Skip to main content

Posts of 13 July 15 In Gadhi, Balaghat MP


यकायक वह कमरे में घुस आई और मेरे हाथ में चाकू देखकर अचकचा गई , बोली ये क्या ? मैं थोड़ा सा लज्जित हुआ और दुसरे हाथ में रखा घर से लाया आम आगे करते हुए बोला कि कुछ नही आम काट रहा था और आप आ गयी, आम खायेंगी ? वो बोली नही, मैं फ़ालतू चीजें नही खाती। कप उठाकर लौट गयी। कल से इस जंगल में बने गेस्ट हाउस में हूँ पंद्रह कमरों में हम कुल जमा दो लोग है एक मैं और एक ऑस्ट्रेलियन आर्मी का केप्टन जो तीन साल की छुट्टी लेकर भारत के आदिवासियों के लिए बिजली की समस्या और सौर ऊर्जा के विकल्पों पर काम कर रहा है। दिन भर सोता है और रात को गाँवों में निकल जाता है लैम्प देखने, बड़ा विकट लौंडा है। हमारे यहां तो पक्की नोकरी मिल जाए तो जिंदगी ऐय्याशी में बीतती है. फिलिप्स मर्फी नाम है अभी म्यांमार होकर आया है। 
ये गेस्ट हाउस की देख रेख एक अधेड़ महिला करती है जो सारे दिन प्रदीप के गाने जोर से टेप चलाकर सुना करती है , ना जाने क्या दर्द है इसके भीतर, कुछ पूछो तो काटने दौड़ती है पर बड़ी तन्मयता से दोनो समय नाश्ता, खाना और बढ़िया सी चाय पिला देती है। जंगल मानो इसके भीतर से उगा और खत्म हो गया...।


एक नीलकंठ फिर दिखा आज घने जंगलों में
शायद कह गया कि गरल पान करते रहो जब तक ज़िंदा हो 

(लिखी जा रही कहानी का अंश "नीलकण्ठ का सपना")


विष्णु बहुत याद आओगे तुम.........




Vishnu Govindwad कल गढी बालाघाट में मुझसे मिलने आया, यानी लेपटोप बाबा से। आजकल ये मण्डला में FES में कार्यरत है। कहाँ बावल गाँव लातूर जिले का और कहाँ यह मण्डला, पर दुनिया गोल और छोटी है. तुम कब मिलोगे Satyajit Kale ??? विष्णु सन् 2011 में टाटा संस्थान तुलजापुर में प्रथम वर्ष का छात्र था , हम लोग वहाँ चार माह का एक आवासीय पाठ्यक्रम कर रहे थे। ये बच्चे समाजसेवा का ककहरा सीख रहे थे। विष्णु की हिंदी कविता में बहुत रूचि थी बस यही वजह थी जो हमे आजतक जोड़े रखी है दिल से। कल देर रात तक हम खूब बातें करते रहे। विष्णु ने कल रात और आज भोर में अपनी दो चार ताजा कविताएँ सुनाई। अपने गाँव का सरपंच बनने का सपना देखने वाला विष्णु बहुत कुछ करना चाहता है। बदलाव के लिए जमीनी स्तर पर नोकरी चुनने वाले 64 में से 11 छात्रों में से एक है जो महाराष्ट्र के लातूर को छोड़कर यहां मप्र के मंडला जैसे दुरूह जिले के बिछिया ब्लाक में काम कर गाँवों की राजनीति और विकास के बीच ज़िन्दगी का ताना बाना बुन रहा है। 64 में से मात्र 11 जमीनी काम कर रहे है, शेष बचे छात्र दिल्ली बम्बई की संस्थाओं में वातानुकूलित कक्षों में बैठकर प्रेजेन्टेशन बनाते है और पालिसी पर काम करते है, विष्णु का इशारा टाटा सामाजिक संस्थान के संस्कारों और प्रशिक्षण पर बहुत साफ़ था। अफ़सोस कि अब "एक्टिविज्म" सरकार भी खत्म करने पर तुली है।
बस, विदा हुआ तो गमगीन था, पता हम फिर कब मिलें और कहाँ, अभी जाते समय मैंने यही कहा - जा तेरे स्वप्न बड़े हो....

उन घरों में , उन गलियों में और उन शहरों में सिर्फ और सिर्फ लोग रहते थे बस दीवारें नही थी... फिर ईंटें आयी, रेत आई, चुना और सीमेंट जोड़ा गया कि सब कुछ पुख्ता हो सकें ... फिर दीवारें बनी ऊंची ऊंची और लोग खत्म हो गए.....
Vishnu Govindwad के साथ बालाघाट के गढी स्थित जंगल के एक गेस्ट हाउस में बातचीत टाटा सामाजिक संस्थान तुलजापुर की बेहतरीन स्मृतियों को शिद्दत से याद करते हुए.


Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...