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गिरिजा देवी - भारतीय संगीत की मनीषी का अवसान 24 अक्टूबर 2017


गिरिजा देवी - भारतीय संगीत की  मनीषी का अवसान 
24 अक्टूबर 2017 


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वे गाती हैं
आत्मा की अंगीठी परचाती
देह की बनती हुई राख के पायताने
सबके जीवट को तपाती
गाती हैं वे...…...


1
बनारस,
चारों-पट गायन के चौमुखी दीये का अंतिम दीवट भी आज तिरोहित हुआ...

पहला दीया : रसूलनबाई
दूसरा : बड़ी मोतीबाई
तीसरा : सिद्धेश्वरी देवी
चौथा दीया : गिरिजा देवी...
चारों की ज्योति मिलाओ तो
जगमग काशी..
चारों की आवाज़ से
पवित्र होती गंगा और मंगलागौरी...
2
एहिं ठइयाँ मोतिया हेराय गइली रामा
कहवां मैं ढूंढूं...

गिरिजा की मोतिया कहीं गुम नहीं हुई ,न ही उनके राम के फूलों के सेहरे की लड़ियाँ ही खुलकर बिखर सी गयीं हैं..
वो सब, ठीक से बचा कर सहेज गयीं अप्पा..
काशी का ख़ज़ाना कभी लुटता नहीं,
क्योंकि उसे कुबेर नहीं, सुर- देवियाँ सिरजती आयीं हैं...
3
आपकी डोलिया कौन उठा पायेगा अप्पा जी?
चारों कहाँर मिलकर उठाएं भी, तो भी ठुमरी, दादरा, कजरी और चैती को कौन उठा पायेगा?
किसमें सामर्थ्य कि मणिकर्णिका से कह सकें,
थोड़ा कम बहा कर ले जाना..
थोड़ा सा छोड़ देना हमारी गिरिजा मां को..
शायद अग्नि और जल मिलकर थोड़ा छोड़ दें
अपनी लीक पर ज्योति की मानिंद
ठुमरी के सनातन प्रवाह को....
4
रसूलनबाई और सिद्धेश्वरी देवी,
नैना देवी के द्वारा दूरदर्शन के लिए बनाए जा रहे एक कार्यक्रम में
बनारस की पूरब-अंग गायिकी पर आपस में 
आज से लगभग आधी सदी पहले बतिया रहीं थीं..
अचानक रसूलनबाई ने पूछा- 'हम दोनों के बाद आगे की पीढ़ी में क्या बचेगा?'
आश्वस्त सिद्धेश्वरी जी ने कहा -
'अपनी गिरिजा है ना !'....
5
गूँध-गूँध लाओ मालिनिया
फूलन के हार..

आपको कौन से फूलों का हार
पहनाना सुख से भर देगा?
पारिजात की तरह, सेनिया घराने की डाल पर उगे हुए पीलू ,
कौशिक- ध्वनि, पहाड़ी, खमाज और झिंझोटी
से बने हुए और कभी न कुम्हलाने वाले
सुर-वैजयंती के हार....

6
उन्होंने सहज ही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
की 'दिलजानी 'को अपनी चपल, हीरे की कनी सी आवाज़ से रिझाकर
'राधारानी 'बना डाला..
फ़िर क्या था!
कुछ बहुत सुन्दर और शालीन हुआ इस तरह...
कहनवा मानो ओ राधारानी !
निशि अंधियारी कारी बिजुरी चमकत
रूम-झूम बरसत पानी
तुम्हीं अकेले बिदेस जवैया
हरिचन्द सैलानी....
गिरिजा देवी को जैसे भारतेन्दु में जयदेव मिल गए...

7
तक-तक बाट निहारूँ सजना
आवन कहि गए क्यूँ नहिं आए
छाँड़ि गए मोरी सुधि बिसराई
तक-तक बाट निहारूँ....

उस्ताद अमजद अली खां के साथ
सरोद की लय पर तीनों सप्तकों में घूमने वाली
गिरिजा देवी ने ये दादरा जैसे विरह की सबसे गहरी
दशा में जाकर सम्भव किया था...
ऐसे अनेकों दादरे अप्पा जी के कंठहार रहे हैं..
राग सिंधु भैरवी का यह सलोना रंग
दरअसल अब उनकी बाट जोहने का
शाश्वत गीत बन गया है...
अप्पा की शिष्याओं को इस दादरे का मर्म
शायद अब कुछ अधिक दुख दे जाए। पीड़ा में
भी गिरिजा देवी की तालीम बेजोड़ कुछ रचकर प्रतीक्षा
को और भी मानवीय बनाएगी..
यतीन्द्र मिश्र 

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Comments

नमन गिरिजा देवी जी को !

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