्ताने जो मरने तक भाई पहनता था क्योकि बहुत दुखते थे.
ठण्ड के आने के साथ ही इन कपड़ों की धुलाई करता और फिर चकाचक तैयार होकर निकलता जेब में चार छः रेवड़ियां भी रखी होती और डिब्बे में गजक. दाने की पट्टी या गुड पट्टी भी कभी कभी पाकर एक राजकुमार सी फीलिंग होती थी, बरसात के गीले चिपचिपे मौसम से निकलकर खूब सारी लहसन छिलते बैठे हम लोग सोचते अबकी बार गर्मी की छुट्टियों में फलना करेंगे ढीमका करेंगे, स्कूलों में अर्ध वार्षिक परीक्षाओं का दौर शुरू होने को होता पर अल्हड बचपन को कहाँ परवाह होती थी.
यह सुबह उठकर पिताजी के साथ किसी रविवार को मंडी में जाकर अचार के लिए मोटी ताज़ी हरी मिर्च लाने का समय था, पीले पड़ते जा रहे रसीले नीम्बू लाने का काल होता था ताकि कांच की साफ़ बरनियों में रस के साथ शकर मिलाकर गर्मियों के लिए शरबत बन सकें और घर लौटते समय कोने की दूकान से गर्मागर्म जलेबी बांधकर लाने का भी ललचाने वाला समय था. माँ दोपहर में मटर छिल रही होती और खूब गलियाती रहती कि कमबख्त सारे मटर खा गए अब खिचडी में क्या ख़ाक डालूंगी और हम हँसते हुए दौड़ पड़ते दोस्तों की छतों पर हाथों में मांजा लिए पतंग को किसी आसमान के पार पहुंचाने को और जब लौटते शाम को तो सूरज ढल चुका होता.
घर में रामरक्षा का पाठ करवाती माँ हमें खाना परोसकर पिताजी से हमारे बारे में बोलती रहती. कितने स्वप्न देखते थे वे दोनों हम सबके लिए और आज जब सोचता हूँ तो लगता है एक भी जगह खरा नही उतर पाया, आज जब दोनों का साया सर पर नही तो सोचता हूँ गर वो ऊपर भी बैठकर यही सब सोच रहे हो और मेरा जीवन देख रहे हो तो कितना अफसोस करते होंगे कि बच्चों ने कुछ नही दिया उस तीन पैसे के सिक्के के बदले !!!

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