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Posts of 3 Nov 17 Bhopal Rape , Krishna Sobati and Dewas MNC SBA


3 Nov 2017 

कौन कहता है कि हिंदी का साहित्यकार दरिद्र होता है।
ए लड़की और मित्रो मरजानो की लेखिका जिन्हें आज ज्ञानपीठ से नवाज़ा गया है उन्होंने कुछ वर्ष पहले रज़ा फाउंडेशन को एक करोड़ का दान दिया था ताकि साहित्य की सेवा की जा सकें।
यह दीगर बात है कि कितनी कहां और कब हुई या किन फर्जी अकादमियों को गांव देहात कस्बों में अन्यदान / अनुदान दिया गया पर यह अशोक वाजपेयी जी की इस घोषणा से हिंदी साहित्य पर , साहित्यकार पर थोड़ा विश्वास बढ़ा है और उम्मीद भी पींगे ले रही है। अब कोई "गरीब मास्टर मर गया , लगता है हिंदी का साहित्यकार था" जैसे ध्येय वाक्य पढ़ने को नही मिलेंगे।
बहरहाल, कृष्णा सोबती जी अब ग्यारह लाख ( बढ़ तो नही गए ये रुपये, मंडलोई जी से पूछो रे) किसे देंगी - यह विचारणीय है, ध्यान रहें सबको कि पंक्ति में दान लेने के लिए यह टुच्चा फेसबुकिया लेखक उर्फ गरीब ब्राह्मण भी खड़ा है

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भोपाल बलात्कार कांड में तीन टी आई और एक दो सब इंस्पेक्टर को निलंबित किया गया
एस पी, एएस पी, आईजी, डीआईजी या डीजीपी को क्यों बचा लिया - क्योकि ये बड़े आय पी एस रात को आराम करते है ?
नीचे के स्तर के कर्मचारियों पर निशाना साधकर हमेशा बड़े लोग बच जाते है , इन कर्मचारियों पर विभागीय से लेकर राजनैतिक और छूट भैय्ये नेताओं का भी दबाव होता है और गुंडे मवालियों से लेकर पत्रकारों का भी। बड़ी बड़ी घटनाएं हुई पर कभी किसी बड़े अधिकारी को निपटते नही देखा।
जो डीजीपी कहता हो कि रात 930 के बाद बात नही करूँगा उसे क्या मुख्य सचिव ने या गृह विभाग के प्रमुख सचिव ने मेमो भी दिया है इस तरह का गैर जिम्मेदार बयान देने के लिए या कारण बताओ नोटिस ?
आखिर क्या कारण है कि जो प्रशासनिक अमला फ्रंट में चौबीसों घंटे काम करता है - चाहे वो एस आई हो, बाबू हो, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, एएनएम , लाईन मेन, हैंड पम्प मैकेनिक, संविदा शिक्षक, पटवारी, पंचायत सचिव, सब इंजीनियर या कोई और - इन सबको सॉफ्ट टारगेट मानकर निलंबित या बर्खास्त कर आप जनता की सहानुभूति बटोर लेते हो, घटना पर राख डालते हो पर जो इन सबको 24x7 दबाव में रखकर मनमर्जी का या राजनैतिक फायदे के लिए इनसे काम करवाते है उन पर कोई कार्यवाही नही , ना ही पूछताछ होती है - बस मीडिया में सब ख़त्म हो जाता है।
मेरा अपना अनुभव है कि ये फ्रंट में काम करने वाले ज्यादा मैच्योर, अनुभवी और प्रतिबद्ध होते है बनिस्बत वरिष्ठ अधिकारियों के। इन्ही के दम से विभाग भी चलते है और सरकारों के फ्लैगशिप कार्यक्रम भी। हो सकता है भोपाल में इनसे चूक हुई हो पर महिला हिंसा के मामले दर्ज ना करने का दबाव भी हो। एक वरिष्ठ मित्र से आज लम्बी बात हुई जो इस तरह के मामलों में क्या दबाव होते है उसका बता रहे थे।
एक बार इन दो चार सीनियर आयपीएस को भी झाबुआ, डिंडौरी या जुन्नारदेव घूमवा दो , भोपाल में बरसों से पड़े है और पी एच क्यू के बजाय बंगलों और समारोहों , भारत भवन से लेकर इंदिरा गांधी मानव संग्रहालयों में ज्ञान बांटने से लेकर चापलूसी में जी सर जी सर करते रहते है । इनकी एक बार तोंद ही देख लो या निशाने लगाने का अभ्यास देख लो या श्यामला हिल्स से वल्लभ भवन तक दौड़ करवा लो सारी फिटनेस और चर्बी का गणित समझ आ जायेगा।
कहते है ना कानून की नजर में सब समान है ।
सुना ये भी कि रेलवे, हबीबगंज और न्यू मार्केट थाना बड़े राजनैतिक रसूख और उगाही वाले थाने है
यहां के टी आई और स्टाफ किसी के बाप की नही सुनते क्योकि इनके आका स्थानीय बड़े राजनेता, विधायक और सांसद होते है, यहॉं पोस्टिंग विभाग के अधिकारी नही एक विधायक या राजनेता करवाते है और अब इनके निलंबन से सारे काले धंधे बन्द होंगे !
मौका मिलते ही पी एच क्यू ने तीनों को निपटा दिया और अब शायद वे नियम कायदे से पुलिस और कानून व्यवस्था चला सकें।
गजब के खेल है कार्यपालिका और विधायिका के बीच बारीक लकीर को समझ नही सकते।
( अभी पूर्व पोस्ट पर एक साथी ने यह रहस्योदघाटन किया )

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देवास में स्वच्छता अभियान के तहत आज विश्व रिकॉर्ड बनाने की कवायद चल रही है
जब बात नागरिकों से नही बन रही तो स्कूल के बच्चों को घेरकर एप डाऊनलोड करवाया जा रहा है
अर्थात अब स्कूल में बच्चों को मोबाइल लाने की इजाजत दे दी जा रही है, फिर होंगे झगड़े, लफड़े, लव जिहाद और ब्ला ब्ला !
समझ नही आता कि सरकारी योजनाओं की पूर्ति के लिए सबसे सॉफ्ट टारगेट बच्चों को ही क्यों चुना जाता है
देखते है नगर निगम किस तरह से शहर को एप से स्वच्छ रखती है और 56 से पहले पांच स्थान में भी आ पाती है
जो निगम अपनी साईट पर टैक्स जमा करने के लिए यानी रेवेन्यू कलेक्शन के लिए नियमित मेंटेन नही कर पा रही, सफाई कर्मचारियों पर या स्टाफ पर नियंत्रण नही कर पा रही वो डिजिटल एप को ट्रैक करके स्वच्छता का काम करेगी, अभी के कौशल और दक्षता को देखते जरा शक है ।
जब तक राजनैतिक गन्दगी स्वशासन की इस इकाई और जनप्रतिनिधियों के दिलों दिमाग़ से दूर ना होगी तब तक कुछ नही होगा, एक बार उस ठेकेदार को पकड़ कर शहर के रास्तों पर घूमवा दें जो पूरा शहर खोद कर रुपया लेकर भाग गया, या दो पूर्व कमिश्नरों को नौकरी से बर्खास्त करवा दें जो इस शहर को गत 25 वर्षों में दीमक की तरह चाट गए, तो जाने कि आपकी सरकार भोपाल से दिल्ली तक है वरना तो ये भी आये है लटके झटके दिखाकर निकल लेंगे अपना नाम यश और माल उड़ाकर !!!

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